Tuesday, November 21, 2017
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sant ki parbhasa

जनता, देश और धर्म के हित में यही उचित होगा कि कुछ विद्वान मिलकर ऐसा संगठन बनाएं जो अच्छे संतों की लिस्ट पब्लिश करें। इस लिस्ट में नाम उन्हीं संतों के होने चाहिए जिनके इंटरव्यू विद्वान लोग लें। फिर जनता को इन नामों की सिफारिश की जा सकती है। इस प्रकल्प को बहुमान्य संस्था चलाए। यह संस्था संतों की रिपोर्ट भी लेती रहे। ऐसा करने से धीरे-धीरे काफी हद तक समाज का संतों से होने वाला शोषण नियंत्रित होगा

            अब संत की परिभाषा होनी चाहिए। जो संत लोकसंग्रह करना चाहते हैं, उन्हें किसी संस्था से इजाजत लेना जरूरी होना चाहिए। संतों को सत्पुरुष कहा जाता है, महात्मा कहा जाता है। संत तो भगवान से भी ज्यादा कृपालु होते हैं, ऐसी मान्यता इस देश में चली आ रही है। भगवान ने हमें जन्म तो दिया किंतु कभी न हमारे सुख-दुख सुने, न पीठ पर हाथ फेरकर सराहना की जबकि संत कृपा के एटीएम के सदृश कृपालु होते हैं। चौबीसों घंटा कृपा ही कृपा। उनका दूसरा काम ही नहीं होता। अब तो हम समझ सकते हैं कि संत किसे कहें? संत की परिभाषा शास्त्रों ने नहीं की है किंतु हमारे उपनिषदों ने, जो हमारे हिंदू धर्म के आधार ग्रंथ हैं, संत सभा का उल्लेख किया है। तैत्रियोपनिषद कहता है ‘अस्ति ब्रह्ममेतिचेदवेद, संतमेनाम ततो विदुर्ति’ अर्थात् जो कोई ब्रह्म है, ऐसा जानता है, उसे विद्वान लोग संत नाम से जानते हैं।

        जब तक ब्रह्म अनुभव नहीं होता, तब तक सर्वात्म भाव जागृत नहीं होता। संतों के हृदय में प्राणिमात्र के बारे में अत्यधिक प्रेम व करुणा इसलिए होती है क्योंकि उनका हृदय सर्वभूतात्म्य का सतत अनुभव करता रहता है। उन्हें इसलिए मानव आदि प्राणिमात्र की पीड़ा समझ आती है तथा उनके कल्याण के सिवाय दूसरा कोई कार्य नहीं दिखता। मानव आदि सभी प्राणियों में उन्हें परमात्मा ही दिखता है तो फिर मानव कल्याण छोड़ कर ईश्वर की दूसरी कौन सी पूजा उनके लिए हो सकती है?

        जैसे नदी और वृक्ष का जन्म परोपकार के लिए है, वैसे ही संतों का जन्म केवल परोपकार के लिए है। स्वार्थ का तो संतों में लेशमात्र भी नहीं हो सकता। संत बच्चों जैसे निष्पाप होते हैं। हमेशा मन में सागर सी शांति होती है, सभी के लिए असीम दया होती है। सदैव क्षमाशील बर्ताव होता है तथा सात्विक गुणों से परिपूर्ण होते हैं। समर्पण ही संतों का नाम है और कार्य है। करुणा के सिवा जीवन का दूसरा कोई अर्थ होता है, यह संत नहीं जानते। संत भी देहधारी होते हैं क्योंकि हर देह का प्रारब्ध है किंतु वे देह में रहते हैं क्या और अगर देह में रहते हैं तो कहां? संतों के बारे में कल्पना करना भी सामान्य जनों के लिए संभव नहीं है। उन्हें जानने में संत ही समर्थ होते हैं और कोई नहीं। और इसी अज्ञान स्थिति का लाभ उठाकर आसाराम तैयार होते हैं।

        देवी-देवताओं की पूजा, तंत्र-मंत्र या कथा-पोथी कर लोगों से धन अर्जित कर अपने परिवार का पोषण करने वाले संत समाज में प्राचीन समय से उपस्थित हैं। संत साहित्य में कहीं-कहीं ऐसी प्रवृत्तियों का निषेध भी किया गया है। समय के साथ यह वृत्ति इतनी बढ़ गई है कि ब्रह्म को समझने और मानने वाले संत विरले ही बचे हैं। आध्यात्मिक ही नहीं, समाज में यह स्थिति हर क्षेत्र में दिख रही है।

