Friday, November 24, 2017
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cyber security

दुनिया में साइबर नियमों के उल्लंघन और लगातार बढ़ते खतरे के मद्देनजर पिछले दिनों केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति-2013 जारी कर दी। इसका उद्देश्य देश में ऐसा साइबर सिक्योरिटी सिस्टम तैयार करना है जो साइबर हमले से बचाव कर सूचनाएं सुरक्षित रखने में सहायक हो। संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने इसे जारी करते हुए कहा कि रक्षा , बिजली, परमाणु संयंत्र और दूरसंचार पण्राली जैसे बुनियादी ढांचे की सुरक्षा जरूरी है अन्यथा अर्थव्यवस्था में अस्थिरता पैदा हो सकती है।

        वास्तव में दूसरे देशों, गैर सरकारी संस्थाओं- व्यक्तियों, कंपनियों और आतंकवादियों की ओर से होने वाले संभावित हमले के मद्देनजर साइबर नीति आवश्यक है क्योंकि इंटरनेट सिस्टम की कोई भौगोलिक सीमा नहीं है और आने वाले समय में किसी को भी साइबर युद्ध के लिए तैयार रहना होगा। बड़ा सवाल है कि साइबर सुरक्षा के मामले में भारत अब तक इतने पीछे क्यों रहा है? आकंड़ो के अनुसार चीन में जहां इस काम में सवा लाख विशेषज्ञ तैनात हैं वहीं अमेरिका में यह संख्या 91 हजार से ऊपर है। रूस में भी लगभग साढ़े सात हजार माहिर लोग इसमें लगे हैं जबकि अपने यहां यह संख्या मात्र 556 है। यानी हालत बहुत चिंताजनक है जिस पर तुरंत एक्शन की जरूरत है।

        साइबर सुरक्षा की अहमियत का अंदाजा इससे लगता है कि पिछले दिनों अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति की शिखर वार्ता के एजेंडे में यह प्रमुख मुद्दा था। मशहूर एंटीवायरस कंपनी कैसपेर्सकी लैब के मुताबिक 2013 में दुनिया भर में साइबर हमलों की संख्या में बहुत वृद्धि होगी। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की भविष्यवाणी है कि आने वाले 20 वषों में वैश्विक साइबर युद्ध शुरू हो जाएगा। गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी नेटवर्क कंपनियों के पास बेहिसाब ऑनलाइन जानकारी हासल करने की क्षमता है। इनका दुरुपयोग कई देशों के लिए बड़ी समस्या बन सकता है।

        किसी भी मुल्क के लिए साइबर सुरक्षा का विषय उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सैन्य सुरक्षा का। कुछ देशों की सरकारें साइबर युद्ध के लिए सबसे प्रभावकारी मालवेयर का विकास कर रही हैं लेकिन कोई भी यह गारंटी नहीं दे सकती है कि ये मालवेयर और वायरस आतंकवादियों के लिए उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। कहा जा सकता है कि आज भी दुनिया के कई देशों के लिए अपने ही साइबर संजाल में फंसने का बड़ा भारी खतरा बना हुआ है। माउस के एक क्लिक से कुछ भी अनहोनी घट सकती है।

        अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व कर्मचारी एडर्वड स्नोडेन का मामला इन दिनों सुर्खियों में है जिस पर कई देशों का सरकारी साइबर डाटा चुराने, जासूसी और अनधिकृत लोगों तक खुफिया सूचना पहुंचाने का आरोप है। यह एक साइबर क्राइम ही है जिसका कई देश दुश्मन देश की जासूसी के लिए इस्तेमाल करेंगे। यह निश्चित ही चिंता का विषय है और इसे रोकने के लिए पुख्ता तकनीकी ढांचा चाहिए जो फिलहाल भारत के पास नहीं है। पिछले दिनों एक अंग्रेजी अखबार ने खुलासा किया था कि चीन ने भारतीय रक्षा अनुसंधान संस्थान के कई कम्प्यूटर हैक कर सुरक्षा व मिसाइल कार्यक्रम संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां चुरा ली हैं। बताया गया कि हैकरों ने डीआरडीओ के अधिकारी की ईमेल आईडी हैक कर घटना को अंजाम दिया।

