Friday, November 17, 2017
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paush 2

कुम्भ में तीन की प्रधानता के कारण ही तीन ग्रह सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति की विशेष सिथति में स्नान, दान, पूजा-पाठ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। हरिद्वार, नासिक, उज्जैन की अपेक्षा प्रयागराज में आयोजित कुम्भ पर्व अतिदुर्लभ है क्योंकि यहां तीन नदियों गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम तट पर मोक्ष एवं पुण्य की प्रापित मनुष्य को सहज ही होती है।

बारह का अंक और कुम्भ महापर्व का एक-दूसरे से घनिष्ठ संबंध है। अंक गणना के अनुसार अंक एक का स्वामी सूर्य, अंक दो का स्वामी चन्द्रमा, इसी प्रकार अंक तीन का स्वामी बृहस्पतिदेव हैं। बारह अंक को जोड़ने पर मूलांक तीन आता है जो देवगुरु बृहस्पति का शुभ अंक है। द्वादश राशि, द्वादश भाव, द्वादश लग्न, द्वादश तिलक, द्वादश आदित्य, द्वादश ज्योतिर्लिग, द्वादश गणपति और भागवत महापुराण के द्वादश स्कन्ध हैं। हिन्दी, अंग्रेजी व मुसिलम महीने भी द्वादश ही हैं। कुम्भ के साथ द्वादश अंक में धार्मिक और मंत्रों का महत्व भी छिपा हुआ है, जैसे भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए द्वादश अक्षर का मंत्र ओम नमो भगवते वासुदेवाय, ऐसा ही मंत्र भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए और मृत्युपाश से छुटकारा दिलाने के लिए ओम जूं स: पालय, पालय स: जूं ओम। प्रत्येक शुभ कार्य के लिए बृहस्पति की अनुकूलता परम आवश्यक मानी गई है। ज्योतिष की गणना अनुसार सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड बारह राशियों में विभाजित है, जन्मकुण्डली में भी द्वादश भाव अर्थात बारह भाव अथवा घर व्यकित के भाग्य और उसके साथ शुभाशुभ घटित होने का आकलन करते है। सूर्य बारह राशियों का भ्रमण बारह मास में तथा बृहस्पति एक राशि को बारह मास में पूर्ण करते हैं। तीन अंक की महिमा निराली है, ब्रहमा, विष्णु, महेश, त्रिदेवों का आशीर्वाद ही पृथ्वी के असितत्व का प्रमुख आधार है। देवताओं के बारह दिन मनुष्य के बारह वर्षों के समान हैं इसलिए महापर्व कुम्भ प्रत्येक स्थल पर बाहर वर्ष बाद लगता है। देवासुर संग्राम बाहर वर्षों तक चला और बारह स्थानों पर अमृत गिरा, आठ जगह देवलोक में और चार जगह पृथ्वी पर। पृथ्वी पर प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक चार स्थल हैं, प्रत्येक स्थल पर कुम्भ मेला बारह वर्षों के पश्चात लगने का मुख्य आधार बृहस्पति की गति से ही सम्बनिधत है क्योंकि बृहस्पति एक राशि में लगभग बारह मास रहते हुए लगभग बारह वर्षों में बारह राशियों का भ्रमण पूर्ण करता है और लगभग बारह वर्षों के बाद उसी राशि में सिथत होता है जहां वह बारह वर्ष पूर्व था। बृहस्पति की बारह वर्षों की पुनरावृतित ही कुम्भ का मुख्य आधार है। कल्पवास के दौरान चारों दिव्य पदार्थ, अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष में तीन पुरुषार्थ अर्थ, धर्म और काम का संतुलन ही मुकित का मार्ग अर्थात चतुर्थ दिव्य पदार्थ मोक्ष की प्रापित कराता है। प्रत्येक बारह वर्ष बाद जब बृहस्पति का संचरण वृष राशि में हो और सूर्य, चन्द्रमा मकर राशि में सिथत हों तो माघ मास में इस महापर्व में प्रयाग सिथत त्रिवेणी संगम पर स्नान, दान, मोक्ष का द्वार खोलता है, ऐसी धार्मिक मान्यताएं हैं।

मकरे च दिवानाथे वृषगे च बृहस्पतौ। कुम्भयोगो भवेत तत्र प्रयागे हि अतिदुर्लभे।।
(स्कन्दपुराण)

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