        ईश्वर प्राप्ति के हिंदू धर्म में प्रमुखत: तीन मार्ग बताए गए हैं। भक्ति, योग तथा ज्ञान। तंत्र-मंत्र मानव कल्याण के उपयोग में आने वाला ज्ञान है, जिसे प्राचीन काल से मान्यता प्राप्त है। इसका आधार योग और मन:शास्त्र है। कहा जाता है कि बुद्ध काल से वामाचार का प्रारंभ हुआ जिसका राजा उपयोग करते थे। विद्वान भक्ति का फल भक्ति ही मानते हैं। भक्ति की चरम सीमा में साधक मानसिक रूप से ईश्वर का सान्निध्य भावमग्न होकर अनुभव करता है। यह द्वैताचार है। कल्पित ईश्वर को उसका मन प्रत्यक्ष कर लेता है और संसार में रहते हुए आनंद का अनुभव करता है। योग से अंतिम रूप में समाधि तथा कैवल्य प्राप्ति बताई गई है। योग से आत्मसाक्षात्कार की बातें योगी कहते हैं किंतु उसे ज्ञानी नहीं मानते। उनका कहना है कि उपनिषदों के श्रवण, मनन व निदिध्यासन से जो आत्मबोध होता है और उसके फलस्वरूप ब्रह्मानंद की जो प्राप्ति होती है, वह योग समाधि से नहीं होती। ज्ञानी संत सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि उसे परमात्मा का वास्तविक रूप पता होता है।

        भक्ति मार्ग में विशेष रूप से गुरु की आवश्यकता नहीं मानी गई है किंतु हमें 95 प्रतिशत संत/गुरु भक्तिमार्गी दिखाई देंगे। जो कथा प्रवचन, भजन, कीर्तन, जप, पूजा, अर्चन, होम, हवन आदि से जनता का आह्वान कर चेले बना लेते हैं और ऐशो आराम का जीवन बिताते हैं। राम, कृष्ण, राधा, हरि, नारायण आदि ईश्वर के नाम सामान्य जनों को आकर्षित कर लेते हैं क्योंकि पुराणों में भगवान की शक्ति तथा चमत्कार से भरे चरित्र का वर्णन होता है। लोक संग्रह करने के लिए भगवान के नाम की गरिमा का लाभ कुछ योगी भी उठा लेते हैं।

        ज्यादातर लोग संतों के पास अपना दुख लेकर जाते हैं। वे भ्रमित होकर संतों से जुड़ते हैं जिसका उन्हें न सांसारिक लाभ मिलता है और न आध्यात्मिक। हां, समय के चलते कुछ लाभ हो जाए तो उसे गुरुकृपा समझ लेते हैं। ऐसे भक्तिमार्गी संतों में कुछ आपराधिक वृत्ति के और कुछ कामी या लालची होते हैं। ऐसे श्रेष्ठ संत गिने-चुने ही होते हैं जो समाधि लाभ लिए योगी होते हैं और शरणागत का सही मार्गदर्शन करते हैं। ऐसे संत किसी परंपरा से जुड़े होते हैं तथा धन का व्यापार करते हुए भी धन और स्री को तुच्छ मानते हैं।

        कोई व्यक्ति अगर किसी मार्ग पर थोड़ी सी साधना कर ले तो उसे कुछ समय के लिए थोड़ी बहुत सिद्धि प्राप्त हो ही जाती है और इसी से उत्तेजित होकर वह स्वयं को संत घोषित करने लगता है। ऐसे स्वयंभू संतों का शीघ्र नैतिक पतन होता है। उनके घृणित कार्यों में धन और प्रॉपर्टी संग्रह, चेलों की फौज, अपने नाम की प्रसिद्धि, बड़े बड़े आश्रमों का निर्माण, समाज कार्य के नाम पर निजी कार्य करना तथा विलासिता का जीवन जीना आदि शामिल होते हैं। जानबूझ कर यह सब करने वाले या अनजाने में इसी को संत कार्य मानने वाले लोग संत बने हुए हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है। इसी प्रकार कुछ भाग्यवान साधकों को वाणी-सिद्धि मिल जाती है। जो अच्छे कीर्तन, कथा, प्रवचन, करते हैं, टीवी पर दिखते हैं और स्वयं को गुरु या संत कहलाते हैं। ये अच्छी माया एकत्र कर लेते हैं। बड़े आश्रम बनाते हैं। लोगों को बुलाने और पैसा कमाने के लिए गोष्ठियां करते हैं। उन साधु-साध्वियों का मेकअप भी देखने-दिखाने लायक होता है।

