Wednesday, November 22, 2017
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नई दिल्ली : स्विस बैंकों में भारतीय खातेदारों के बारे में सूचना देने के मामले में स्विट्जरलैंड ने पेच फंसा दिया है। स्विट्जरलैंड ने गुरुवार को कहा कि भारत के साथ 'कर संधि' के तहत दी गई सूचना को सिद्धांततः किसी विशिष्ट और सम्बद्ध मामले में कार्यवाही को छोड़कर किसी अन्य अदालत या निकाय के सामने सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है।

स्विट्जरलैंड की तरफ से यह स्पष्टीकरण सरकार को एचएसबीसी बैंक, जिनीवा के 627 खाताधारकों के नाम सुप्रीम कोर्ट को सौंपने के आदेश के बाद आया है। इसकी वजह से भारत सरकार को आर्थिक सूचनाओं के लेकर होने वाले बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय समझौते से आखिरी क्षणों में बाहर होना पड़ा है।

स्विस वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता ने पीटीआई को बताया, 'दोनों देशों के बीच डबल टैक्स अग्रीमेंट अंतरराष्ट्रीय मानकों पर है और सरकारों के अनुरोध पर जानकारी का आदान-प्रदान होता है। इस अग्रीमेंट (डबल टैक्स अग्रीमेंट- डीटीए) के तहत ऐसी कोई भी जानकारी कोर्ट को 'विशेष कार्यवाही' के संदर्भ में ही दी जा सकती है, जो कि टैक्स मामलों से संबंधित हो और यह जानकारी उसके लिए उपयुक्त हो।'

प्रवक्ता ने कहा कि इसके विपरीत जानकारी को कोर्ट या अन्य किसी के साथ, किसी और कार्यवाही के संदर्भ में साझा नहीं किया जा सकता है। 'गोपनीय' जानकारी के खुलासे को लेकर संधि की शर्तों का उल्लेख करते हुए प्रवक्ता ने बताया कि द्विपक्षीय टैक्स मामलों में दोनों देश लगातार संपर्क में हैं लेकिन उन्होंने इस खास केस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

टैक्स संबंधी मामलों में भारत और स्विट्जरलैंड के बीच जानकारी साझा करने की नीति 'डबल टैक्सेशल अग्रीमेंट' और प्रोटोकॉल पर आधारित है। दोनों ही देशों ने साल 2010 में इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे और अक्टूबर 2011 से यह प्रभावी है।

आखिरी क्षणों में भारत के बहुपक्षीय समझौते से बाहर होने के फैसले ने टैक्स अथॉरिटीज तक पहुंच सकने वाली अतिआवश्यक जानकारी को सीमित कर दिया है। 29 अक्टूबर को बर्लिन में आयोजित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) की एक बैठक में भारत भाग लेने में नाकाम रहा। उस बैठक में अंतरराष्ट्रीय मानक का पालन करने के लिए काले धन से जुड़ी प्राप्त सूचनाओं की गोपनीयता बनाए रखने की प्रतिबद्धता संबंधी बहुपक्षीय सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए।

ओईसीडी में 51 देशों ने वित्तीय आंकड़े साझा करने और टैक्स चोरी के खिलाफ कार्रवाई करने के प्रयासों बढ़ावा देने के करार पर हस्ताक्षर किया है। इस पर हस्ताक्षर करने वालों में अधिकतर यूरोपीय संघ के देशों के साथ-साथ लिष्टनश्टाइन, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड और केमैन द्वीप जैसे कर चोरी को पनाह देने वाले देश शामिल हैं।

ओईसीडी ने कहा है कि ये देश 2017 अपने वित्तीय संस्थाओं के माध्यम से एकत्र आंकड़े स्वतः आदान-प्रदान करने लगेंगे। भारत को यह भी डर है कि यदि खाताधारकों के नाम अनुचित ढंग से सार्वजनिक किए गए तो अमेरिका और स्विटजरलैंड जैसे देशों से काला धन रखने वालों की जानकारी 'गोपनीयता भंग करने की वजह' बताकर मिलने में देर हो सकती है।

भारत अभी भी गठबंधन पर हस्ताक्षर कर सकता है। इस वक्त, भारत सुप्रीम कोर्ट की तरफ से रुख साफ होने का इंतजार कर रहा है। सूत्रों ने बताया कि भारत अमेरिका के साथ जानकारी के स्वतः आदान-प्रदान के लिए इंटर-गवर्नमेंटल अग्रीमेंट साइन कर सकता है।

 

साभार: नव भारत टाइम्स

 

 

 

 

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