Friday, November 24, 2017
User Rating: / 3
PoorBest 

 madhubani paintings

बिहार की महिला  मधुबनी पेंटिंग बनाती हुर्इ

मधुबनी पेंटिंग पारंपरिक रूप से गांव की महिलाएं बनाती हैं। इस भारतीय चित्रकला को मिथिला पेंटिंग भी कहते हैं क्योंकि यह मिथिला क्षेत्र में बनार्इ जाती है। भारत के बिहार राज्य के मधुबनी और दरभंगा शहर के आस पास तथा उससे सटे नेपाल की तरार्इ का कुछ क्षेत्र उसमें आता है। यह पेंटिंग उंगलियों, टहनी, ब्रश, निब-पेन और माचिस की तीली से बनार्इ जाती है। इसको बनाने में केवल प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है।

madhubani paintings1

झोपड़ी की दीवार पर मधुबनी

पारंपरिक रूप से यह पेंटिंग गांव में बने झोपड़ी की मिटटी की दिवारों पर और झोपड़ी के फर्श पर बनार्इ जाती थी। अब यह कपड़ों, हस्त निर्मित कागज एवं कैनवस पर भी बनार्इ जाती है।

मधुबनी बनाने का रंग पेड़ पौधों से बनाया जाता है। इसलिए इन पेंटिंग्स में एक अलग सी चमक दिखार्इ देती है।

मधुबनी में प्रकृति और मानव के साहचर्य का दृश्य, प्राचीन महाकाव्य के किरदार जैसे रामायण,महाभारत इत्यादि, देव-देवी, प्राकृतिक वस्तुएं जैसे सूरज, चंद्रमा, धार्मिक पौधा तुलसी को चिति्रत किया जाता है। राज दरबार और सामाजिक कार्यक्रम जैसे विवाह के दृश्य को भी पेंटिंग पर बनाया जाता है।पारंपरिक रूप से मधुबनी पेंटिंग मिथिला क्षेत्र के परिवारों तक ही सीमाबद्ध थी। इस चित्रकारी का कौशल गांव की महिलाओं के पास था जो अपनी अगली पीढ़ी को हस्तांतरित कर देती थी। परंतु यह घर के अंदर होता था। ही इसे पहचान मिली थी ही व्यवसायिक रूप।

प्राकृतिक विपदा और मधुबनी पेंटिंग

मिथिला पेंटिंग्स का संपर्क 1934 से पहले बाहरी दुनिया से नहीं हुआ था। 1934 में बिहार में बहुत बड़ा भूकंप आया था। इससे मकानों की दीवारें ढ़ह गर्इ और मधुबनी जिले के बि्रटिश अधिकारी विलियम जीण्आर्चर ने क्षतिग्रस्त इलाके का दौरा किया था। वहीं पर उन्होने घर की दीवारों पर एक खास तरह की चित्रकला देखी। आर्चर इस चित्रकला की खूबसूरती को देखकर दंग रह गये और उन्होने आधूनिक पशिचमी चित्रकारों जैसे क्ली, मीरो और पिकासो से इसकी तुलना की। 1949 में उन्होने इंडियन आर्ट जरनल, मार्ग में इस चित्रकला पर एक लेख लिखा और यह कला दुनिया के सामने आया।

 मधुबनी चित्रकला का प्राकृतिक विपदा से गहरा नाता है। एक प्राकृतिक विपदा ने इसकी पहचान बाहर की दुनियी से करार्इ। एक  अन्य प्राकृतिक विपदा ने इसे व्यवसायिक रूप दिया। 1960 के दशक के अंत में इस क्षेत्र में भयानक सूखा पड़ा। तभी आल इंडिया हैंडीक्राफट बोर्ड ने कुछ उच्च जाति की महिलाओं को दीवारों पर पेंटिंग बनाने के स्थान पर कागज पर पेंटिंग्स बनाने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि यह आय का स्रोत बन सके। इनमें से कुछ महिलाएं शानदार चित्रकार बनी। चार महिलाओं ने तो इसके कुछ दिन बाद ही यूरोप, रूस और अमरीका के सांस्कृतिक मेले में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इनके राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पहचान से प्रेरित होकर अन्य जाति यहां तक कि दलित महिलाएं भी मधुबनी पेंटिंग्स बनाने लगीं। तो यह थी मधुबनी पेंटिंग्स के बिहार से विदेशों तक जाने की कथा।

madhubani paintings2

जगदम्बा देवी की बनार्इ मघुबनी पेंटिंग

1970 में मधुबनी पेंटिंग को आफिशियल पहचान तब मिली जब भारत के राष्ट्रपति ने मधुबनी के निकट जितबारपुर के श्रीमती जगदम्बा देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया। इस तरह जगदम्बा देवी मधुबनी चित्रकला के क्षेत्र में नेशनल अवार्ड पाने वाली प्रथम महिला बन गर्इ।बाद के मधुबनी कलाकार भी इनके पद चिन्हों पर ही चले लेकिन कोर्इ भी इनकी बराबरी नहीं कर पाया। इसके  अलावा श्रीमती सीता देवी, श्रीमती महासुंदरी देवी, श्रीमती गोदावरी दत्त, श्रीमती भारती दयाल तथा बुआ देवी को भी भारत के राष्ट्रपति ने इसी क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार दिये। श्रीमती भारती दयाल ने स्वतंत्र भारत में कला के पचास वर्षों के  लिए आल इंडिया फाइन आर्टस एंड क्राफट की ओर से पुरस्कार जीता। मिथिला पेंटिंग में कलमकारी के लिए उन्हें स्टेट अवार्ड मिला। उनकी पेंटिंग 'एटरनल म्यूजिक को सन 2000 का मिलेनियम आर्ट प्रतियोगिता में स्र्वोच्च पुरस्कार मिला। उन्हें विशिष्ट बिहारी सम्मान से सम्मानित किया गया। श्रीमती महासुंदरी देवी को 2011 में पदम श्री से नवाजा गया।