        विश्व भर के मानव समाज को सुख-शांति की तलाश है। सबको भविष्य की चिंता है। मान्यता है कि ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है तथा संसार को चलाने वाला, सुख-दुख देने वाला ईश्वर है। साधु-संत वे हैं जो ईश्वर को जानते हैं और हमारा कल्याण करने में सक्षम हैं, ऐसी बहुत सारे जनों को श्रद्धा है। इन्हीं विचारों से साधु-संतों की ओर समाज का आकर्षण स्वाभाविक है। बहुत कम लोग हैं जो जानते हैं कि संत से ईश्वर का ज्ञान पाना चाहिए। लोगों का संतों के प्रति जो आकर्षण है, उसका लाभ कैसे उठाना है, कुछ लोभी लोग अच्छी तरह जानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे मछुआरे मछली पकड़ते हैं। मोटे हिसाब से हम आज के संत- साधु-गुरुओं का वर्गीकरण इस प्रकार कर सकते हैं-

        पहली श्रेणी में अखाड़ा आदि संप्रदाय से जुड़े साधु होते हैं। ये जनता को लूटते नहीं। आवश्यक धन की लोगों से अपेक्षा करते हैं। इनमें कुछ साधना करते हैं पर ज्यादातर भेष बनाकर घूमते रहते हैं। इसी श्रेणी में कुछ का उच्च स्तर होता है। कुछ संत अच्छे होते हैं। ये संत कुछ शास्त्र योग, ग्रंथ आदि जानते हैं। इन्हीं में वे संत हैं जो धन कमाते हुए मंडलेश्वर जैसे अधिकार पाते हैं। इनके बहुत से चेले और आश्रम होते हैं।

        दूसरे, अवालिया श्रेणी के संत होते हैं। इनमें से कुछ ईश्वर तुल्य होते हैं। ये बोलते नहीं हैं या कम बोलते हैं। इन्हें देहभान नहीं होता किंतु सब जानते हैं। ये चमत्कारी संत चेले नहीं बनाते और विचित्र लीला करते हैं। ये सही संत हैं। इनमें कई दुर्बल मन के रहे होते हैं जिन्हें लोग या रिश्तेदार संत बना देते हैं।

        तीसरे परंपरा से चलते आए सिद्ध योगी होते हैं, जो भक्तों पर कृपा करते हैं। इनकी भौतिक वस्तु और भोगने में रुचि नहीं होती। जो लोग जुड़ जाते हैं या कोई कुछ देता है तो उसे नम्रता से स्वीकारते भी हैं।

        चौथे ब्रह्म साक्षात्कारी आत्मज्ञानी संत होते हैं जो शास्त्र जानते हैं। ये योग भक्ति सब जानते हैं। किंतु ज्यादातर एकांतवास पसंद करते हैं। लोकसंग्रह करते हैं या नहीं भी करते। ये बड़े ही बुद्धिमान और प्रतिभाशाली होते हैं। इनमें शरणागत शिष्य को ज्ञान देने की योग्यता होती है। ये ब्रह्मज्ञान के सिवाय और बातें नहीं करते। इनका आचरण शुद्ध होता है पर इन्हें लोग नहीं समझ पाते। इनकी बातें ध्यान में नहीं आतीं। जीवनमुक्त होते हैं।

        पांचवीं कोटि के संत ईश्वर का अवतार होते हैं। सर्वज्ञ होते हैं। धर्म की स्थापना के लिए या मानव हित के लिए जन्म होता है। जैसे आदि शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, नानक, तुलसी, कबीर, वासुदेवानंद सरस्वती आदि। आज हमारे देश में एक और दो श्रेणी के ही संत हैं। तीन, चार और पांचवी श्रेणी के संत शायद सौ भी नहीं होंगे।

        मानव का वासना और विशेषकर काम वासना पर नियंत्रणसंभव नहीं है। यह जानकर योगी अपने गुप्तांग को निष्क्रिय बना देते हैं। ये इसके लिए पद्मासन, सिद्धासन या वज्रासन पर स्थित हो जाते हैं। हर संत का अपना प्रारब्ध तो होता ही है। किंतु अच्छे संत धन, प्रॉपर्टी कितनी भी मिल जाए उसे न अपना मानते हैं, न उपभोग करते हैं।

        गुरु की आज्ञा बगैर अपने ही मन से संत बनने वालों से स्री, धन व सम्मान के लालच से दूर नहीं रहा जाता। अनुभवी गुरु अपने शिष्य को तभी जनता में जाने की आज्ञा देते हैं जब वे आश्वस्त हो जाते हैं कि शिष्य ने काम वासना पर नियंत्रणपा लिया है। ऐसे शिष्य श्रेष्ठ गुरु बन जाते हैं। शिरडी के साई बाबा के शिष्य उपासनी महाराज को ही ले लीजिए। उपासनी महाराज सिर्फ स्रियों को शिष्य बनाते थे। हमेशा औरतों से घिरे रहते थे पर कभी जीवन भर उन पर किसी की उंगली नहीं उठी। वह बड़े योगी, तपस्वी और ज्ञानी थे।

