Saturday, December 16, 2017
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burning-ravan

बुराई के प्रतीक के रूप में प्रत्येक वर्ष हम रावण का पुतला जलाकर बहुत खुश होते हैं कि हमने बुराई का अन्त कर दिया। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि छोटे बच्चे बैटरी या रिमोट से चलने वाली कार, प्लेन, जीप इत्यादि चलाकर स्वंय को उसका चालक समझकर खुश हो जाते हैं। परंतु वे तो नासमझ होते हैं लेकिन रावण का पुतला जलाने वालेे समझदार।



युगों पहले घटी घटना अर्थात रामायण के अनुसार असुरों के राजा त्रिलोकपति रावण ने सीता का हरण किया था। राम ने युद्ध में रावण को मारकर सीता का उद्धार किया। रावण अत्याचारी था, अहंकारी था, बुरा इंसान था परंतु रावण का तो ऐसा ही होना था क्योंकि शाप मुक्ति के लिए उसे राम के हाथों मरना था। राम के हाथों मरने के लिए उसे बुरा इंसान बनना ही था, वह बना लेकिन यह सब तो पूर्व नियोजित था।
सोचने की बात यह है कि सीता लंका के उद्यान अशोक वाटिका में असुरों के बीच रहकर भी सुरक्षित रही। उसकी पवित्रता पर कोई आंच नहीं आई। परंतु आज की नारी अपने घर में अपनों के बीच भी सुरक्षित नहीं है। 
सवाल यह है कि हम और कितने दिन खिलौने की तरह बुराई के प्रतीक के रूप में दशहरे के अवसर पर रावण का पुतला जलाएंगे। आज रावण का पुतला जलाने के स्थान पर बहुत कुछ है जलाने को जो हमारे समाज को खोखला कर रही है जैसे आतंकवादी, जालसाज, मिलावटखोर, कालाबाजारी करने वाले, ड्रग माफिया, बलात्कारी इत्यादि। इनका पुतला नहीं इन्हें ही जलाना चाहिए क्योकि यह बुराई के प्रतीक नहीं सर से पांव तक बंुराई ही बुराई है। 
आज आतंकवाद विश्व व्यापि समस्या बन गया है जिससे हमारा देश भी अछूता नहीं है। आतंकवाद की वजह से हमारे देश में धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय कोई भी कार्यक्रम खुले मन से शंकाहीन रहकर आनंद के वातावरण में नहीं मना सकते। 26 जनवरी और 15 अगस्त का कार्यक्रम खत्म हो जाने पर वीण्आईण्पी सुरक्षित रूप से प्रस्थान कर जाने से हम सब चैन की सांस लेते हैं कि चलो इस साल भी स्वतंत्रता दिवस या गणत्रंत दिवस सुरक्षित निकल गया। 
कोई भी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम हम शांति से नहीं मना सकते। किसी भी कार्यक्रम में आज सुरक्षा पर लाखों रूपए खर्च करने पड़ते हैं फिर भी मन में शांति नहीं होती है। इलाहाबाद में कुंभ मेला होता है। मेरा विवाह इलाहाबाद में हुआ था। सन् 1966 से मैं इलाहाबाद का कुंभ मेला देखती आ रही हूं। शुरू के कई कुंभ में पब्लिक ज्यादा होती थी और इकका दुक्का पुलिस वाले। धीरे धीरे हालात बदलते गए और अब चप्पे चप्पे पर पुलिस वाले दिखते हैं। इलाहाबादवासियों का कुंभ के साथ एक जुड़ाव हो गया है। पहले जब कुंभ खत्म होता था तो सबके मन में एक सूनापन छा जाता था पर 2013 का कुंभ बिना किसी आतंकवादी घटना के समाप्त होने पर इलाहाबादवासियों ने चैन की सांस ली। आतंकवाद हमारे देश पर सीधे तौर पर हमला करने में हमेशा सफल नहीं हो पाता है। हमारी सेना हमें सुरखित रखने के लिए अपनी जान लड़ा रही है पर आतंकवाद ने हमारे मन पर सीधा हमला किया है। 
