Wednesday, November 22, 2017
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dalai lama

मेला क्षेत्र - इस बार कुंभ में बौद्ध धर्म गुरू दलाई लामा के आने की बात थी।तय कार्यक्रम के अनुसार वह 3 फरवरी को कुंभ में पहुंचने वाले थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।सुनने में आया कि वह 4 या 5 तारीख को आ सकते हैं। खबर यह भी थी कि मुख्य मंत्री अखिलेश यादव अपने स्तर पर बात चीत कर रहे थे। अचानक खबर आई कि दलाई लामा ध्यान में चले गये हैं। इन सब घटनाचक्र के मध्य विहिप के संरक्षक अशोक सिंघल का बयान आया कि राज्य सरकार नहीं चाहती कि सभी धर्म के लोग एक मंच पर आएं। इससे समाज में एकता का संदेश जाएगा।अंतत: 5 फरवरी को यह साफ हो गया कि दलाई लामा कुंभ मेले में नहीं आ रहे हैं।

मेले में हर किसी की जबान पर था कि दलाई लामा राजनैतिक कारणों से नहीं आ सके। कुंभ मेले में सेक्टर-6 सिथत बुद्धा मैनशन के सुरक्षा कर्मियों ने भी कहा कि राज्य सरकार दलाई लामा को सुरक्षा नहीं दे सकी इसलिए वह नहीं आ सके। दलाई लामा का शिविर भी सेक्टर-6 में ही बनाया गया है।

buddha-manson

उस शिविर में जहां दो दिन पहले चहल पहल नजर आ रही थी वहीं 5 फरवरी की शाम को एक अजीब सी खामोशी छायी हुई थी। वहां जाने पर एक भी लामा नहीं दिखे। 

बीजेपी कार्यकर्ता शैलेंद्र मिश्रा से बात होने पर उन्होने कहा कि दलाई लामा के स्वागत के लिए अन्य लामाओं ने एक बड़ी सी रंगोली बनाई थी । उनके कार्यक्रम के रदद होने की खबर के बाद सभी लामा रंगोली को गंगा में विसर्जित करने गये हैं।

दलाई लामा के न आने का कारण पूछने पर उन्होने कहा राजनीतिक कारणों से वह नहीं आ पाए। राज्य सरकार सुरक्षा नहीं दे पा रही है। मैने उन्हें विस्तार से बताने के लिए कहा उनके अनुसार दलाई लामा राष्ट्राध्यक्ष तो हैं परंतु वह शरणार्थी हैं ।सरकार ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहने की इजाजत दी है। उनका हर कार्यक्रम सरकार की अनुमति के बाद ही ओ के होता है , जबकि वह राजनीतिक जीवन से पूरी तरह सन्यास ले चुके हैं। इस बार भी सरकार की अनुमति से ही उनके 3 फरवरी को कुंभ नगरी आने का कार्यक्रम बना था लेकिन अचानक राज्य सरकार कहने लगी कि वह उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं कर पाएगी। मैने कहा मेला क्षेत्र में खबर थी कि 3फरवरी को नहीं आ पाए लेकिन उनका 5 फरवरी का कार्यक्रम तय है। उन्होने कहा कि कुंभ नगरी में यह खबर आई है लेकिन दलाई लामा को ऐसी कोई खबर नहीं मिली और वह ध्यान में चले गये। शैलेंद्र जी ने यह नहीं बताया कि यह किसने किया है। लेकिन हम सभी समझ सकते हैं कि यह किसने किया होगा। 

इतने में सभी लामा लौट आए और वहां के संयोजक थुपटेन दोरजी नेगी से मेरी बात चीत हुई। मैने दलाई लामा के न आने का कारण पूछा। हंसते हुए कहने लगे कि आप लोगों को तो सब कुछ पता है। काफी अनुरोध करने पर कुछ कहने को तैयार हुए। उन्होने भी कहा कि दलाई लामा का हर कार्यक्रम सरकार की मुहर लगने के बाद ही तय होता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ है परंतु अचानक ही अंतिम क्षणों में राज्य सरकार कहने लगी कि वह उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती।

