Friday, November 24, 2017
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बेटी को सही रास्ता दिखाने के लिए, उसका भविष्य उज्जवल बनाने के लिए माता-पिता बेटी के दोस्त बनें। हमारे देश के ज्यादातर घरों में बेटी को पराया धन समझकर पाला जाता है। बचपन से ही बेटी को कहा जाता है कि आदत सुधारो, नहीं तो ससुराल जाकर क्या करोगी। बेटी के दिमाग में भी यही बात बैठ जाती है कि पिता का घर उसका असली घर नहीं है। असली घर तो ससुराल है।

आज जमाना बदल रहा है। जीवन के हर क्षेत्र में लड़कियां सफल हो रही हैं, लड़कों के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ रही हैं। अब वह दिन नहीं रहे जब लड़कियां एक उम्र के बाद घर में बैठकर शादी का इंतजार करती थीं। आज लड़कों की तरह ही थोड़ी बड़ी होने पर उसकी भी बाहर की अपनी दुनिया बन जाती है।

जिंदगी के इस मोड़ पर लड़कियां कोई गलत कदम न उठा लें इसके लिए आवश्यक है बेटी का माता-पिता के साथ दोस्ताना संबंध जिसकी नींव बेटी के बचपन मे ही डालनी चाहिए। बेटी को केवल डांटने, पीटने से ही उसे सही रास्ता नहीं दिखाया जा सकता है। जबसे वह स्कूल जाना शुरू करती है तभी से मां को चाहिए दोस्त की तरह उसके साथ पेश आएं। केवल दोस्त बनने का दिखावा न करें वास्तव में दोस्त बनिए। इसके लिए बेटी से स्कूल की सभी बातें जानें लेकिन जिरह न करें। बेटी को अपने स्कूली जीवन की घटनाएं बताएं। बचपन में आप स्कूल में क्या शरारत करती थीं यह भी उसे बताएं। मां के शरारत के बारे में जानने के बाद ही तो बेटी भी खुलकर आपको बताएगी कि वह स्कूल में क्या शरारत करती है। अपने स्कूली दोस्तों और शिक्षकों तथा उनकी आदतों के बारे में बताएं, देखिए बेटी भी अपने स्कूल के दोस्तों और शिक्षकों तथा उनकी आदतों  के बारे में आपको बताने लगेगी जो जानना आपके लिए बहुत जरूरी है। इस तरह मां को दोस्त समझकर हर बात बताने की आदत बचपन से ही पड़ जाएगी और बेटी बच्ची से किशोरी, किशोरी से युवती बन जाएगी लेकिन मां से हर बात शेयर करने की आदत  नहीं छूटेगी। वह आपसे स्कूल के बाद कॉलेज और कॉलेज के बाद ऑफिस, यहां तक कि शादी के बाद ससुराल तथा पति की बातें भी शेयर करेगी।

पिता को भी बेटी का दोस्त बनना चाहिए और वह मां ही कर सकती है। हमारे समाज में बेटी और पिता में हमेशा दूरी बनाया जाता है। बेटी को बचपन से ही समझाया जाता है कि पिता भी पुरूष हैं और बेटी को पिता के साथ ऐसे ही व्यवहार करना चाहिए। पुत्री को अपनी व्यक्तिगत समस्या और राजमर्रा की बातें पिता से शेयर नहीं करनी चाहिए, पर यह गलत है। पिता बेटी के लिए सिर्फ पिता हैं पुरूष नहीं। बेटी को बेझिझक अपनी सभी बातें पिता से भी शेयर करनी चाहिए। मां को चाहिए कि बेटी किशोरी हो जाने के बाद जब अपने पति से कोई बात करे तो बेटी के सामने करे चाहे वह पड़ोसन की बेटी के बारे में कोई बात हो या परिवार का कोई राज, बेटी को इसमें भी भागीदार बनाएं। उसके विचार सुनें, जब आपको लगे कि उसके विचार सही हैं  तो उस पर अमल करें। छोटी है यह सोचकर उसकी सही बात को भी नजर अंदाज न करें।

माता-पिता और किशोरी बेटी एक साथ बैठकर सभी प्रकार की बातें करें, टीवी देखें, घर में कोई भी समस्या हो चाहे वह आर्थिक हो या और कोई गहरी समस्या सभी आलोचना बेटी के साथ और बेटी के सामने करना चाहिए। मां को चाहिए बेटी को सिखाएं कि अपनी सारी बातें पिता को बताओ। इसके लिए पिता को भी अपनी युवावस्था की बातें, अपने दोस्तों की बातें बेटी से करनी चाहिए। जैसा एक दोस्त दूसरे दोस्त से करता है।

पिता और बेटी में दोस्ताना संबंध बनाने के लिए मां को अहम भूमिका निभानी पड़ती है। बेटी की कोई भी गलती उसके पिता से न छुपाएं बल्कि बेटी से कहें कि वह पिता के सामने अपनी गलती कबूल करे और कहे कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। आप अपने पति से कह के रखें कि बेटी आपके पास आकर अपनी गलती कबूल करेगी लेकिन आप उसे डांटिएगा नहीं बल्कि प्यार से समझाइगा, जिससे कि वह आपसे डरे नहीं। मैने भी अपनी बेटी को इसी तरह पाला है। बचपन से लेकर जब तक उसके पिता जीवित थे वह कोई भी गलती करे चाहे वह छोटी मोटी गलती ही क्यों न हो जैसे कप या ग्लास टूट जाना या मम्मी से तकरार, स्कूल में झगड़ा इत्यादि। कोई भी गलती जब तक वह अपने पापा से नहीं बताती थी उसे चैन नहीं मिलता था। उसके पापा पत्रकार थे इसलिए रात को काफी देर से घर आते थे लेकिन वह जागकर पापा का इंतजार सीढ़ी के ऊपर खड़ी होकर करती थी। पापा के आते ही अपनी गलती उनके सामने कबूल करने के बाद ही उसे चैन आता था। इस बात को दशकों गुजर चुके हैं लेकिन उसकी आदत नहीं बदली। आज उसके पापा नहीं रहे, फिर भी वह अपनी सारी बातें अपने पापा के फोटो के सामने जाकर कहती है तभी उसे चैन पड़ता है।

बेटी और पिता में इस तरह का संबंध बनाने के लिए पति-पत्नी के आपसी संबंध और नजदीकियां काफी हद तक त्याग करना पड़ता है। यह थोड़ा कठिन जरूर है पर वह माता-पिता ही क्या जो अपनी बेटी के उज्जवल भविष्य के लिए इतना न कर सके।

 

 

 

 

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