कदम कदम पर हमारा सामना मिलावटखोरों और जालसाजों से होता है। हम कितना भी सर्तक रहें हमारे बीच से ही कोई जालसाज निकल आता है। जिस पर हम बहुत विश्वास करते हैं और उसे हमारी कमजोरियां पता है। शहर के प्रतिष्ठित और पुराने दुकान जहां से लोग निश्चिंत होकर सामान खरीदते हैं छापा पड़ने पर पता लगता है कि वहां भी नकली सामान पकड़ा गया। हम भरोसा करें तो किस पर। मिलावटखोरों की वजह से साल में कितनी मौतें होती हैं। खाद्य सामग्री की बात तो छोड़ ही दीजिए दवाई में भी मिलावट होती है। अब तो दवाई लेते वक्त भी निश्चिंत नहीं हो सकते कि दवाई लेने से तबियत अच्छी हो जाएगी या और खराब। आजकल फल, सब्जी में इंजेक्शन लगाकर जल्दी बड़ा किया जाता है। मेरे पति के मित्र बाजार से शाम को एक छोटा सा लौका लाए और फ्रिज में रख दिया। सुबह उनके नौकर ने फ्रिज खोला तो देखा कि छोटी सी लौकी बहुत बड़ी बन गई है। फिर जांच पड़ताल से मालूम चला कि इंजेक्शन लगाने के बाद लौकी बड़ा होने के पहले ही बेच दिया गया जो उनकें घर में आकर बड़ा हो गया। शायद यह खबर आप लोगों ने इसी वेबसाईट पर वीण्एसण्दत्ता के लेख में पढ़ा होगा। अब आप ही तय करिए कि सतयुग का रावण ज्यादा खतरनाक है या आज के यह शैतान। 
पूरी दुनिया में युवा पीढ़ी को ईजी टारगेट मानकर अपना व्यापार फैला रही है ड्रग माफिया। कितने युवाओं का सुनहरा भविष्य ड्रग माफिया के कारण नष्ट हो रहा है। यह पूरी मानव जाति के दुश्मन हैं। कितने मां की गोद सूनी कर जाती है ड्रग। मां बाप की इकलौती संतान जो पढ़ाई लिखाई में अव्वल होते हैं जिस पर मां बाप की जीवन की सारी आशाएं टिकी होती हैं अक्सर सुनने में आता है कि ऐसे किसी युवा ने ड्रग का दामन थाम लिया। ड्रग माफिया के चंगुल में फंसने के बाद उस लड़काध्लड़की के सामने एक ही चीज इंतजार करती है वह है मौत। चाहे वह खुदकुशी के रूप में आए या उसे ड्रग ही समाप्त कर दे। अब उसके मां बाप के सामने होता है कभी न छंटने वाला अंधेरा। बलात्कारियों के बारे में क्या कहें। चोर डाकूओं से भी खतरनाक हैं यह बलात्कारी। समाज में सबसे घृणित प्राणी है बलात्कारी। बलात्कारी को इंसान नहीं कहना चाहिए क्योकि इससे इंसान का अपमान होता है।
तो दशहरे पर रावण या गोवा में छोटी दिवाली पर नरकासुर को कब तक जलाएंगे। क्या इन सब का पुतला जलाना आवश्यक नहीं है। मन तो होता है कि इनका पुतला नहीं इन लोगों को ही जलाया जाए। पर कानून हमें इसकी इजाजत नहीं देती और हमें हर समय कानून का सम्मान करना चाहिए। लेकिन हम इनका पुतला तो जला सकते हैं जिससे कि जनता में जागरूकता फैले।तो आइए अगले दश्हरे पर एक नई शुरूआत करें। आप आगे बढ़िए कारवां बनता जाएगा।

 

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