उनके अनुसार मामला जो दिख रहा है वह नहीं है। कोई बड़ी राजनीतिक बात है। काफी कुरेदने के बाद उन्होने कहा कि भारत सरकार चीन से इतना डरती क्यों है ? जहां चीन नहीं चाहती वहां दलाई लामा नहीं जा सकते। जब किसी को दलाई लामा के कुंभ में आने की खबर नहीं थी तभी थुपटेन दोरजी नेगी ने कहा था कि दलाई लामा के आफिस से पक्की खबर मिली है कि वह 16 को आएंगे और 17 को चले जाएंगे।

थुपटेन दोरजी नेगी लगभग चालीस साल पहले लामा बने थे। वह हिमाचल प्रदेश के किन्नौर के हैं आजकल कर्नाटक के मोनेस्ट्री ;बौद्ध मठ द्धके मुख्य लामा हैं। वहां 3000 लामा रहते हैं। 

सभी 16 फरवरी का इंतजार कर रहे थे लेकिन इस बार खराब मौसम की वजह से दलाई लामा धर्मशाला से निकल ही नहीं पाए। अच्छा हुआ जो नहीं आए वरना 16 तारीख को कुंभ नगरी में पानी भर गया था और दलाई लामा प्रयाग आते भी तो कुंभ नगरी नहीं पहुंच पाते।

थुपटेन दोरजी नेगी के अनुसार 5 फरवरी को ही दलाई लामा का 16-17 वाला कार्यक्रम पक्का हो गया था। ऐसा ही था तो 3 फरवरी वाला उनका कार्यक्रम रदद ही क्यों हुआ। सबसे बात चीत करने के बाद यह निष्कर्ष निकला कि अंतिम क्षणों में राज्य सरकार दलाई लामा को सुरक्षा नहीं दे सकी अर्थात 3 फरवरी को उनके प्रयाग न आने का कारण राज्य सरकार है। लेकिन इसमें उसकी क्या मंशा हो सकती है। क्या अशोक सिंघल की बात सही है। वाकई राज्य सरकार नहीं चाहती कि सभी धर्म एक मंच पर आएं। अगर यह सही है तो इसका सीधा ताल्लुक चुनाव से है। धर्मों को अलग करने की राजनीति वहीं तो होती है और चुनाव अगले साल है। लेकिन कुंभ का उपयोग राजनीति के लिए करना कहीं से भी उचित नहीं लगता।

थुपटेन दोरजी नेगी ने कहा कि दलाई लामा के आने जाने का कार्यक्रम चीन की मर्जी से ही तय होता है। अगर यही सच है तो पूरा दोष राज्य सरकार का नहीं। राज्य सरकार को ऐसा करने के लिए बाध्य होना पड़ा। चीन तो राज्य सरकार से नहीं केंद्र सरकार से अपनी मर्जी कहेगा और केंद्र सरकार राज्य सरकार से। 

वाकई यह मामला जितना सरल लग रहा था ; दलाई लामा को राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान न कर पाना द्ध उतना है नहीं , काफी उलझा मामला है। जब यह सुरक्षा न दे पाने वाली बात कुंभ में फैलने लगी तो उनका 16-17 का कार्यक्रम सरकार ने पक्का कर दिया यानि कि उनको 3 फरवरी को प्रयाग आने से रोकना ही किसी की मंशा थी। लेकिन तीनों शाही स्नान के बाद मेले का रंग पहले जैसा नहीं रहता और शाही स्नान के अगले दिन तो मेले में आने जाने पर वैसे ही प्रतिबंध रहता है। मतलब दलाई लामा उस समय आने पर वह प्रभाव नहीं होता जो 3 फरवरी को आने से होता। एक धर्म गुरू को प्रयाग आने से रोकने के लिए राजनीति की गई , बाद में प्रकृति ने अपना कहर बरपाकर यह बता दिया कि यह उसे भी मंजूर नहीं हुआ।

 

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