Friday, November 24, 2017
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childhood

बच्चे रूठेंगे, जिद करेंगे, गुस्सा करेंगे, शरारत करेंगे और झगड़ा भी। कई बार ऐसा लगेगा कि आपका बच्चा दूसरों से पिछड़ रहा है। ऐसे में आप क्या करती हैं? क्या खुद आप भी निराश हो जाती हैं?

       आपका लाडला बात-बात पर गुस्सा करे या चिड़चिड़ा कर कुछ बोले, तो इस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? जाहिर है इस हरकत के लिए उसे आप डांटेंगी या मारेंगी। लेकिन क्या इससे आपका बच्चा अपनी आदत छोड़ देता है। शायद नहीं! इसके उलट वह और भी जिद्दी बन जाता है। उसमें चिड़चिड़ेपन की समस्या बढ़ती जाती है। ऐसे में मां-बाप उहापोह में फंस जाते हैं कि क्या करें? कई बार तो ऐसी स्थिति में मां-बाप भी आपा खो देते हैं और बच्चे पर जोर-आजमाइश शुरू कर देते हैं। जिसका बच्चों पर विपरीत प्रभाव ही होता है। वो और अडि़यल हो जाता है। तो फिर कैसे रखें अपने बच्चे को चिड़चिड़ेपन से दूर, जानें एक्सपर्ट की राय

जानें चिड़चिड़ेपन की वजह

        डॉ. मिनी राव, (मनोविशेषज्ञ) कहती हैं कि अगर आपका बच्चा चिड़चिड़ा हो चुका है, तो सबसे पहले कारण को जानने की कोशिश करें। किस वजह से वह झल्लाता है या रूखेपन से बातें करता है, इस पर गौर करने की जरूरत है। जब बच्चों में चिड़चिड़ापन ज्यादा बढ़ने लगे, तो इसका मतलब होता है कि बच्चा मानसिक रूप से संघर्ष कर रहा है। कहीं-न-कहीं वो अंदर से आहत है या उसके अंदर किसी बात को लेकर झिझक है। कई बार पेरेंट्स अपने काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वो बच्चों को समय नहीं दे पाते। इस व्यस्तता की वजह से भी बच्चे के स्‍वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है।बढ़ते चिड़चिड़ेपन के कारण पेरेंट्स अक्सर बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर उनके साथ हिंसात्मक व्यवहार करने लगते हैं। ऐसा होने से बच्चे अपनी बात किसी भी दूसरे व्यक्ति के सामने कहने में डरने लगते हैं। कई बार मां-बाप की अनुपस्थिति में साथ में रहने वाले लोगों के व्यवहार से भी बच्चे आहत होते हैं। घर के सहयोगियों के डांटने या मारने पर भी बच्चे अपने मां-बाप से पूरी बात नहीं बता पाते।

        उनके स्कूल में भी कई बार परिस्थितियां कठिन होती हैं और समायोजन की समस्या हो जाती है। दूसरे बच्चों का व्यवहार और उनके पास की लुभावनी चीजें उनके चिड़चिड़ेपन का कारण हो सकती हैं। अगर पेरेंट्स वर्किंग हैं, तो उनके लिए यह समस्या और भी ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि वे बच्चे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। जिसके बदले वे बच्चों की तमाम इच्छाएं पूरी करने की कोशिश में लगे रहते हैं। मां-बाप को यह समझना होगा कि बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम की भरपाई भौतिक चीजों से नहीं की जा सकती। उनके साथ समय बिताना जरूरी है। बच्‍चे के गुस्से को शांत तरीके से संभालना होगा। अगर उसकी गलतियों पर आप जोर से चिल्लाएंगी, तो बच्चा भी तेज आवाज में रोने और चीखने चिल्लाने लगता है। ऐसे में आपका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। लेकिन इस स्थिति में आपको धैर्य रखना होगा। उसे समझाने की कोशिश करें कि वो जो कर रहा है, वो गलत है।

खुद को बदलना होगा

        तुलनात्मक रूप से आज के समय के बच्चों की सोच कहीं ज्यादा आधुनिक है। इसलिए मां-बाप को भी मौजूदा समय के हिसाब से खुद को ढालना होगा। बच्चों को नादान समझने की भूल न करें। उनसे जुड़ी बातों पर विस्तार से चर्चा करें और उन्हें प्यार से समझाएं। अक्‍सर बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार उनके व्यक्तित्व के विकास में बाधक सिद्ध होता है।