        सिद्ध संतों का अतीत के बैकग्राउंड से भी कोई लेना-देना नहीं होता। हम जानते हैं कि वाल्मीकि ऋषि पहले क्या करते थे। सैकड़ों महान संत पूर्व समय में गुनहगार थे पर संत बनना तो पुर्नजन्म होता है। ज्ञान होते ही वे लोग बालकों जैसे निष्पाप बन जाते हैं। किंतु बगैर ज्ञान के क्रिमिनल वृत्ति का कोई भी आदमी संत बन जाता है तो समाज और धर्म का बड़ा नुकसान करता है।

        जनता का कोई और कभी भी दोष नहीं होता क्योंकि उसने ‘यथा देवे तथा गुरु’ सीखा होता है। हम गुरु को भगवान से अलग नहीं मानते। जनता अज्ञानी तो होती ही है पर संत के लिए पूज्य भाव रखती है। वह ज्ञानी गुरु और नकली गुरु में भेद नहीं कर सकती।

        सवाल है कि जनता को क्या करना चाहिए! कुछ मूर्ख और स्वार्थी शिष्य नकली गुरु की महिमा बढ़ाने में जुट जाते हैं। जनता को झूठी कहानियां बताते हैं। जाने-अनजाने में भोली जनता को लुभाते फंसाते हैं। नकली संत होशियारी से ये कार्य उनसे कराते हैं। भक्ति, योग या ज्ञान-किसी भी मार्ग पर कोई साधना शुरू कर दे तो उसकी एकाग्रता होने लगती है और षटचक्र उत्थापन होने लगता है। गुरुसेवा से भी यह फल मिलता है। जब दो आंखों के बीच का आज्ञा चक्र थोड़ा जाग्रत होता है तो वनस्पति से औषधि गुणों का ज्ञान होने लगता है। लेकिन अधूरे ज्ञान वाले नकली संत लोगों को दवाएं बेच पैसा बनाने लगते हैं। सिद्धि का फायदा उठाना चाहते हैं और फंस जाते हैं। कुछ तो मूर्ख को ही संत समझ दवाइयों का लोगों पर प्रयोग करते हैं और जेल जाते हैं।

        स्वार्थ का हेतु मन में रख संत बनने वाले और थोड़ी सिद्धियों का लाभ उठाने की इच्छा रखने वाले कुछ संत अच्छी शुरुआत करने के बाद स्त्री और पैसा देखकर बिगड़ जाते हैं। हर इंद्रिय और चित्त का निरोध करने वाले को सिद्धियां तो मिलती हैं। उनका सात्विक उपयोग नहीं किया तो कब निकल जाएं, नहीं समझा जा सकता। फिर भी संत बनने की जल्दी वाले साधक अपना ध्येय छोड़कर सिद्धी और उसके उपयोग के पीछे पड़ जाते हैं।

        जनता के लिए अच्छे-बुरे संत का निश्चय करना कठिन है क्योंकि आज अच्छा लगने वाला संत अगर ज्ञानी या योगी नहीं है तो कल अंधकार में बदल सकता है। जनता को बुरे संत से बचाने के कुछ उपाय बताएं तो हो सकता है वह स्थिति अच्छे संत पर भी लागू हो। इस भ्रम में जनता का मार्गदर्शन कुछ मोटे तौर पर ही हो सकता है।

        यह आश्र्चय की बात है कि कभी-कभी भक्त को जो अच्छा फल नकली संत से मिलेगा, वह अच्छे संत से नहीं। इसका कारण आध्यात्मिक है और लोगों को समझाना संभव नहीं है। किसे किस संत से संबंध जोड़ना है या नहीं, इस बारे में राय देना व्यर्थ है। ज्यादातर लोग अपने दिल से निर्णय करते हैं या एजेंट के झांसे में आते हैं।

        जनता, देश और धर्म के हित में यही उचित होगा कि कुछ विद्वान मिलकर ऐसा संगठन बनाएं जो अच्छे संतों की लिस्ट पब्लिश करें। इस लिस्ट में नाम उन्हीं संतों के होने चाहिए जिनके इंटरव्यू विद्वान लोग लें। फिर जनता को इन नामों की सिफारिश की जा सकती है। इस प्रकल्प को बहुमान्य संस्था चलाए। यह संस्था संतों की रिपोर्ट भी लेती रहे। ऐसा करने से धीरे-धीरे काफी हद तक समाज का संतों से होने वाला शोषण नियंत्रित होगा।

साभार: राष्ट्रीय सहारा

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