Friday, November 24, 2017
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आकाषवाणी लखनऊ द्वारा चंद्र भूशण त्रिवेदी रम काका के जन्म दिवस पर आयोजित सेमिनार जन-मन के रमई काका में वक्ता के रूप में षामिल थे श्री रामचंद्र त्रिवेदी, श्रीमती नीरू त्रिपाठी और श्री कमला षंकर।

अतिथियों का स्वागत करते हुए आकाषवाणी के सहायक निदेषक श्री पी.आर.चौहान ने कहा यहाँ वे सब साथ-साथ उपसिथत हैं जिन्होनें रमईकाका के जीवन और उनकी कला को साक्षात देखा और तमाम वे लोग जिन्होने दूसरों से सुनकर उन्हें पढ़कर जाना।


रमईकाका के बारे में बोलते हुए श्री रामचंद्र त्रिवेदी ने कहा काका गाँव के ड्रामों और कवि सम्मेलनों के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। काका का श्रीमती मंजरी नाटक जिसे उन्होनें स्वयं लिखा और किया। अब भी याद किया जाता है।

उस समय 20 रू0 में कार्यक्रम हो जाते थे। काका ने चंदा रूपया गिनकर दिया तो लगा मंत्र पढ़कर दे रहे हैं। काका अपने अभिनन्दन के लिए कभी आसानी से तैयार नहीं होते थे। वे दूसरों को हास्य देते थे लेकिन स्वयं बडे़ संयत और षांत रहते थे।
सेमिनार में बोलते हुए श्रीमती नीरू त्रिपाठी ने बताया कि उनके समय में पूरा परिवार कैसे पूरी तैयारी के साथ रमईकाका को कवि सम्मेलनों में सुनने के लिये जाता था और कैसे सामाजिक कुरीतियों को वे अपने कार्यक्रमों में षामिल करते थे। दरअसल रमई काका कपूर थे जैसे कपूर जल जाने के बाद भी उसकी सुगन्ध हमेषा बनी रहती है। वैसे ही रमई काका की सुगन्ध आने वाली पीढि़यों तक रहेगी।
इस अवसर पर बोलते हुए उनके रमई काका के मित्र कमला षंकर ने उनके कवि सम्मेलनों की चर्चा की और बताया कि रमईकाका कितने सâदय कवि थे कि कभी लिफाफा खोल कर नहीं देखते थे कि क्या मिला। उन्नाव या रावतपुर के कवि सम्मेलनों के लिये वे बड़ी से बड़ी राषि ठुकरा देते थे।
उन्होंने अपनी दोस्ती की बात को कुछ यूँ कहा - बालू के कण और हिमालय की चोटी जैसी है उनकी दोस्ती थी। धरती हमारि-धरती हमारि उनकी कविता सुनायी।

सेमिनार मे श्रीप्रकाष बाजपेयी ने बहिरे बाबा नाटक के कई अंष सुनाकर लोगों को हँसा हँसाकर लोट-पोट कर दिया। डा0 अरुण त्रिवेदी ने एक पिता के रूप में उन्हें याद किया और उनकी प्रसिद्ध कविता चंदरमा को प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के अंत में आकाषवाणी के अपर महानिदेषक श्री गुलाब चंद ने कहा कि हमें गर्व है कि रमईकाका आकाषवाणी लखनऊ का हिस्सा हैं। उन्होंने ऐसे कार्य किये कि आकाषवाणी गौरवानिवत है। रमई काका जैसा षिश्ट हास्य देने वाले विरले लोग ही होंगे।
रमई काका अवधी भाशा के लिए समर्पित थे और आज आकाषवाणी लखनऊ ने उसी गौरव को बनाये रखा। कार्यक्रम के संचालन सहित पूरा सेमिनार अवधी में ही सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन डा0 अनामिका श्रीवास्तव ने किया।
यह दस्तावेज़ नहीं वक़्त की सौगात है
माटी के गीत यहाँ, आत्मा का साज़ है
जन-मन में बस गया, यहाँ वो बन अपना
किसी एक का नहीं रमई काका हम सबकी आवाज़ हैं


जन-मन के रमई काका
आकाषवाणी लखनऊ अपने 75वें बरस में आकाषवाणी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर श्री चंद्र भूशण त्रिवेदी रमईकाका पर एक धारावाहिक Üाृंखला जन-मन केेे रमईकाका का प्रसारण दिनाँक 13 मार्च 2013 से प्रारम्भ करेगा।
1. प्रथम कड़ी -रमई-काका जीवन और कृतितव
13 मार्च 2013
2. दूसरी कड़ी -रमईकाका की कविताएं
20 मार्च 2013
3. तीसरी कड़ी -आकाषवाणी के रमईकाका
27 मार्च 2013
4. चौथी कड़ी -माटी की गंध के गीतकार रमईकाका
03 अप्रैल 2013
5. पांचवी कड़ी -रमई-काका के व्यंग्य और नाटकों की दुनिया
10 अप्रैल 2013
6. छठी कड़ी -जन-मन के रमई-काका
17 अप्रैल 2013
(रमई-काका से जुड़े संस्मरणों पर आधारित कड़ी)


रमई काका के जन्मदिवस 2 फरवरी की पूर्व संध्या पर आकाषवाणी लखनऊ एक सेमिनार का आयोजन कर रहा है जन-मन के रमई काका। दिन में 3 बजे आकाषवाणी के कांफ्रेस हाल में आयोजित इस सेमिनार में भाग लेंगे

1. श्री रामचंद्र त्रिवेदी (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और रमई काका के छोटे भाई)
2. पदमश्री इरषाद मिर्जा
3. श्रीमती नीरू त्रिवेदी


