Wednesday, November 22, 2017
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earth

 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का मानना है कि जीव चैतन्य है और कर्ता है। संसार पदार्थ है और जड़ है। चैतन्य कर्ता में यह योग्यता होती है कि जड़ पदार्थ की इच्छा और आवश्यकता का उपयोग कर सके। कुम्हार मिट्टी से घड़ा भी बना सकता है और दीपक भी। ठीक इसी प्रकार संसार में सत, रज, तम तीनों का मिश्रण है। चुनने वाला आदमी अपनी मर्जी के मुताबिक उनमें से चाहे जो वस्तु चुन सकता है। बाग में कीचड़ भी है, गंदगी भी और फूलों की सुगंध भी है। कीड़े कीचड़ में घुस पड़ते हैं, मक्खियां गंदगी खोज निकालती हैं और भौंरे सुगंधित फूल पर जा पहुंचते हैं। सबको अपनी इच्छित वस्तु मिल जाती है। त्रिगुणामयी प्रकृति के दोनों पहलू मौजूद हैं- एक भला, दूसरा बुरा। एक धर्म, दूसरा अधर्म। एक सुख, दूसरा दु:ख। चुनाव की पूरी-पूरी आजादी आपको है। एक व्यक्ति चोर है, उसके मानसिक आकर्षण से बहुत से चोरों से उसकी मैत्री हो जाएगी और सब जगह उसे चोरी की ही चर्चा मिलेगी। उस चोर के लिए यह सारा संसार चोरी की धुरी पर नाचता हुआ दिखाई देगा, उसको विश्व का सबसे बड़ा काम चोरी ही दिखाई पड़ेगा। अन्य बातों की ओर उसका ध्यान बहुत स्वल्प हो जाएगा।

 

एक व्यक्ति कई लोगों को कई प्रकार का दिखाई पड़ता है। माता उसे स्नेह भाजन मानती है, पिता आज्ञाकारी पुत्र मानता है, गुरु सुयोग्य शिष्य समझता है, मित्र हंसोड़ साथी समझते हैं, स्त्री प्राणवल्लभ मानती है, पुत्र पिता समझता है, शत्रु वध करने योग्य समझता है, दुकानदार ग्राहक समझता है, घोड़ा सवार समझता है। इस सभी संबंधियों की माता, पिता, गुरु, मित्र, स्त्री, पुत्र, शत्रु, दुकानदार, नौकर, घोड़ा आदि की उन मानसिक भावनाओं का चित्र दिखाया जा सके, तो आप देखेंगे कि उस एक व्यक्ति के संबंध में सब संबंधी कैसी- कैसी विचित्र कल्पना किए हुए हैं, जो एक-दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलतीं। इसमें से एक भी कल्पना ऐसी नहीं है, जो उसके ठीक-ठीक और पूरे स्वरूप को प्रकट करती हो। जिसे उससे जितना एवं जैसा काम पड़ता है, वह उसके संबंध में वैसी ही कल्पना कर लेता है। तमाशा यह है कि वह मनुष्य स्वयं के बारे में ऐसी कल्पना किए है कि मैं लखपति हूं, वृद्ध हूं, पुत्र रहित हूं आदि। और कल्पना लोक उसके बारे में इंद्रियों की अनुभूति के आधार पर अपने संबंध में एक लंगड़ी-लूली कल्पना कर लेता है और उसी कल्पना में लोग नशेबाज की तरह उड़ते रहते हैं।‘मै क्या हूं?’ इस मर्म को यदि वह किसी दिन समझ पाए, तो जाने कि मैंने अपने बारे में कितनी गलत धारणा बना रखी थी।

 

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