Wednesday, November 22, 2017
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देश प्रेम आजाद। स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी जैसा लगता यह नाम क्रिकेट के पहले सम्मानित क्रांतिकारी कोच का था। आजाद साब ने जाने के लिए सड़सठवें स्वतंत्रता दिवस का अगला दिन ही चुना। पचहत्तर साल की भरपूर उम्र और तमाम यादें समेटे उन्होंने चंडीगढ़ में अपने जीवन की पारी को शान से समाप्त किया। उनके क्रिकेटीय जीवन की खेल पारी रोचक दंतकथाओंसे परिपूर्ण रही। उनमें क्रिकेट प्रशिक्षण और जीवन शिक्षा का अद्भुत समन्वय रहा। उनने क्रिकेट को खूब जिया और भरपूर जीवन आचार गढ़े।

 

 

        सन तिरेपन में देश प्रेम आजाद महाराजा पटियाला एकादश और दक्षिण पंजाब से घरेलू क्रिकेट, रणजी ट्रॉफी खेले। लेकिन उनका दुनियावी साक्षात्कार हरफनमौला खिलाड़ी कपिलदेव के कोच के नाते ही होता था। महान कपिलदेव ने अपने खेल से अपने कोच का नाम रोशन किया। कपिलदेव ने भी माना कि अगर आजाद साब न होते तो वे भी नहीं होते। कपिलदेव के अलावा आजाद साब ने अनेक क्रिकेट खिलाड़ियों को गुर सिखाए और देश की ओर से खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। उनमें अशोक मल्होत्रा, योगराज सिंह और चेतन शर्मा खास रहे हैं। आज वे सभी गौरव के साथ उन्हें याद करते हैं। चंडीगढ़ के सेक्टर सोलह स्थित स्टेडियम सत्तर-अस्सी के दशक में क्रिकेट में कुछ कर गुजरने की रणभूमि था। कपिलदेव ने सन अठहत्तर में अपना पहला पाकिस्तान दौरा किया था। सबसे तेज गेंदबाज ने चंडीगढ़ से निकल कर समूचे देश पर अपनी छाप छोड़ी। चंडीगढ़ से निकले कपिलदेव ने भारतीय क्रिकेट की गौरव गाथा गढ़ी है। उनकी प्रतिभा को आजाद साब ने निहारा और निखारा था।

        खुद आजाद साब का क्रिकेटीय जीवन भी रोमांच से भरा-पूरा रहा। चौदह साल की छोटी उम्र में उनकी प्रतिभा को पटियाला एकादश ने भांपा और उन्हें खेलने का मौका दिया। लेकिन फिर उनका प्रतिभावान खेल जीवन कुछ वजहों से तब के खेल आकाओं के सामने निष्फल हो गया। राजा-महाराजाओं के अलावा लाला अमरनाथ उन दिनों देश और दक्षिण पंजाब के क्रिकेट को संचालित करते थे। जिस अनुशासन ने आजाद साब को सफल कोच बनाया, वही कभी उनके खेल जीवन की नाकामी भी रहा था। उस जमाने में अंग्रेजी हुकूमत की तरह हर राज्य के क्रिकेट पर वहां के राजा-महाराजाओं का राज चलता था। लेकिन आजाद साब ने छोटे-से चंडीगढ़ में क्रिकेट खेलने का माहौल बनाया। उसी क्रिकेट प्रशिक्षण की सफलता के कारण उन्हें राष्ट्रपति ने पहले और सबसे सम्मानित द्रोणाचार्य सम्मानसे नवाजा।

        शिक्षक की उपलब्धि उसके सबसे सफल छात्र से ही आंकी जाती है। इसलिए माना जाता है कि कोच खिलाड़ी नहीं बनाते हैं, मगर खिलाड़ी कोच का नाम रोशन करते हैं।यानी कोच तो कई खिलाड़ियों को तैयार करता है, लेकिन उनमें से एक-दो या कुछ ही देश के लिए खेलते हैं। और कपिलदेव जैसा तो कोई बिरला ही खेल सकता है। हां, जिस माहौल से कपिलदेव जैसा एक भी विश्वस्तरीय खिलाड़ी निकलता है, वह माहौल रूमानियत और प्रोत्साहन भरा जरूर होता है। इसलिए देश प्रेम आजाद, गुरुचरण सिंह, रमाकांत आचरेकर या तारिक सिन्हा जैसे शिक्षक ही खेल को खेलने लायक बनाए रखते हैं। युवा खिलाड़ी खेल से प्रेम करना सीखते हैं। ऐसे शिक्षक खेल के साथ जीवन शिक्षा की नींव रखते हैं और सामाजिक सद्भाव में सार्थक प्रतिद्वंदिता का माहौल बनाते हैं। कठोर, लेकिन सौहार्दपूर्ण वातावरण की जरूरत समाज के हर सफल कार्य में होती है।

        क्रिकेट के मामले में माना जाता है कि शुरुआती दिनों में मिली सही, सच्ची और कठोर शिक्षा से ही कठिन समय में निपटने की समझ बनती है। यही देश प्रेम आजाद और गुरुचरण सिंह जैसे खेल शिक्षकों ने बरसों से किया है। ऐसे ही लोगों के बनाए माहौल से अच्छे खिलाड़ी महान बनते हैं। आज खेल की लोकप्रियता भारतीय खिलाड़ियों के लगातार सफल खेल और अभ्यास के कारण है। और उस संयुक्त सौम्य वातावरण के चलते भी, जिसमें ऐसे शिक्षक उन्हें ठोक-पीट कर राह दिखाते हैं।

        लेकिन आज बाजारवादी सभ्यता ने शिक्षक नाम की संस्था को गैरजरूरी और निरर्थक बना दिया है। बल्ला पकड़ते ही बच्चे को मां-बाप सचिन तेंदुलकर बनाना चाहते हैं। बच्चे अपने दूध के दांत जाने से भी पहले देश की टीम में खेलता हुआ देखने की चाह रखते हैं। आज के खेल प्रशिक्षक इस बाजारवादी सभ्यता में केवल अपना तवा ही सेंकते रहे हैं। सफलता से विशाल, गहरा और रोमांचकारी सफर होता है। इसलिए समाज के लोकप्रिय खेल की सेवा करते रहे इन सामाजिक नेताओं को नमन और देश प्रेम आजाद को भावभीनी विदाई।

साभार: जनसत्ता

 

 

 

 

 

 

 

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