Wednesday, November 22, 2017
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vasiyat

माता-पिता के निधन के बाद परिवार में संपत्ति के बंटवारे को लेकर झगड़ा होना आम बात है। कई बार मामला कोर्ट में चला जाता है जो लंबे समय तक चलता रहता है। इससे परिजनों के बीच मरने-मारने तक की नौबत आ जाती है। इस तरह की समस्या से बचने के लिए अपनी संपत्ति की एक अच्छी वसीयत कराना जरूरी है

और क्या करें

  • वसीयत बदलना चाहते हैं तो पुरानी वसीयत को पूरी तरह नष्ट कर दें।
  • झंझट से बचने के लिए इसका पंजीकरण कराएं।
  • संपत्ति में समय-समय पर होने वाले बदलावों को अपडेट कराते रहें।
  • वसीयत को हमेशा बैंक लॉकर जैसे सुरक्षित स्थान पर रखें।
  • इसमें क्या लिखा है, इसका जिक्र किसी भी व्यक्ति से न करें।

 

        हर व्यक्ति यही आशा करता है कि जीवन भर परिश्रम करके जो भी कमाया है वह उसके बाद परिवार में उसकी इच्छा के अनुसार बंटे। लेकिन इस सबके बावजूद परिवारों में संपत्ति को लेकर कानूनी झगड़े होते रहते हैं जो वर्षो तक कोर्ट में चलते हैं। इसका सबसे बड़ा खामियाजा मृतक के परिवार को उठाना पड़ता है जो संपत्ति से वंचित रह जाता है और कई बार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसका एक मुख्य कारण होता एक अच्छी वसीयत का न होना या उसमें ऐसी गलतियों का होना जिसे आसानी से साबित किया जा सकता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि जब आप संपत्ति जोड़ रहे हैं या जोड़ चुके हैं तो एक अच्छी वसीयत लिखकर इसे अपने परिवार के लिए सुरक्षित कर लें।

क्यों जरूरी है वसीयत

        इस बात के लिए यह जानना जरूरी है कि क्या होगा यदि आपने वसीयत नहीं लिखी है। ऐसी स्थिति में कोर्ट तय करता है की आपकी संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा? इसके लिए कुछ कानून बनाए गए हैं। जैसे हिन्दुओं के लिए हिन्दू सक्सेशन एक्ट 1925 है जिसके आधार पर ही संपत्ति का बंटवारा किया जाता है। इसमें सबसे बड़ी परेशानी होती है कि कोर्ट में वाद कई साल तक चलते हैं जिससे आपका परिवार कोई भी फैसला होने तक संपत्ति से वंचित रह जाता है। हो सकता है कि फैसला होने पर भी आपकी इच्छा के विपरीत बंटवारा हो। यदि आपने वसीयत लिखी हुई है तो आपकी संपत्ति आपकी इच्छा के अनुसार ही बांटी जाती है।

किन बातों को रखें ध्यान

        इसकी कोई उम्र नहीं होती : वसीयत लिखने की कोई उम्र नहीं होती। कानूनन कोई भी मानसिक रूप से स्वस्थ बालिग व्यक्ति अपनी वसीयत लिख सकता है। आमतौर पर 40 से 45 वर्ष की उम्र ऐसी होती है जब अच्छी संपत्ति बन जाती हैं लेकिन जिस परिवार में व्यवसाय होता है उसमें इससे पहले ही संपत्तियां जुड़ जाती हैं। इसलिए जब भी आप पूंजी जोड़ लेते हैं या कोई व्यवसाय कर रहे हैं तो वसीयत जरूर करनी चाहिए।

        कैसा हो मजमून : यह इस पर निर्भर करता है कि आपने किस प्रकार की पूंजी जोड़ी है। भारतीय कानून में कई तरह की वसीयत होती है- जैसे संयुक्त वसीयत या सशर्त वसीयत इत्यादि। अपनी संपत्ति को देखते हुए उचित वसीयत का चुनाव करिए। आप एक सादा पेपर पर भी वसीयत लिख सकते हैं। कई मामलों में यह एक अच्छा विकल्प होता है क्योंकि इससे आपकी लिखावट का प्रमाण मिलता है। दूसरा आपकी जो भी इच्छा है वह साफ और सरल शब्दों में होनी चाहिए क्योंकि अदालत में जाने पर सबसे पहले इसको ही देखा जाता है। अगर शब्दों से इसका पता नहीं चलता है तो परिवार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। हालांकि वसीयत का पंजीकरण कानूनन जरूरी नहीं है लेकिन इससे कराना बेहतर माना जाता है।

        गवाह की चयन : वसीयत में दो गवाहों की भूमिका अहम होती है। इनकी गवाही वसीयत को मजबूती प्रदान करती है। लेकिन सवाल यह है कि गवाहों का चयन कैसे किया जाए? आप ऐसे गवाह ढूंढ़ें जिनका किसी लाभार्थी से कोई संबंध न हो। आपके वकील, डाक्टर आदि इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं। अगर गवाह आपसे कम उम्र का है तो ज्यादा अच्छा होगा क्योंकि जब भी वसीयत को पढ़ा जाएगा उनकी मौजूद रहने की संभावना ज्यादा होगी।

        डॉक्टर की भूमिका : हिन्दी फिल्मों में प्राय: देखा जाता है कि जब भी किसी वसीयत पर कोर्ट में मुकदमा लड़ा जाता है तो सबसे पहले यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि जिसने वसीयत लिखी है वह दिमागी तौर पर बीमार था। यही हकीकत भी है। ऐसे में डाक्टर का प्रमाण पत्र वसीयत में अहम भूमिका निभाता। अगर आपकी वसीयत के साथ यह प्रमाण पत्र लगा हो कि इसको लिखते समय आप मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ थे तो इसके बारे में कुछ भी गलत साबित करना मुश्किल होगा। इसके अलावा और भी कई बातें हैं जिनका वसीयत लिखते समय विशेष ध्यान रखना चाहिए। जैसे अपनी संपत्ति का सही विवरण और लाभार्ती और उनके हिस्से का भी। इसके साथ अगर कुछ हिस्सा बंटवारे के बाद बच जाता है तो वह कैसे खर्च किया जाए या अगर आप पर कोई कर्ज है तो उसका भुगतान कैसे किया जाए?

(लेखक जेएस फाइनेंशियल एडवाइजर्स के फाउंडर हैं)

साभार: राष्ट्रीय सहारा

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