Friday, November 24, 2017
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mann chanchal

हमारे न चाहने पर भी हमारी पांचों इंद्रियों से जो चीज बार-बार दोहरायी जाती है वह अनजाने में हमारे मन का हिस्सा बनती चली जाती है

       सब कहते हैं कि मन चंचल होता है परंतु स्वाभाविक रूप से मन चंचल नहीं होता बल्कि चंचलता का पूरा-पूरा अनजाने में अभ्यास किया जाता है। मन को जितनी ज्यादा सूचनाएं मिलती चली जाती हैं, वह उतना ही ज्यादा चंचल होता चला जाता है।

कुछ हम जान- बूझकर भी चंचलता का अभ्यास करते हैं। हम एक काम करते समय उसी काम में पूरी तरह एकाग्र (समग्र) न होकर दस जगह दिमाग को भगा रहे होते हैं। जब हम चाय पीते हैं तो चाय का भी पूरा स्वाद नहीं ले पाते, 25 चुस्कियों में मुश्किल से आपको 5-7 चुस्कियां याद रहती हैं। आपका दिमाग कभी लंदन, कभी मुंबई, कभी ऑफिस, तो कभी टीवी और कभी अखबार में घूमता रहता है। हम स्वयं ही तो इसका अभ्यास करते हैं और जिसका हम निरंतर अभ्यास करते हैं वैसा ही हम हो जाते हैं। फिर जब भी हम ध्यान या एकाग्रता वाला काम करने की कोशिश करते हैं तो चंचल मन अपनी आदत के अनुसार उछलकूद करने लगता है। फिर आपको लगता है कि मन की चंचलता का नियंत्रणकरना अत्यंत कठिन काम है। अगर आप चंचलता का अभ्यास कर लें, तो यह कठिन नहीं है। अनजाने में तो आप एकाग्रता का भी धीरे-धीरे अभ्यास कर सकते हैं। आपमें और भगवान बुद्ध में क्या अंतर है? वह पूरी समग्रता से उसी क्रिया के साथ वर्तमान में रहते हैं। अगर वह चाय पिएंगे तो 25 चुस्कियों का पूरा अनु भव करेंगे। वह चलेंगे तो चलने पर ही एकाग्र होंगे, खाएंगे तो भोजन पर ही एकाग्र होंगे। चूंकि वह इसी का निरंतर अभ्यास करते हैं इसलिए वह बुद्ध हो जाते हैं। हम समझते हैं कि यह चमत्कार या महानता है। आप भी आज के बाद जो भी काम करें, एक बार में सिर्फ एक काम करें। एक साथ चार जगह अपनी इंद्रियों का इस्तेमाल न करें। संगीत सुनना है तो सिर्फ संगीत सुनें । फोन पर बातचीत करनी है तो सिर्फ फोन सुनें। नहाना है तो नहाना हो जाए, भोजन करें तो भोजन हो जाए। इस तरह सारे काम में एक हो जाएं। समग्र हो जाएं तो वही आपकी आदत हो जाएगी और धीरे-धीरे बुद्ध जैसे बनने लग जाएंगे। बचपन से जो कुछ हम देखते-सुनते आये हैं अनुभव करते हैं, वे सभी हमारे संस्कार के रूप में अवचेतन मन का हिस्सा बन जाते हैं। जैसे बड़े को देखते ही नमस्कार करना, मंदिर को देखते ही झुक जाना जैसे अनेक संस्कार।

       ये तो है डार्योक्ट (सीधे) संस्कार जो आप स्वयं दोहराकर निर्मित करते हैं। कई संस्कार इनडार्योक्ट (बगैर हमारी जानकारी और रुचि के) हमारे अवचेतन मन में न चाहते हुए, न रुचि होते हुए भी बैठ जाते हैं और हमारे व्यवहार में आ जाते हैं। जैसे, मान लीजिए कि आप बहुत शरीफ लोग हैं। घर में जरा भी गाली-गलौज नहीं होता। इसके बावजूद, गालियों की ऊंची-ऊंची आवाजें आपके न चाहते हुए भी कान में पड़ रही होती हैं। आपका किसी दिन किसी के साथ झगड़ा हो गया तो आप अनजाने में वही सारी गालियां निकाल देंगे जो आपका पड़ोसी देता है।

       हमारे घर के पास सुबह-सुबह नियमित रूप से 5 बजे मंदिर में कुछ मंत्रोच्चारण शुरू हो जाते थे। हम छोटे थे तो हमारी नींद बड़ी विचलित हो जाती थी। गुस्सा भी आता था कि काश! ये आवाज बंद हो जाए। इन मंत्रों को सुनने में हमें कोई रुचि नहीं थी परंतु कान में तो रोज ये मंत्र आते थे। आज 50 साल बाद भी जब मैं इन मंत्रों की पहली लाइन दोहराता हूं। मुझे पूरा मंत्र याद आ जाता है जबकि मैंने कभी चाहकर याद नहीं किया। इस तरह हमारे न चाहने पर भी हमारी पांचों इंद्रियों से जो चीज बार-बार दोहरायी जाती है वह अनजाने में हमारे मन का हिस्सा बनती चली जाती है। इस तरह न जाने कितनी हजारों चीजें हम अपने अवचेतन मन में भरते चले जाते हैं। भीड़ की साइकोलॉजी का भी हमारे ऊपर इसी तरह प्रभाव पड़ता है। अगर आपका चेतन मन सशक्त नहीं है तो आप भी भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। जैसे सभी ने तालियां बजानी शुरू कर दीं और आप भी ताली बजाना शुरू कर देते हैं। बजाकर फिर पूछते हैं कि क्या बात हो गई! भीड़ जय-जयकार कर रही है तो आप भी अनजाने में जय-जयकार करेंगे। भीड़ में आपका दिमाग कम, भीड़ का दिमाग ज्यादा चलता है। नियमित ध्यान, एकाग्रता का अभ्यास, होश और साक्षी भाव ही इस बंधन बेहोशी को तोड़ सकते हैं।

n. k. sharma 

लेखक: डॉ. एन. के. शर्मा

साभार: राष्ट्रीय सहारा

 

 

 

 

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