Tuesday, June 27, 2017
User Rating: / 0
PoorBest 

Image result for people watching durgaImage result for rape victims

त्यौहार का महीना खत्म हुआ। नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है। जिसमें देवी के पत्थर या मिट्टी की मूर्ति की पूजा होती है। यह सभी नारी के विभिन्न रूप हैं अर्थात देवी के रूप में नारी की पूजा की जाती है और देवी में नारी का अंश होता है। इसी प्रकार दिपावली पर भी देवी लक्ष्मी की पूजा होती है और बंगाल में मां काली की पूजा होती है। यह पूजा आम तौर पर कोई पुरूष पुजारी ही करते हैं और अन्य पुरूष भी देवी के सामने सर झुकाने में झिझकते नहीं अर्थात देवी के रूप में सभी पुरूष नारी की पूजा करते हैं।


पत्थर की देवी को तो नारी हो या पुरूष सभी पूजते हैं। परंतु अनेक पुरूष देवी के सामने माथा टेकने के तुरंत बाद उन्हें कोई नारी मिले तो उसके साथ छेड़छाड़ करना तो आम बात है, उसकी इज्जत लूटने में भी वे पीछे नहीं हटते। इस समय वे भूल जाते हैं जिस तरह देवी में नारी का अंश है उसी तरह प्रत्येक नारी में भी देवी का अंश है।क्या यही पुरूष पत्थर की देवी को बेइज्जत करने की बात सोच भी सकते हैं। इतनी हिम्मत है उनमें। पत्थर की देवी की इज्जत और जिंदा नारी की बेदज्जती क्या यही पुरूषों का धर्म है ? क्या नारी की इज्जत के साथ खिलवाड़ करते समय उन्हें यह याद नहीं रहता कि आज जिस नारी को वह महज अपने कामुक प्रवृत्ति को संतुष्ट करने के लिए भोग कर रहे हैं , उसका असर उस पत्थर की देवी मां पर भी पड़ती है। वह कुपित होती हैं और उनका अभिशाप उस पुरूष को कभी न कभी भोगना ही पड़ता है। यहां पुरूष का मतलब सम्पूर्ण पुरूष जाति से नहीं है। यदि सम्पूर्ण पुरूष जाति ऐसी होती तो धरती नरक बन जाती और समाज नाम की कोई चीज नहीं बचती।
पुरूष धन की प्राप्ति के लिए धन की देवी मां लक्ष्मी के सामने सर झुकाते हैं परंतु जब उनके घर में बेटी के रूप में लक्ष्मी जन्म लेती है तब वह उस नन्ही सी बच्ची की हत्या करने में भी पीछे नहीं हटते। यहां तक की कभी कभी तो उसकी मां को भी घर से निकाल दिया जाता है क्योंकि वह पुत्र की मां न बन सकी।
विद्या की देवी सरस्वती स्वंय एक नारी हैं। विद्या लाभ के लिए पुरूष मां सरस्वती के सामने सर झुकाने में जरा भी नहीं झिझकते परंतु अपने घर की नारियों को पढ़ाई लिखाई से दूर रखते हैं। आज भी हमारे देश में कई इलाके हैं जहां बेटियों को शिक्षा लाभ के अधिकार से वंचित रखा जाता है। बेटियों को कहा जाता है कि पढ़ने लिखने से बेटियां विधवा हो जाती हैं और कोई निरक्षर विधवा जब उन पुरूषों से यह सवाल करती है कि मैं तो पढ़ी लिखी नहीं हूं फिर मैं क्यों विधवा बनी। इस सवाल का उन पुरूषों के पास कोई जवाब नहीं होता। असल में वह पुरूष नहीं चाहते कि नारी पढ़े लिखे और समझदार बने। पुरूषों के अत्याचार के विरूद्ध खड़ी हो सके। अगर नारी पुरूषों के अत्याचार के विरूद्ध खड़ी होने की शक्ति अर्जित कर ले तो पुरूष किस पर अपनी मर्दानगी दिखाएंगे। नारियों के तरक्की से पुरूष जलते हैं।
सत्य युग में सीता ने नारी के सम्मान और इज्जत बचाने के लिए जो लड़ाई प्रारम्भ की थी वह आज भी खत्म नहीं हुई। सीता ने अपनी पवित्रता का प्रमाण देने के लिए लंका में अग्नि परीक्षा देकर सबसे बड़ी भूल की थी। उस वक्त मेघनाद की पत्नी सुलोचना ने सीता से कहा था कि वह बहुत बड़ी गलती करने जा रही है क्योंकि इसके बाद हर नारी को अपनी पवित्रता का प्रमाण देना पड़ेगा। लंका में हुए अग्नि परीक्षा ने सीता की पवित्रता को प्रमाणित तो कर दिया लेकिन फिर भी सीता पर जो कलंक लगना था वह तो लगा ही लेकिन सुलोचना की बात सही हो गई। आज भी पग पग पर नारी को अपनी पवित्रता का प्रमाण देना पड़ता है। हर पल उसे एक अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है, अग्नि परीक्षा का अर्थ केवल आग में प्रवेश करना ही नहीं है। उस युग में सीता रूपी लक्ष्मी ने राम रूपी नारायण को माफ नहीं किया था और जब अत्याचार सीमा लांघ गई तो वह धरती माता के गोद में समा गई। परंतु आज की नारी क्या करे।अगर हर प्रताड़ित नारी धरती के गोद में समा जाना चाहे तो क्या धरती की गोद छोटी नहीं पड़ जाएगी। लेकिन आज की नारी को धरती की गोद में समाना नहीं है। उसे अपने सारे अधिकार इसी धरती पर पाना है ,सत्य युग में सीता ने जो लड़ाई प्रारम्भ की थी उसे कलियुग में समाप्त करना है।
आज की नारी इस लड़ाई को जीतकर समाप्त भी करेगी। इसके लिए नारी तैयार भी हो रही है । जीवन के हर क्षेत्र में नारी प्रवेश कर चुकी है और पुरूषों से कहीं बेहतर कर रही है। यही तो पुरूषों की समस्या है। इसीलिए अपने को बड़ा साबित करने के लिए वह नारी पर अत्याचार करते हैं, बलात्कार करते हैं और यह गलत रास्ता अपनाकर वह नारी को छोटा दिखाना चाहते हैं क्योकि इसके अलावा उनके पास कोई मार्ग नहीं है।
नारी पर अत्याचार करने वाले पुरूष संभल जाओ। जिंदा नारी के क्रोध से पत्थर की देवी बचा नहीं पाएगीं और तुम्हारी हालत भी रामायण के धोबी की तरह हो जाएगी। वह भी देवी लक्ष्मी की पत्थर की प्रतिमा के सामने सर झुकाता था और अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए स्त्री जाति के प्रतीक सीता पर कलंक लगाया परंतु उसकी हालत न घर की न घाट की होकर रह गई। आज की नारी अत्याचार सहते सहते पाताल प्रवेश नहीं करेगी आवश्यकता होने पर वह मां काली का रूप धरेगी। इसलिए अब 16 दिसम्बर 2012 की पुनरावृत्ति न हो यह जिम्मेदारी सम्पूर्ण पुरूष समाज की बनती है।

 

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

Society-mirror

Who's Online

We have 1976 guests online
 

Visits Counter

698491 since 1st march 2012