Sunday, November 19, 2017
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maa saraswati

अध्ययन एवं सृजनशीलता से सम्बनिधत किसी भी कार्य को यदि इस दिन प्रारम्भ किया जाए, तो वह निश्चय ही सफलता की मंजिल प्राप्त करता है।

माँ सरस्वती की आराधना का महोत्सव बसंत पंचमी विधार्थियों के लिए सर्वाधिक उत्कृष्ट एवं महत्वपूर्ण दिवस माना जाता है। माँ सरस्वती का जन्मदिन होने के कारण बसंत पंचमी अक्षरारम्भ करने का सर्वश्रेष्ठ दिन है। इस दिन सरस्वती पूजन करने पर माँ सरस्वती की कृपा पूर्ण रूप से प्राप्त होती है। अध्ययन एवं सृजनशीलता से सम्बनिधत किसी भी कार्य को यदि इस दिन प्रारम्भ किया जाए, तो वह निश्चय ही सफलता की मंजिल प्राप्त करता है। इस दिन यदि सरस्वती जी की पूजा कर सरस्वती यंत्र धारण किया जाए तो माँ सरस्वती के उत्तम ज्ञान से सराबोर व्यक्तित्व एवं कृतित्व विधार्थी को प्राप्त हो सकता है। माघ स्नान की श्रंखला में चतुर्थ स्थान पर्व होने के कारण बसंत पंचमी के दिन स्नान व दान का महत्व तीर्थराज प्रयाग में अधिक है। यधपि प्रयाग में सरस्वती अदृश्य है परंतु इसके असितत्व से इंकार नहीं किया जा सकता। गंगा और यमुना के साथ सरस्वती का नाम जुड़ने से ही त्रिवेणी का योग बनता है। वस्तुत: सरस्वती में स्नान करने का महान पुण्य है जो श्रद्धालु सरस्वती में स्नान करते हैं उनका पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात मोक्ष की प्रापित होती है। सरस्वती के जितने जलकण स्नान के समय शरीर को स्पर्श करते हैं उतने ही समय तक मनुष्य स्वर्ग में वास करता है। सरस्वती पुण्यप्रदायनी, पुण्य की जननी तथा पवित्र तीर्थ स्वरूपा है। पाप रूपी अज्ञान की लकड़ी को जलाने के लिए यह अगिनस्वरूपा है। अतएव वसंत पंचमी को सरस्वती के दिन स्नान-दान और पूजन करने से पापों का क्षय और अविधा का नाश होता है, मूर्ख भी बुद्धिमान बन जाता है। इस दिन प्रात:काल स्नान करके नए वस्त्र मुख्यत: बसंती वस्त्र जो कि बसंत ऋतु का परिचायक है, पहने जाते हैं। साधारण व्यक्ति भी जिन्हें नए वस्त्र धारण संभव नहीं है, वे भी रूमाल, टोपी, आदि कोई न कोई बासंती वस्त्र ग्रहण करते हैं।

सरस्वती पूजन का महत्व -भगवती सरस्वती का ध्यान परम सुखदायी है। इनकी पूजा के प्रभाव से मूर्ख भी पंडित बन जाता है। विधा आरम्भ के शुभ अवसर पर अद्वुतत प्रभाव हेतु सरस्वती की पूजा की जाती है। जब व्यास जी ने वाल्मीकि जी से पुराण सूत्र के बारे में पूछा तो वह बता न सके। एैसी सिथति में व्यास जी ने जगदम्बा सरस्वती की स्तुति की तो उनकी कृपा से वाल्मीकि जी को ज्ञान हो गया और सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। सरस्वती जी से वर पाकर व्यास जी कवीश्वर बन गए और उन्होंने पुराणों की रचना की। सरस्वती जी की उपासना से ही इन्द्र शब्द शास्त्र और उसका अर्थ समझ पाए अत: ज्ञान प्रापित हेतु देवी की उपासना, पूजा ही श्रेयस्कर है। सरस्वती के प्रसाद से ही शुक्राचार्य सभी दैत्यों के पूज्यनीय गुरु हो गए। सरस्वती कृपा से ही भगवान वेद व्यास चारों वेदों को विभक्ति कर सम्पूर्ण पुराणों की रचना कर पाए। विधा मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए है। जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, उसी तरह मसितष्क के विकास के लिए विधा की आवश्यकता होती है। 

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