madhubani paintings3

तसर  सिल्क की साड़ी पर मधुबनी चित्रकला से चिति्रत पल्लू बार्डर

धीरे धीरे मधुबली पेंटिंग ने व्यवसायिक रूप लेना प्रारंभ कर दिया और यह पेंटिंग बिहार के बाहर भी घरों के दीवारों पर सजने लगी। पेंटिंग की दुकानों पर छोटे बड़े तरह तरह के नाप के मधुबनी पेंटिंग मिलते है। इस पेंटिंग का कार्ड भी मिलता है।

अब मधुबनी पेंटिंग कैन्वस और कागज की दुनिया से कपड़ों की दुनिया में प्रवेश कर गया।दीवारों को सजाने के साथ साथ इंसानों को भी सजाने लगा।

साड़ी का किनारा और पल्लू मधुबनी चित्रकला से चिति्रत होने लगा। सबसे पहले तसर सिल्क साड़ी पर मधुबनी ने दस्तक दिया। फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा। आमतौर पर तसर सिल्क की साड़ी तसर कलर की ही होती है। मधुबनी चित्रकला वाली साड़ी विशेष समारोह में पहनने लायक है।

madhubani paintings4

क्रेप सिल्क की साड़ी पर मधुबनी पेंटिंग द्वारा संपूर्ण रामायण का चित्रण

madhubani paintings5

जार्जेट की साड़ी पर पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग

madhubani paintings6

कोटा काटन साड़ी पर मधुबनी पेंटिंग

इसके बाद काटन साड़ी पर भी मधुबनी चित्रकला नजर आने लगी यहां तक कि दक्षिण की काटन साड़ी पर भी। दक्षिण की साड़ी पर उत्तर की चित्रकला।

madhubani paintings7

केरल काटन साड़ी पर मधुबनी शैली में कृष्ण रास लीला

 यानि उत्तर भारत और दक्षिण भारत का मेल। जार्जेट, के्रप सिल्क इत्यादि की साड़ी पर भी मधुबनी बनने लगी। अब पल्लू और बार्डर के साथ पूरे साड़ी पर भी मधुबनी चित्रकारी होने लगी।

साड़ी के बाद अब कुर्ती, दुपटटा, टी-शर्ट पर भी मधुबनी पेंटिंग बनने लगी। रंग बिरंगे कुर्ती को मधुबनी चित्रकला ने वेरी स्पेशल बना दिया और यह सब कुछ आज भी महिलाएं ही हाथ से बनाती रही हैं।

अब तो कपड़ों पर मधुबनी चित्रकला की एक अलग दुनिया बस गर्इ है। बड़े बड़े बुटीक में तो सिल्क का लहंगा, काटन स्कर्ट, स्कार्फ इत्यादि मिलता है।

इतना ही नहीं मर्दों के कपड़ों पर भी मधुबनी चित्रकला ने अपनी पैठ बना ली। उनके लिए तसर सिल्क का कुर्ता और जैकेट बनता है। बच्चों का काटन तसर सिल्क का कुर्ता और जैकेट बनने लगा है। बेड कवर,पिलो कवर,कुशन कवर सभी कुछ मिलता है। यह सूचि तो दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है।

महिलाओं द्वारा झोपड़ी की दीवारों पर प्रारंभ किया गया यह कला बहुत लंबा सफर तय करके आज आसमान को छू रहा है। अब यह केवल एक कला रह कर व्यवसाय बन चुका है। फलते फूलते इस व्यवसाय में कुछ पुरूषों ने भी प्रवेश किया है। परंतु आज भी वर्चस्व और श्रेय महिलाओं का ही है। कपड़ों पर भी मधुबनी पेंटिंग हाथ से ही बनार्इ जाती है और महिलाएं ही इसे बनाती हैं। मधुबनी पेंटिंग महिलाओं के जीविका का एक अच्छा स्रोत है। चित्रकारी से भी आय होती है और बने हुए सामान को बेचने के लिए भी विभिन्न शहरों में अनेक महिलाएं आगे चुकी हैं।

महिलाएं घर से या बुटीक बनाकर इसका व्यवसाय कर सकती हैं। महिलाएं अपने आप को बेबस समझें। आप मधुबनी को भी अपने आय का जरिया बना सकते हैं अगर आपको यह चित्रकारी भी आती हो तो। यदि गांव की कुछ महिलाएं इसे व्यवसायिक रूप देने की हिम्मत दिखा सकती हैं तो क्या हम आज पीछे हट जाएंगे। यह केवल व्यवसाय नहीं बलिक भारत के एक प्रदेश बिहार के एक जिले मधुबनी की संस्कृति और धरोहर को सहेजना भी है।

 

 

 

Comments 

 
#1 Bharat Bhushan 2015-12-01 08:49
मधुबनी काला और कलाकारों के संबंध में अच्छी जानकारी।
Quote
 

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

women empowerment

Who's Online

We have 3040 guests online
 

Visits Counter

750960 since 1st march 2012