जन्मै रावतपुर पढै़ उन्नावै जाय
भये आकासबानी मा सुफल पहुँचै धोखा खाय
श्री चंद्रभूषण त्रिवेदी रमई काका के नाम से समूचे उत्तर भारत के कंठहार बन गये थे।2 अप्रैल 1915 को उन्नाव के रावतपुर गाँव में जन्में रमईकाका प्रथम विष्व युद्ध में सिपाही की भाग लेने वाले की विलक्षण संतान थे। वेद मंत्रों को संगीतबद्ध करके उनकी प्रस्तुति को देखकर लोग बडे़ प्रभावित हुए और उनकी ये प्रतिभा उन्हें रेडियो तक ले आई। सन-1942 के आसपास वे रेडियो में दाखिल हुए पंचायत घर कार्यक्रम के माध्यम से। उन्होंने गाँव, रेडियो और जन-मन की आवष्यकताओं सूचना, ज्ञान और मनोरंजन की एक ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित की कि जन-मन दषकों तक उसमें डूबता उतराता रहा।
ल्ेकिन रमई-काका को सिर्फ रेडियो तक सीमित करना उनके विषाल कद को बौना कर देना होगा। वे न केवल रेडियो बलिक कवि, गीतकार, संगीतकार, नाटय-लेखक, मंच के मंजे हुए कलाकार और व्यंग्यकार भी हैं। संगीत के अनेक वाधयंत्रों के जानकार और वादक और श्रेश्ठ संगीत-संयोजक आदि के रूप में अनेक ऐसे पक्ष हैं जिनसे रमई-काका के व्यकितत्व को गढ़ा गया है।
दूसरी ओर भाषाई पहलू है यदि एक ओर अवधी के पुरोधा के रूप में हम तुलसीदास को जन-जन का कंठहार मानते हैं तो बीती षताब्दी के आधे से ज्यादा दषकों में उत्तर भारत के विषालकाय क्षेत्र में रमई-काका ने अवधी बोली का डंका बजाया है न केवल रेडियो के माध्यम से बलिक उन हजारों कवि-गोषिठयों और मंचीय नाटकों के माध्यम से वे लोक और जन तक पहुँचे। सुप्रसिद्ध कवि माहेष्वर तिवारी का कहना है कि रमईकाका बहुत अच्छी हिन्दी कविता करते थे लेकिन उन्हें अवधी से प्यार था वे दक्षिण भारत तक के नगरों मे,ं मध्यप्रदेष, बिहार, राजस्थान व महाराश्ट्र ऐसे अनेक राज्यों के कवि सम्मेलनाें में मंच से अवधी भाशा में ही कवितापाठ किया करते थे।
एक कवि-सम्मेलन का संदर्भ देते हुए उनके पुत्र श्री अरूण त्रिवेदी बताते हैं कि एक सत्य वाक़या यह है कि एक कवि-सम्मेलन के बाद बूढ़ी आजी कहती हैं कि अस लागत है जब तुम बोलति हवै तुमका पेटे मा धरि लेईं।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर जो उनके कार्यक्रमों के बडे़ नियमित श्रोता थे आकाषवाणी को 15 नवम्बर 1965 को भेजे एक पत्र में लिखा है:-
आपके केंद्र के नियमित श्रोता की हैसियत से अपने उदगार आपके पंचायत घर प्रोग्राम और उसमें भी विषेश रूप से श्रीयुत चंद्र भूशण त्रिवेदी रमईकाका की प्रंषसा में अर्पित करने से रोक न सका।
एक मैं ही नहीं मेरे मत में आपके केंद्र के असंख्य श्रोता भी एक ही उमंग में समिमलित होकर एक स्वर से यह कहेंगे कि रमईकाका अनमोल रेडियो-रत्न हैं। आज उनका प्रोपेगैंडा सुफलाहार पर सुनकर मैं रस मुग्ध हो गया। प्रतिभाषाली व्यकित किस तरह से प्रोपैगेंडा की नीरस सामग्री को अपनी चतुराई भरी रसीली बातों, कहावता, कविताओं से भरकर बात को कहाँ से कहाँ उड़ा ले जाकर गहरे में पैठा देता है। यह कोई श्री रमईकाका से सीखे।
कू कू कोयल बोलि परी, अब हवा बसंती डोलि परी, कविता लिख कर सुनाई थी रमईकाका ने अपनी स्वर परीक्षा में।
बौछार, फुहार, भिनसार, गुलछर्रा, रतौंधी, बहरे बोधन बाबा, मिस्टर जुगनू, उनकी अनेक रचनाएं है।
पंचायत घर और दूरदर्षन के आने पर चौपाल कार्यक्रम के आप नियमित कंपीयर थे। बहरे बाबा, चतुरी चाचा उनके आकाषवाणी के बेहद लोकप्रिय धारावाहिक थे। बहरे-बाबा के 700 से ज्यादा एपीसोड आकाषवाणी से प्रसारित हुए। बहरे-बाबा लखनऊ और इलाहाबाद केंद्रों से साथ-साथ प्रसारित होते थे।
धर्मयुग के 10 से 17 सितम्बर 1978 के अंक में डा0 विष्वनाथ प्रसाद ने रमईकाका के बारे में लिखा है अवधी के बहुत से कवियों ने क्षेत्रीय स्तर पर मंचों पर आना षुरू किया, लेकिन रमईकाका के अतिरिक्त अन्य किसी को सम्पूर्ण भारत के मंच पर ख्याति नहीं मिली।
आकाषवाणी गौरवानिवत है ऐसे रमई-काका पर। रमई काका की प्रतिभा को प्रणाम।

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