Sunday, November 19, 2017
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 poornima snan

आज महाशिवराति्र के अवसर पर अंतिम स्नान सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। 70 लाख श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। कल से ही भीड़ कुंभ नगरी पहुंचने लगी थी। हर हर महादेव के उदघोष के साथ भगवान शिव की कृपा और आर्शीवाद पाने की कामना से श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान किया। स्नान के दौरान आज सुरक्षा बहुत कड़ी थी । मेले में वाहनों के आने जाने पर प्रतिबंध था और काफी कड़ाई के साथ इसका पालन भी हो रहा था। आज मौसम बहुत अच्छा था और धूप खिली हुई थी। श्रद्धालुओं ने जमकर इसका फायदा उठाया।

 

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इस अंतिम स्नान के साथ ही 14 जनवरी से प्रारंभ हुआ 55 दिन का महा कुंभ मेला समाप्त हो गया। 14 जनवरी मकर संक्रांति को पहला शाही स्नान था। दूसरा शाही स्नान 10 फरवरी मौनी अमावस्या के दिन और तीसरा और अंतिम शाही स्नान 15 फरवरी बसंत पंचमी के दिन था।20 जनवरी को पौष पूर्णिमा , 25 फरवरी को माघ पूर्णिमा और आज 10 मार्च महाशिवराति्र के दिन अंतिम स्नान।

तीनों शाही स्नान में शाही सवारी पर सवार होकर साधू संत स्नान के लिए जाते हैं और सबसे पहले स्नान करने का अधिकार नागाओं का होता है। परंतु इस बार मौनी अमावस्या के दिन इलाहाबाद जंक्शन पर हुए हादसे के बाद बसंत पंचमी का अंतिम शाही स्नान सादगी से निपट गया। कई अखाड़ों के साधू संत पैदल ही स्नान करने गये। पौष पूर्णिमा का स्नान शाही स्नान नहीं था लेकिन इसमें भी आकर्षण का केंद्र साधू सन्यासी ही थे। परंतु माघ पूुर्णिमा से पहले ही अखाड़े चले गये थे। इसलिए इस अवसर पर कल्पवासी और श्रद्धालुओं का अच्छा खासा जमावड़ा रहा । इस स्नान के बाद कल्पवासी भी अपना कल्पवास पूरा करके चले गये और आज केवल श्रद्धालुओं ने ही स्नान किया।अंतिम दोनो स्नान पर्व पर श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर था।

यह कुंभ कई मायनों में खास रहा। इस कुंभ में महिला सन्यासिनियों को अलग पहचान मिली दशनामी सन्यासिनी अखाड़ा। इस बार कुंभ में काफी अधिक संख्या में विदेशी आये। मेले में विदेशियों को धोती कुर्ता ,साड़ी पहने हुए भी देखा गया। गेरूआ वस्त्र धारण कर जनेउ पहनकर पूरी भकित और श्रद्धा के साथ भारतीय रीति रिवाजों को अपनाकर पूजा पाठ में लीन देखे गये। पूरे कुंभ में ऐसा लग रहा था मानों पूरब पशिचम का संगम हो रहा हो और सारा विश्व सनातन धर्म को अपनाने के लिए अपने कदम बढ़ा चुका है। विदेशियों को पारंपरिक तरीके से जमीन पर बैठकर भारतीय भोजन का स्वाद लेते देखना मेले में आम दृश्य था।

विदेशी भक्त हिंदी बोलते भी सुने गये। किसी को देखते ही मुस्कुराकर हाथ जोड़कर नमस्ते बोलने की विदेशियों की अदा हर भारतीय को बहुत पसंद आई। अखाड़ों की चमक दमक देखते ही बन रही थी। जिस अखाड़े के जितने विदेशी भक्त उतनी ज्यादा चमक दमक। 

एक सकारात्मक कदम भारतीयों और विदेशियों ने उठाया गंगा सफाई का। चिदानंद मुिन के परमार्थ निकेतन में रहने वाले विदेशियों ने सर्वप्रथम गंगा सफाई करना प्रारंभ किया। बाद में भारतीयों ने भी इसमें हाथ बटाया। आशा की जा सकती है कि कुंभ खत्म होने के बाद भी गंगा सफाई का जो अभियान कुंभ में छेड़ा गया उसे संभालने के लिए और हाथ आगे आएंगे।

विदेशियों के अलावा भारत के हर कोने से लोग कुंभ में आए और अनेक संस्कृतियों का मेल हुआ। यही तो कुंभ मेले की खासियत है मराठी , गुजराती ,पंजाबी ,बिहारी ,बंगाली इत्यादि सभी जाति के लोग यहां आते हैं और एक दूसरे के रीति रिवाजों और संस्कारों से रूबरू होते हैं। यहां तक कि सनातन धर्म के इस मेले में मुसलमान भाई और इसाई भी आए।

मेले में कुछ श्रद्धालुओं को कुछ परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। इसके लिए रेलवे , मेला प्रशासन तो जिम्मेदार है ही । बारिश करवाकर प्रकृति ने भी कुंभ मेले में रूकावट डालने की पूरी कोशिश की लेकिन आखिर कुंभ समाप्त हुआ। हां कुछ लोग इस कुंभ की कड़वी यादों को कभी नहीं भूल पाएंगे। 

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