Friday, November 24, 2017
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independence day

कल 15 अगस्त 2013 को हमारा 67वां स्वतंत्रता दिवस था।15 अगस्त 1947 को भारत अंगे्रजों की गुलामी की बेडि़यों को तोड़ने में सफल हुआ। अगस्त माह का यह दिन सभी भारतवासियों के लिए गर्व का दिन है।स्वतंत्रता दिवस तो सभी मनाते हैं पर कितने लोग उन्हें याद करते हैं जिन्होने हमें स्वतंत्र भारत में सांस लेने का मौका दिया ।आजादी के युद्ध में स्त्री, पुरूष, युवा,बुजुर्ग सभी निस्वार्थ भाव से कूद पड़े थे।कितने माओं की गोद सूनी हो गई, कितनी पतिनयों की मांग सूनी हो गई लेकिन यह दुख भी उनके दिल से आजाद भारत का सपना दूर नहीं कर सका। इसी का परिणाम है कि देश 67वां स्वतंत्रता दिवस मना सका।

आजादी के युद्ध में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अंग्रेजों के विरूद्ध पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर देश की बेटियों ने अपना कर्तव्य निभाया।उन्होने अंग्रेजों के विरूद्ध कदम उठाए, वीरता और साहस तथा नेतृत्व की क्षमता का अभूतपूर्व परिचय दिया। 1857 के बगावत के समय राजघराने की महिलाएं आजाद भारत का सपना पूरा करने के लिए पुरूषों के साथ एकजुट हुईं। इनमें प्रमुख थीं इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर और झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई। 1857 की हार के बाद बि्रटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का स्थान बि्रटिश सरकार ने ले लिया और बि्रटिश शासन एक ऐतिहासिक सच बन गया।

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर मातंगिनी हाजरा और सरोजिनी नायडू आदर्श के रूप में देखी जाने लगी थीं।स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय महिलाओं ने सामाजिक बदलावों के लिए विद्रोही गतिविधियों में सकि्रय रूप से भाग लिया। महिलाओं की भागीदारी केवल सत्याग्रह तक ही सीमित नही थी। 19वीं शताब्दी के अंत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ महिलाओं की घनिष्टता बढ़ी और भारत के राष्ट्रीय गतिविधियों में उनका योगदान प्रारंभ हुआ।

1890 में भारतीय महिला उपन्यासकार स्वर्ण कुमारी घोषाल तथा बि्रटिश साम्राज्य की पहली महिला स्नातक कादम्बरी गांगुली, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मीटिंग में प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुईं।1905 में बंगाल के विभाजन के साथ ही देश की स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

महिलाओं ने भी बि्रटिश शासन का विरोध करने के लिए विदेशी सामानों का बहिष्कार किया जिसे पिकेटिंग कहा जाता था। श्रीमती ननीबाला देवी नई जुगांतर पार्टी में शामिल हुईं जो 20वीं सदी के शुरूआत में आक्रमणकारी गतिविधियों के लिए जानी जाती थी।1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने पर महात्मा गांधी ने अहिंसा नीति अपनाने का नारा दिया। सत्याग्रह आंदोलन के लिए उनके एक आवाज पर महिलाएं उनके सभी कार्यक्रमों में शामिल होने लगीं। कुछ महिलाएं जिन्होने स्वदेशी आंदोलन में सकि्रय भूमिका निभाई - सरोजिनी नायडू , उर्मिला देवी , दुर्गा बाई देशमुख , एस अमबुजाम्मल , बासंती देवी और कृष्णाबाई राम।

पढ़े लिखे और उदारवादी परिवारों की महिला तथा ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं ने भी महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सकि्रय रूप से हिस्सा लिया। राजकुमारी अमृत कौर , सुचेता कृपलानी, सरला देवी चौधरानी, मुथुलक्ष्मी रेडडी, सुशीला नायर और अरूणा आसफ अली कुछ महिला स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं जिन्होने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था। कस्तूरबा गांधी और कमला नेहरू ने राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा लिया। लाडो रानी जुत्शी और उनकी बेटियों ने लाहौर में आंदोलन का नेतृत्व किया। नेहरू परिवार की बेटी विजय लक्ष्मी पंडित ने भी असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ीं। उन्होने विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वह 1936 में उत्तर प्रदेश एसेंबली में चुनी गईं। 1937 में वह भारत की पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनी। अरूणा आसफ अली दिल्ली की पहली मेयर चुनी गईं। सरोजिनी नायडू ने खिलाफत आंदोलन के लिए सकि्रय रूप से प्रचार किया।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इनिडयन नेशनल आर्मी का गठन किया था। इसमें पुरूषों और महिलाओं का अलग अलग रेजिमेंट था। महिलाओं के रेजिमेंट का नाम झांसी की रानी पर रखा गया। नेताजी ने इस रेजिमेंट के लिए 1000 महिलाओं को एकति्रत किया। डा. लक्ष्मी स्वामीनाथन ने इस रेजिमेंट का नेतृत्व किया। वह पेशे से चिकित्सक थीं। विवाह के बाद वह लक्ष्मी सहगल बन गईं। इस रेजिमेंट की महिलाओं का प्रशिक्षण भी पुरूषों के रेजिमेंट के समान ही होता था। उन्हें पोशाक भी पुरूष सैनिकों के समान ही पहनना पड़ता था। युद्ध क्षेत्र में नेताजी की आई एन ए कई कारणों से ज्यादा गहरी छाप न छोड़ पाई हो लेकिन इन महिलाओं की वीरता की कहानी ने भारत की दूसरी महिलाओं पर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक असर छोड़ा।

एक ओर गांधीजी के साथ अनेक देशभक्त महिलाएं थी, कांग्रेस में भी महिलाएं शामिल हो रही थीं। देश के सभी हिस्सों से महिलाएं क्रांतिकारी गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं। काकोरी कांड में महिलाओं का योगदान था। सन 1928 में लतिका घोष ने महिला राष्ट्रीय संघ की नींव डाली। बीना दास ने बंगाल के गर्वनर को गोली मारी थी। कमला दासगुप्ता और कल्यानी दास कांति्रकारी दल के साथ सकि्रय रूप से जुड़ी थीं। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में महिलाओं ने वीरता के साथ क्रांतिकारी और अहिंसक आंदोलनों में भाग लिया। भारत के इन महिलाओं का लक्ष्य एक ही था आजाद भारत, परंतु उसे पाने का रास्ता अलग। दोनों रास्ते पर चलने के लिए बेहद दृढ़ मानसिकता और अदम्य साहस की आवश्यकता होती है। एक ही लेख में भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी सभी महिलाओं का नाम भर लेना असंभव है। यह तो एक झलकी भर है। उस जमाने में बहुत सी बाधाओं के बावजूद स्वाधीनता संग्राम में भारतीय महिलाओं का योगदान पुरूषों से कम नहीं था।

Comments 

 
#2 hgdfryty 2014-02-09 18:36
:D :lol: :-) ;-) 8) :-| :-* :oops: :sad: :cry: :o :-? :-x :eek: :zzz :P :roll: :sigh: :D
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#1 akash kumar verma 2013-12-11 20:07
:lol: :-) ;-) :-| :sad: :cry: :o :-? :-x :zzz :zzz :roll: :sigh: :zzz :o :cry: :D :D
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