Sunday, February 25, 2018
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yashpal

‘मोटे सर’ वाला यशपाल

प्रो. यशपाल देश के अग्रणी वैज्ञानिकों में से एक तो हैं ही, साथ ही उन्होंने विज्ञान से आम लोगों को जोड़ने के क्षेत्र में भी काम किया है पेश है उनके सुरुआती दिनों के कुछ रोचक पहलू:

मैं जब नौ साल का था तब मेरा परिवार बलूचिस्तान में रहा करता था। मेरे वालिद ब्रिटिश सरकार में क्लर्क के पद पर काम करते थे। मेरा बचपन क्वेटा की गलियों में बीता और वहीं मैं एक बार मरते-मरते बचा। उस वक्त मैंने जो मंजर देखा, उसे याद कर आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यकीन ही नहीं हो रहा था कि प्रकृति ऐसा भी कहर ढा सकती है।

                हुआ यूं कि मेरी मां, पिताजी और बहन किसी काम के सिलसिले से घर से बाहर गए हुए थे। मैं और मेरा भार्इ घर पर ही बैठे बातचीत कर रहे थे। तभी बहुत तेजी से धरती हिली। हम कुछ समझ पाते, तब तक सब कुछ हिलने और गिरने लगा। हम घबरा गए। मैं उठकर भागने ही लगा था कि मेरे आसपास घर की छत गिरने लगी। मैं और मेरा भार्इ, दोनों ही घर के मलबे में दब गए। यह सब इतना डरावना था कि मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी। यह तो गनीमत थी कि हमारी मां तभी लौटी थीं और बाहर ही खड़ी थीं। उन्होंने देख लिया था कि हम मलबे के नीचे फंस गए हैं। उन्होंने तुरंत लोगों को बुलाकर हमें मलबे से बाहर निकाला। फिर हमें अस्पताल ले जाया गया। इस प्रकार हमारी जान बच गर्इ। शायद यही वजह है कि मुझे आज भी भूकंप से डर लगता है।

                नौकरी के दौरान मेरे पिताजी के कर्इ तबादले हुए, जिसके कारण मुझे कर्इ स्कूल बदलने पड़े। क्वेटा के स्कूल में ही मेरी असली पढ़ार्इ शुरू हुर्इ थी। वहां पढ़ने वाले अफगानी बच्चे मुझे ‘मोटा सर’ कहकर पुकारते थे। वह इसलिए क्योंकि जवाब देना जैसे मेरे खून में था। क्लास में शिक्षक कुछ भी पूछते, उसका जवाब मेरे पास हमेशा तैयार रहता था। अब वह जवाब सही होता था या गलत, यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मेरे इस मिजाज के कारण मैं दोस्तों में काफी लोकप्रिय था। मेरा दोस्त लाली और मैं एक दिन क्वेटा की पहाडि़यों में खेल रहे थे, तभी वहां से एक हवार्इ जहाज गुजरा। दोस्त ने बताया कि हवार्इ जहाज से क्वेटा से कलकत्ता (अब कोलकाता) आने-जाने में सिर्फ दो दिन लगते हैं। यह सुनकर मैं हैरान रह गया। यहीं से मेरा झुकाव फिजिक्स की तरफ बढ़ने लगा।

                पिताजी का ट्रांसफर बलूचिस्तान से जबलपुर हो गया। तब महात्मा गांधी के आंदोलनों का जोर था। हर क्षेत्र से लोग उनके आंदोलनों से जुड़ रहे थे। मैं भी गांधीजी के व्यकितत्व का कायल होता जा रहा था। मुशिकल यह थी कि मेरे पिताजी ब्रिटिश सरकार के लिए काम करते थे। ऐसे में पिताजी तो सरकार के खिलाफ जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।

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