Wednesday, November 22, 2017
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नई दिल्ली : करीब आठ महीने पहले देश भर में महज चार सीटों पर सिमट गई आम आदमी पार्टी (आप) ने देश की राजधानी में जबरदस्त वापसी की है। 'आप' ने अब तक अजेय नजर आ रही बीजेपी को पीछे छोड़ कर यह जीत हासिल की है। 'आप' को भी दिल्ली की 70 में से 60 सीटों पर जीत की उम्मीद नहीं थी। 'आप' नेता योगेंद्र यादव का कहना था कि उन्होंने इस चुनाव को 'केजरीवाल बनाम मोदी' नहीं होने दिया यानी 'आप' सीधे तौर पर पीएम नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से टकराने से बचती रही। इसी तरह 'आप' की कई छोटी-बड़ी रणनीतियां सफल रहीं तो कई फायदे उसे बोनस के तौर पर भी मिले। जानिए 'आप' की इस बड़ी जीत के पीछे क्या हैं पांच प्रमुख कारण-

सिर्फ दिल्ली पर दिया ध्यान 
'आप' ने लोकसभा चुनावों की गलती से सबक लेते हुए पिछली बार की तरह चादर से बाहर हाथ-पैर फैलाने की कोशिश नहीं की। हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव हुए और बीजेपी को जबरदस्त सफलता मिली। बीजेपी इसकी खुमारी में डूबी रही और 'आप' ने इस पर ध्यान देने के बजाए देश की राजधानी दिल्ली पर ही फोकस किया। बीजेपी जैसी मजबूत संगठन वाली पार्टी को हराने के लिए यह जरूरी भी था। 'आप' ने यहां अपने कार्यकर्ताओं का संगठन खड़ा किया।

 


सोशल मीडिया पर पलटवार 
सिर्फ संगठन ही नहीं बीजेपी के दूसरे मजबूत खम्भे सोशल मीडिया पर भी 'आप' ने खास ध्यान दिया। यहां 'आप' समर्थक बीजेपी समर्थकों के हर सवाल का जवाब देते नजर आए। खासतौर पर 'आप' इस मीडियम में युवाओं को अपनी ओर खींचने में सफल रही। इसने कैंडिडेट खड़े करने से लेकर चुनाव प्रचार तक की कमान भी युवाओं के हाथ में सौंपी और उनका मूड भांपने में भी सफल रही। मीडिया की मदद से भी 'आप' जनता के बीच अपनी बात पहुंचाने में सफल रही।

भ्रष्टाचार का मुद्दा और लोअर-मिडल क्लास का साथ
'आप' ने 49 दिनों में दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने वाला मुद्दा आखिर तक आगे रखा। इस दौरान 'आप' कार्यकर्ताओं ने मुफ्त पानी, घटे हुए बिजली बिल और सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार में कमी को जनता के बीच पहुंचाया। इसके अलावा, मफलर हो या ऑटो रिक्शा 'आप' इन प्रतीकों से दिल्ली के लोअर क्लास को अपने साथ जोड़ने में सफल रही। 49 दिनों की सरकार के दौरान लिए गए फैसले हों या इस बार की चुनावी घोषणाएं 'आप' ने लोअर क्लास वोट को अपने हाथ से फिसलने नहीं दिया। यही नहीं, अरविंद केजरीवाल ने 49 दिनों बाद इस्तीफा देने को लेकर लोगों से माफी भी मांगी, जिससे मिडल क्लास के एक तबके ने भी 'आप' को माफ कर दिया।

दिल्ली बीजेपी के कमजोर नेतृत्व का फायदा
दिल्ली बीजेपी की कमजोर लीडरशिप से भी 'आप' को काफी फायदा मिला। दिल्ली में पहले बीजेपी तय नहीं कर सकी कि सीएम कैंडिडेट कौन होगा, फिर आखिरी समय में किरन बेदी को सीएम कैंडिडेट बनाना भी बीजेपी के लिए गलत दांव साबित हुआ। 'आप' का आखिरी समय में दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के खिलाफ मोर्चा खोलना भी पार्टी के लिए काम कर गया।

दलित और मुस्लिम वोट
'आप' ने दलितों और मुसलमानों के बीच अपनी पैठ बनाई है। एक्ज़िट पोल के मुताबिक भी इस बार दिल्ली के दलित और मुसलमान वोटरों ने 'आप' को वोट दिया। पिछले और इन चुनावों में कांग्रेस की बुरी हालत की एक वजह उसका ये वोट बैंक खिसककर 'आप' के पास जाना है। मुस्लिम वोटर्स दिल्ली में बीजेपी को जीत से रोकना चाहते थे। इन्हें कांग्रेस की जीत पर भरोसा नहीं था इसलिए उन्होंने 'आप' में भरोसा जताया।

 

साभार: नव भारत टाइम्स

 

 

 

 

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