Friday, November 17, 2017
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juna akhada maha kumbh

धर्मशास्त्रों के अनुसार अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष इन चारों दिव्य पुरुषार्थों को प्राप्त करना ही मानव जीवन का उददेश्य है। जन्म और मृत्यु के चौरासी लाख चक्रों को पार करने के बाद दुर्लभ मानव शरीर प्राप्त होता है ताकि मनुष्य योनि में प्रभु की भकित कर मोक्ष पाकर जन्म और मरण के चक्र से मुकित मिल सके और मुकित के इस मार्ग को प्रशस्त कर अमृतत्व प्रदान करता है 'कुम्भ पर्व। 'कुम्भ पर्व का आयोजन अनादिकाल से होता चला आ रहा है, जो केवल भारतवर्ष का ही नहीं अपितु पूरे विश्व के जनमानस की एकता, मानवता एवं आस्था का संगम है।

 भारतीय संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक के सभी शुभाशुभ संस्कारों में कुम्भ (कलश) को स्थापित करने के पश्चात ही देव पूजन कर्म करने का विधान है। कलश या घट कुम्भ का पर्याय है, कुम्भ एक राशि भी है। कुम्भ का आध्यातिमक अर्थ है ज्ञान का संचय करना, ज्ञान की प्राप्ति प्रकाश से होती है और कुम्भ स्नान, दर्शन, पूजन से आत्म तत्व का बोध होता है। हमारे अन्दर ब्रह्राण्ड की समस्त रचना व्यापत है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 'यत पिण्डे, तत ब्रह्राण्डे, तत ब्रह्राण्डे, यत पिण्डे, अर्थात जो मानव पिण्ड में है, वही ब्रह्राण्ड है और जो ब्रह्राण्ड में है, वही मानव पिण्ड में है। कुम्भ, 'घट का सूचक है और घट शरीर का, जिसमें घट-घट व्यापी आत्मा का अमृत रस व्याप्त रहता है। यह मानव पिण्ड में निहित प्रतीकों में इसलिए व्याप्त है, जिसमें संत दर्शन, देव दर्शन आदि के माध्यम से मनुष्य अंतर्मुखी होकर चिन्तन कर सके एवं समझ सके। 'कुम् पर्व में जिस ऐतिहासिक कुम् का स्मरण किया जाता है वह अमृत कुम् सुधाकलश है जिसके लिए वैदिक काल में प्रसिद्ध देवासुर संग्राम हुआ था। समुन्द्रमन्थन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक अमृत कुम् था। इसी को प्राप्त करने के लिए देवताओं व असुरों में देवासुर संग्राम हुआ था। माना जाता है कि संमुद्र मंथन से जो अमृत कलश निकला था उस कलश से देवता और राक्षसों के युद्ध के दौरान धरती पर अमृत छलक गया था। जहाँ-जहाँ अमृत की बूँद गिरी वहाँ प्रत्येक बारह वर्षों में एक बार कुंभ का आयोजन किया जाता है। उन चौदह रत्नों में अमृत कुम् ही सर्वोपरि महत्व की वस्तु थी, अत: उसी की स्मृति 'कुम् पर्व के रूप में सुरक्षित चली आ रही है। हिंदू धर्मग्रंथ के अनुसार इंद्र के बेटे जयंत के घड़े से अमृत की बूँदे भारत में चार जगहों पर गिरी, हरिद्वार में गंगा नदी में, उज्जैन में शिप्रा नदी में, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल पर। धार्मिक विश्वास के अनुसार कुंभ में श्रद्धापूर्वक स्नान करने वाले लोगों के सभी पाप कट जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। कुंभ पर्व और ग्रह-नक्षत्रों का आपस में गहरा संबंध है, बिना ग्रह नक्षत्रों के तालमेल के कुम्भ पर्व की गणना असम्भव है क्योंकि कुंभ महापर्व तभी आयोजित होता है जब ग्रहों की वैसी ही सिथति निर्मित हो रही हो जैसी अमृत छलकने के दौरान हुई थी। जब देवासुर संग्राम हुआ था, उस समय जो नक्षत्र तथा लग्न व राशि थी, जो ग्रहों का संयोग था, पुन: वे सब जब उसी तरह एकत्रित होते हैं अर्थात वही नक्षत्र वह ग्रह और वही राशियाँ जब फिर से जुड़ते हैं तो वही काल उपसिथत हो जाता है। शास्त्रानुसार चन्द्रमा ने अमृत कलश पर ढक्कन का कार्य किया और उसे छलकने से रोका था, अमृत कलश को फूटने से बचाने का कार्य सूर्यदेव ने किया। देवगुरु बृहस्पति ने अपने मंत्रों के प्रभाव से असुरों को उससे दूर रखा अर्थात राक्षसों से उसकी रक्षा की। अत: जिस दिन, जिस वर्ष व जिस महीने में सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति ग्रह संयोग करते हैं, उसी वर्ष उसी राशि के योग में जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी , उस समय प्रयाग, हरिद्वार, नासिक अथवा उज्जैन में कुम् पर्व का योग बनता है। कुम्भ के माहात्म्य को जितना भी कहा जाए वह कम है,

 

''अश्वमेध सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च। लक्ष प्रदक्षिणा भूमे: कुम्भस्नानेन तत्फलं।।“

                एक हजार अश्वमेध यज्ञ, एक सौ वाजपेय यज्ञ एवं एक लाख पृथ्वी की परिक्रमा करने का जो फल प्राप्त होता है वही फल मनुष्य को 'कुम्भ स्नान से मिलता है। हिन्दुओं की आश्रम परम्परा के साथ अखाड़ों का असितत्व प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। कुम्भ की पहचान दशनामी संन्यासियों के अखाड़े, शाही स्नान, साधुओं के डेरे और मठाधीशों-महामंडलेश्वरों का समागम से है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के शुभ मुहूर्त में कुम्भ नगरी प्रयाग में जूना अखाड़े ने प्रवेश किया जिसे ज्योतिर्विद कुम्भ के लिए शुभ संकेत मान रहे हैं क्योंकि जूना अखाड़े का प्रवेश कुम्भ का आगाज़ मकर लग्न में दोपहर पौने बारह बजे हुआ। इस समय आकाश में मकर लग्न का संचरण था जिसका स्वामी शनि अपनी उच्च राशि में शोभायमान है, साथ ही अभिजीत मुहूर्त कुम्भ को सकुशल सम्पन्न होने का संकेत दे रहा है।

ashutosh varshney

 

ज्योतिषाचार्य आशुतोष वाष्र्णेय

 

निदेशक, ग्रह नक्षत्रम ज्योतिष शोध संस्थान

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