Saturday, November 25, 2017
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sujata singh

शंकर, भगवती, व्यास और पिनाक वगैरह नाम यूं तो देवताओं के हैं, लेकिन भूलोक और खासकर हिंदुस्तान की राजनीति में ये कोई भी नाम अपना दैवीय प्रभाव कतई चरितार्थ नहीं कर पाए। कांग्रेस के खेमे वाले खुफिया नौकरशाहों की लॉबी ने प्रधानमंत्री तक की पसंद को दरकिनार कर दिया और अब जो नाम विदेश सचिव के तौर पर उभर कर आया है, वह हैं सुजाता सिंह। सुजाता सिंह फिलहाल जर्मनी में भारत की राजदूत हैं और पहली अगस्त से भारत के विदेश सचिवालय की मुखिया वाली कुर्सी संभालेंगी। मौजूदा विदेश सचिव रंजन मथाई इसी दिन अपने कार्यकाल का आखिरी दिन पूरा करेंगे। महिला सशक्तीकरण का झंडा फहराने पर ख्वाहिशमंद लोगों को सुजाता सिंह की इस शीर्ष नियुक्ति पर इतनी तसल्ली तो हो ही सकती है कि भारत के विदेश सचिवों में उनका नाम महिलाओं की सूची में जुड़ गया है। वे देश की तीसरी महिला विदेश सचिव बनने जा रही हैं। कुछ भी हो, केंद्र सरकार के इस कदम ने विदेश सचिवालय के सात साल पुराने कालिख को तो पोंछ ही लिया है, जो नौकरशाही में वरीयता को रौंदने में लगी थी।

अपनी पारिवारिक राजनीतिक व नौकरशाही से जुड़ी धमकदार पोस्टिंग वाली पृष्ठिभूमि को अगर छोड़ दिया जाए तो सुजाता सिंह का पूरा 37 बरस का कैरियर बेदाग ही रहा है। विदेश सेवा के अधिकारियों में राजनीतिक हस्तक्षेप तो सामान्य गुण माना ही जाता है। साथ ही शीर्ष नौकरशाही भी इसमें सहयोग करती रहती है। प्रशासनिक क्षमता और गुणों के विकास के लिए यह अनिवार्य भी माना जाता है, क्योंकि किसी भी अधिकारी की क्षमता को आंकने-मूल्यांकन के लिए यही एकमात्र तरीका होता है। लेकिन दिक्कत तो तब होती है, जब यह सारा मामला अंडर करेंट से उछल कर सरफेस पर पहुंच कर लोगों को जोरदार झटका दे जाता है। सुजाता सिंह के बारे में भी लोगों को यही जोरदार झटका लगा था। सुजाता के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि श्रेष्ठता के बावजूद वे जोड़तोड़ से यह कुर्सी जीत सकी हैं। दरअसल, खुफिया ब्यूरो; आईबी के अध्यक्ष रह चुके टीवी राजेश्वर ने हाल ही अपनी शादी की 60वीं सालगिरह समारोह आयोजित किया था। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में राजेश्वर आईबी के प्रमुख हुआ करते थे और मनमोहन सरकार ने उन्हें उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का ओहदा दिया था। एक पखवाड़ा पहले दिल्ली में हुए इस आयोजन में जमकर धूम-धड़ाका हुआ। राजनीति और नौकरशाही के दिग्गज इस पार्टी में खासतौर पर शामिल हुए। इनमें खास नाम था कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी का। आईबी के पूर्व मुखिया की शादी की इस सालगिरह पार्टी में सुजाता और उनका पूरा परिवार शामिल हुआ था। वजह यह कि सुजाता सिंह कांग्रेस के खानदानी खैरख्वाह माने जाने वाले नौकरशाह टीवी राजेश्वर की बेटी हैं।