        वेबसाइटों की हैकिंग ऐसी समस्या है, जिसके जरिये शत्रु किसी देश की सैन्य व्यवस्था, खुफिया तंत्र, ऊर्जा, उद्योग एवं वित्तीय क्षेत्र तथा तमाम सरकारी विभागों में घुसपैठ कर अति संवेदनशील जानकारी चुरा सकते हैं या उनके सिस्टम को अस्त-व्यस्त कर सकते हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (एनएससीएस) की लीक हुई एक रिपोर्ट के अनुसार देश में साइबर सुरक्षा के मामले में हद दज्रे की लापरवाही बरती जा रही है। फिर भी यह राहत की बात है कि इस मामले में अब सरकार संजीदा हो रही है और राष्ट्रीय साइबर नीति बन गयी है। इस नीति में 14 उद्देश्य तय किए गए हैं जिनमें देश में साइबर संबंधी संतुलित माहौल तैयार करना, मान सुरक्षा और प्रक्रिया अपनाने वाली कंपनियों को कर छूट, प्रभावी सार्वजनिक निजी भागीदारी विकसित करना शामिल है। नीति में क्षमता निर्माण, कौशल विकास और प्रशिक्षण के जरिए अगले पांच सालों में साइबर सुरक्षा में कुशल पेशेवरों की फौज तैयार करने और अनुसंधान के जरिए देसी सुरक्षा प्रौद्योगिकी विकसित करने की योजना है। देश में सुरक्षित साइबर माहौल तैयार करने के लिए आठ रणनीतियों की पहचान की गई है जिसमें साइबर सुरक्षा से जुड़े सभी मुद्दों के संयोजन के लिए राष्ट्रीय एजेंसी बनाने की बात कही गई है।

        चीन और यूरोपीय देशों की ओर से बढ़ रहे हैकिंग और साइबर अपराध के खतरों पर अंकुश लगाने के लिए एक कार्ययोजना का प्रस्ताव है। इसका प्रभार नेशनल इन्फॉरमेशन ब्यूरो (एनआईबी) के पास होगा। इसके अधीन एनआईएस, गृह मंत्रालय, डीओडी, डीआईडी, एनडीएमआर व डीआरडीओ जैसी संस्थाएं काम करेंगी। इस पर करीब पांच हजार करोड़ रुपए खर्च का अनुमान है। डीआरडीओ ऐसा उपकरण तैयार करेगा जो इलेक्ट्रनिक सामान जांच कर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। डीआरडीओ मोबाइल और इंटरनेट के चिप और डाटा कार्ड का उत्पादन भी करेगा, जिसका यूनिक आईडेंटिफिकेशन जरूरी होगा। साथ ही सरकार हर उपकरण के आईएमईआई नंबर का भारत में दिए कोड से मिलान कराएगी। डीआरडीओ के उपकरण से किसी भी वेबसाइट और उसकी बेसिक संस्था पर जब चाहे रोक लग सकेगी।

        साइबर सुरक्षा के लिए सरकार की कार्ययोजना सकारात्मक दिशा में है लेकिन लेकिन बड़ा सवाल है कि इस योजना पर जल्द से जल्द अमल हो पायेगा या नहीं। सोचना होगा कि पहले ही हम साइबर सुरक्षा के मामले में विश्व के कई देशों से पिछड़े हुए हैं, इसलिए इस नीति के क्रियान्यवन में देरी की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

साभार: राष्ट्रीय सहारा

Comments 

 
#1 Больше на сайте 2017-04-28 15:53
This is a very good tip especially to those new to the blogosphere.
Simple but very precise info? Thank you for sharing this one.
A must read post!
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