Tuesday, January 16, 2018
User Rating: / 0
PoorBest 

88 percent sexually abused kids suffer from anxiety

अखिलेश पांडे, मुंबई
एक सर्वेक्षण के अनुसार यौन शोषण के शिकार 88 प्रतिशत बच्चे घबराहट यानी एंग्जाइटी की गिरफ्त में आ जाते हैं। बाल यौन शोषण के खिलाफ काम करने वाली मुंबई की एक संस्था ने हाल ही में यह सर्वेक्षण किया था जिसके मुताबिक बचपन में यौन शोषण का शिकार होने वाले बच्चे घबराहट, मूड डिसऑर्डर, पर्सनैलिटि डिसऑर्डर सहित कई तरह की मानसिक और शारीरिक समस्या से परेशान रहते हैं। इससे उनमें डर, उदासी, बेरुखी, तनाव या अवसाद जैसे लक्षण दिखते हैं। लेकिन, अक्सर घर वाले इसे नजरअंदाज कर देते हैं।


ट्रॉमा से निकलना होता है मुश्किल
जे.जे.अस्पताल में बतौर मनोविशेषज्ञ कार्यरत डॉ स्वप्निल भोपी ने बताया कि यौन शोषण का शिकार होना एक 'हादसे' के जैसा होता है। यह एक तरह का ट्रॉमा होता है, जिससे बाहर निकलने के लिए काउंसलिंग की बहुत जरूरत पड़ती है। चूंकि बच्चे पहले से ही डरे-सहमे होते हैं, वे लोगों से इस बारे में बात करने में डरते हैं, पर अंदर ही अंदर अपने साथ हुए दुराचार को भुला नहीं पाते हैं। इससे वे घबराहट सहित कई दूसरी मानसिक समस्याओं की गिरफ्त में आ जाते हैं।

बच्चों की समझें समस्या
मानसिक रोग विशेषज्ञों के अनुसार घबराहट की समस्या एक रात में नहीं होती, यह धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। अगर बच्चे बहुत अधिक उदास रहने लगें, नियमित जीवन से कटने लगें, तो अभिभावक को इस पर ध्यान देना चाहिए। बच्चों के साथ बैठकर बात करनी चाहिए। अगर कोई बात उन्हें परेशान कर रही हो, तो उनके साथ दोस्त की तरह पेश आना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि बच्चों का यौन शोषण करने वाला कोई करीबी ही होता है।

पता नहीं, कैसे करें इलाज
यौन शोषण के शिकार बच्चों का उपचार कैसे किया जाए, इसके बारे में मानसिक रोग विशेषज्ञों को भी ठीक से नहीं पता है। इस मामले में खुद उन्हें भी ट्रेनिंग की जरूरत है। हेल्प इरैडिकेट अब्यूज थ्रू लर्निंग (HEAL) द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण में मुंबई के 61 मानसिक रोग विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। ये विशेषज्ञ पिछले कुछ सालों में यौन शोषण के शिकार 7000 हजार से अधिक बच्चों का इलाज कर चुके हैं।

मनोरोग विशेषज्ञ डॉ सागर मुंदड़ा ने कहा कि कैंसर, बर्न सहित कई दूसरे मरीजों के इलाज के लिए प्रोटोकॉल है, जबकि यौन शोषण के शिकार बच्चे के उपचार के लिए ऐसा कुछ नहीं है। पीड़ित बच्चे को कैसे और कब तक उपचार देना है, इसका कोई व्यापक दिशा निर्देश नहीं है। एक अन्य मनोविशेषज्ञ डॉ हरीश शेट्टी ने कहा कि बच्चों के साथ ही मानसिक समस्या से परेशान सभी मरीजों को उपचार में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। देश की पूरी आबादी के 14 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह की मानसिक समस्या से परेशान है। जबकि देशभर में मनोचिकित्सक और साइकॉलजिस्ट की संख्या 10-12 हजार के आसपास है। नतीजतन काम के बोझ के कारण विशेषज्ञ मरीज को ठीक से समय नहीं दे पाते। शहरी इलाकों में तो स्थिति थोड़ी ठीक है, लेकिन गांवों में हालत बदतर है।

Courtesy: Nav Bharat Times

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

Society-mirror

Who's Online

We have 2603 guests online
 

Visits Counter

769248 since 1st march 2012