बताते हैं कि इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रुचि जयशंकर को लेकर थी। लेकिन वह सारी जी-तोड़ कोशिश तब धुंआ हो गई, जब सुजाता सिंह के पिता की शादी की 60वीं वर्षगांठ समारोह में सोनिया गांधी ने पूरे समय अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इस पार्टी और उसमें कांग्रेस मुखिया की मौजूदगी को विदेश सचिवालय ने सुजाता सिंह के नाम पर अंतरनिहित सहमति के रूप में देखना शुरू कर दिया था। सो, नतीजा आ गया। जानकार बताते हैं कि विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने इस पार्टी के फौरन बाद ही सुजाता के पक्ष में खेमेबाजी शुरू कर दी और कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने सुजाता की नियुक्ति को मंजूरी दे दी। मालूम हो कि सुजाता सिंह के पति संजय सिंह भी भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठतम अधिकारियों में से रहे हैं और हाल ही वे पूर्वी क्षेत्र के मामलों के सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।

यों विदेश सचिव जैसे पद के लिए विभिन्न सचिवालयों के आला अधिकारियों के बीच होड़ सामान्य बात है। खुसरफुसर शुरू हुई थी कि चीन में भारत के राजदूत जयशंकर को अगले विदेश सचिव की कुर्सी थमाने की कोशिशें चल रही हैं। खासतौर पर चीन के ताजा माहौल और पिछले कुछ वक्त से भारत के साथ हल्के रिश्तों के मद्देनजर जयशंकर की भूमिका शुरू से ही सकारात्मक रही है। चीन में राजदूत के तौर पर उनका शानदार रिकॉर्ड होने की वजह से विदेश सचिव के पद के लिए उनके नाम की चर्चा थी।

मगर उनकी मुखालफत में जुटे लोगों का तर्क था कि जयशंकर का वरिष्ठता दर्जा सुजाता सिंह से एक बैच नीचे है। विदेश मंत्रालय के अन्य आला राजनयिक एस. जयशंकर का विरोध कर रहे थे। मनमोहन खेमा चाहता था कि चीन के मसले पर जयशंकर नाम की गोटी सफल हो सकती है, जबकि सोनिया खेमा चाहता था कि वरिष्ठता और श्रेष्ठता को कभी ठेस नहीं लगनी चाहिए। वैसे भी दूसरे मामलों का छोड़ भी दिया जाए तो सुजाता सिंह का नाम कभी किसी छोटे से विवाद में भी नहीं आया। वे सख्ती और नियमानुसार काम करने वाली अधिकारी हैं। साथ ही उनकी छवि चमत्कारिक और विजनरी ब्यूरोकेट्र की है। इसीलिए उन्हें इस पद पर जमाने के लिए एक साल का एक्सटेंशन भी दे दिया गया है। ऐसा कहा जा रहा है कि विदेश मंत्रालय के इस सर्वोच्च पद के लिए अन्य उम्मीदवारों में चीन में भारतीय राजदूत एस. जयशंकर, इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त जैमिनी भागवती, सचिव; पश्चिम सुधीर व्यास तथा सचिव; आर्थिक संबंध पिनाक रंजन चक्रवर्ती शामिल रहे हैं।

सीनियर को नजरअंदाज करके जूनियरों को आला पदों पर बिठाने का शौक भारत की सत्ता में काफी पुराना है। सन् 2006 में इसी तरह शिवशंकर मेनन को कई अधिकारियों की वरिष्ठता को धता बताकर विदेश सचिव बना दिया गया था। नतीजा, खूब दंगल हुआ और मंत्रालय में बगावत की हालत बन गई। लेकिन सुजाता सिंह को लेकर इस बार कोई विवाद नहीं उठा है। हालांकि चर्चाओं पर गौर करें तो वरिष्ठता के मुद्दे पर सुजाता ने धमकी भरा पत्र लिखा और कहा कि अगर उनकी वरिष्ठता पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह जर्मनी के राजदूत के पद से इस्तीफा दे देंगी। लेडी श्री राम कॉलेज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ीं-लिखी सुजाता हालांकि भारत के किसी भी पड़ोसी देश में राजनयिक नहीं रही हैं लेकिन यूरोप, इटली और फ्रांस में अपनी पदस्थापना से पहले वे 1982 से 1985 के बीच नेपाल के लिए अवर सचिव रह चुकी हैं। देश के विदेश सचिव की कुर्सी पर सुजाता से पहले दो महिलाएं चोकिला अय्यर और निरूपमा राव भी बैठ चुकी हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन दोनों ही महिला सचिवों ने अपना-अपना पूरा कार्यकाल शानदार और बेदाग रखा था। अब सुजाता सिंह की बारी है।

साभार : डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट

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