        अगर बच्चे से कोई भूल हो भी जाए, तो उस पर क्रोध करने के बजाय प्यार से उसे उसकी गलती का एहसास दिलाना ज्यादा कारगर उपाय साबित होता है। याद रखें, बच्चों की परवरिश के मामले में भावनात्मक संतुलन की भूमिका काफी अहम होती है। हर बात पर सख्ती बच्चों में चिड़चिड़ेपन को बढ़ाता है।

बच्चों पर न डालें बोझ

        मां-बाप को अपनी आकांक्षाओं का बोझ बच्चों पर नहीं डालना चाहिए। अक्सर खुद को सबसे आगे साबित करने के चक्कर में मां-बाप बच्चों को भी प्रतियोगिता में झोंक देते हैं। मसलन उन्हें सबसे बढ़िया दिखना है या सबसे ज्यादा नंबर लेकर आने हैं। अगर कम नंबर आए, तो मां-बाप बच्चों को कोसने लगते हैं। बच्चों के व्यक्तिगत विकास पर इसका बुरा असर पड़ता है। इससे उनके अंदर चिड़चिड़ापन या गुस्सा बढ़ सकता है। किसी विषय में अच्छे नंबर न ला पाना बहुत सामान्य-सी बात है। उस विषय में अच्छा करने के लिए बच्चे का हौसला बढ़ाना चाहिए।

        अगर बच्चा किसी एक विषय में अच्छा प्रदर्शन करता है, तो उसकी सराहना भी जरूरी है। बच्चे से आप ज्यादा-से-ज्यादा बात करें, उसे समय दें। इससे वो खुद को सुरक्षित महूसस करेगा और पढ़ाई में मन लगा पाएगा।

मनोवैज्ञानिक से सलाह लें

        अगर बच्चा लगातार दो हफ्तों से आक्रामक व्यवहार कर रहा है या चिड़चिड़ाता है, तो हल्‍के में न लें। अगर वह आपसे कोई बात नहीं बताता है, तो उसे काउंसलर के पास ले जाएं। फैमिली थेरेपी में बच्चे को मां-बाप के साथ बिठाकर बात की जाती है कि वह क्या चाहता है, उसकी समस्याएं और जरूरतें क्या-क्या हैं। इस तरह वे बच्चों के पल-पल बदलते व्यवहार को समझते हैं। बच्चे की काउंसलिंग अकेले भी की जाती है और परिवार के साथ भी।

न्यूट्रिशन का ख्याल

        बच्चों को पौष्टिक आहार न मिलने पर उनका समुचित विकास नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप वे शारीरिक रूप से कमजोर और चिड़चिड़े हो सकते हैं। इसलिए बच्चों की पसंद और पौष्टिकता में सामंजस्य बनाना जरूरी है ताकि उनकी विकास संबंधी सभी जरूरतें पूरी हों।

 

खोने न दें बच्चों की मासूमियत

        हर मां-बाप अपने बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि उनका बच्चा सबसे आगे रहे। हर क्षेत्र में वो अव्वल रहे और यही वजह है कि बच्चों पर अनजाने ही सही, हम दूसरों से बेहतर होने का दबाव बना देते हैं। जो उम्र बच्चों के खेलने-कूदने की होती है, उनके व्यक्तित्व विकास की होती है, उस उम्र में उन पर पढ़ाई में बेहतर होने का दबाव बनाया जाता है। प्रतियोगिता की इस अंधी दौड़ में पेरेंट्स अक्सर बच्चों की मूल प्रतिभा को किनारे कर देते हैं। माना अपने बच्चों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना अच्छी बात है। उनको सही-गलत में फर्क बताना जरूरी है, लेकिन भविष्य की चिंता करते-करते पूरा बचपन गंवा देना क्या ये सही है? नहीं न! अगर आप वाकई अपने बच्चों को अच्छे संस्कार और मूल्यों के साथ बढ़ता देखना चाहती हैं, तो उसे तनावमुक्त और सकारात्मक माहौल दें। उसे किसी बंधन में बांधने के बजाय अपने तरीके से आगे बढ़ने दें। ताकि वो बड़ा होकर आत्मनिर्भर बनें। उसकी खूबियों को पहचानें और उसे आगे बढ़ने में मदद करें। आपका यह प्रयास बच्चों को सही दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा।

साभार: अमर उजाला रूपायन

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