Sunday, November 19, 2017
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kumbh snan

शास्त्रों में वर्णन आता है कि पुण्यार्जन के लिए जो लोग प्रयाग के संगम तट पर नहीं आ पाए हैं, उनके परिजन, उनके निमित्त यदि उनका नाम स्मरण कर संगम में डुबकी लगाते हैं, तो संगम कुम्भ स्नान पुण्य फल दूर बैठे व्यकित को प्राप्त होता है। दिवंगत पितरों के नाम से त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने से पितृ को सदगति मिलती है।

विश्व का विशालतम आध्यातिमक समागम महाकुम्भ 2013 अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर हो रहा है। बसंत पंचमी के शाही स्नान के बाद जहां अखाड़ों का प्रस्थान प्रारम्भ हो चुका है, वहीं जिन कल्पवासियों ने कल्पवास का व्रत धारण किया है, वे माघी पूर्णिमा को माघ मास समाप्त होते ही कल्पवास का व्रत पूर्ण कर संगम की रेत और गंगाजल आशीर्वाद के स्वरूप कुम्भ वन्दना कर अपने गंतव्य को प्रस्थान करेंगे। शाही स्नान समाप्त हो चुके हैं परन्तु प्रमुख स्नान पर्वों में अभी माघी पूर्णिमा और महाशिवरात्रि स्नान पर्व शेष हैं। जिन श्रद्धालुओं ने कल्पवास का संकल्प लिया है, वे माघी पूर्णिमा तक संगम तट पर स्नान, सत्संग, पूजा-पाठ, ध्यान में लीन रहेंगे। पुण्यार्जन के लिए जो लोग संगम तट पर नहीं आए हैं, उनके निमित्त उनका नाम स्मरण कर संगम में डुबकी लगाने का विधान शास्त्रों में वर्णित है। दिवंगत पितरों के नाम से त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने से पितृ को सदगति मिलती है। धर्मशास्त्र अनुसार मन में सच्ची श्रद्धा रख मां त्रिवेणी एवं तीर्थराज प्रयाग का स्मरण कर अन्य जगहों में पर्वों के दिन स्नान, दान एवं पुण्य कार्य कर कुम्भ के समकक्ष पुण्य फल प्राप्त किया जा सकता है। कुम्भ में स्नान पर्वों के दिन गंगा, यमुना, सरस्वती के त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने से जन्म-जन्मान्तरों के पाप कटते हैं। पूजा, पाठ, स्नान करते समय ध्यान करें,

त्रिवेणी माधवं सोमं भारद्वाजं वासुकीम वन्दे अक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकं।।
ततपश्चात आहिनक सूत्रावली में वर्णित कुम्भ वन्दना करें,

देव-दानव संवादे मध्यमाने महोदधौ। 
उत्पन्नोसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम।।
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवा: सर्वे त्वयि सिथता:।।
त्वयि तिष्ठंति भूतानि त्वयि प्राणा: प्रतिषिठता:।
शिव स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापति:।।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा सपैतृका।
त्वयि तिष्ठंति सर्वेपि यत: कामफलप्रदा:।।

• प्रतिदिन हल्दी मिले बेसन से स्नान करने के पश्चात सुबह-शाम वंदना करते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें और निम्न मंत्र-कि्रया से स्वयं को पवित्र करें। मंत्र - ओम अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोपि चा। य: स्मरेत पुण्डरीकाक्ष से बाह्याभ्यंतर: शुचि। इस मंत्र से आचमन करें - ओम केशवाय नम:, ओम माधवाय नम:, ओम नारायणाय नम: का जाप करें। हाथ में नारियल, पुष्प व द्रव्य लेकर यह मंत्र पढ़ें, इसके बाद आचमन करते हुए गणेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, त्रिवेणी, माधव, वेणीमाधव और अक्षयवट की स्तुति करें।
• जब तक कुम्भ चल रहा है तब तक प्रतिदिन एक वक्त का सादा भोजन करें और मौन रहें।
• कुम्भ प्रयाग संगम क्षेत्र में दान का विशेष महत्व शास्त्रों में वर्णित है, अत: किसी योग्य व्यकित को इस निमित्त प्रतिदिन दान दें, दान में अन्नदान, वस्त्रदान, फलदान, तिल या तेलदान कर सकते हैं।
• गाय, कुत्ते, पक्षी, कव्वा, चींटी और मछली को भोजन खिलाएं। गाय को खिलाने से घर की पीड़ा दूर होगी, कुत्ते को खिलाने से दुश्मन आपसे दूर रहेंगे, कव्वे को खिलाने से आपके पितृ प्रसन्न होंगे, पक्षी को खिलाने से व्यापार-नौकरी में लाभ होगा। चींटी को खिलाने से कर्ज समाप्त होगा और मछली को खिलाने से समृद्धि बढ़ेगी।
• पूर्ण फल हेतु इस दौरान मांस, मदिरा, क्रोध, राग, द्वेष का त्याग करें और माता-पिता व गुरू की सेवा करें।

प्रयागे माघ पर्यन्तं त्रिवेणी संगमे शुभे।
निवास: पुण्यशीलानां कलपवासो हि कथ्यते।। (पदमपुराण)

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