Saturday, November 25, 2017
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बच्चों से उनका बचपन न छीनें। बचपन की यादें बच्चों के मन के पन्ने पर सुन्हरे अक्षरों में लिखी होनी चाहिए जो उसे जिंदगी भर खुशहाल बचपन की याद दिलाती रहे। जिससे यह बच्चे बड़े होकर जब खुद माता या पिता बनें तब अपने बच्चों का बचपन खुशियों से भर सकें। अगर बच्चे का बचपन कड़वाहट भरा हो और अपने माता.पिता से वह प्यार न मिले जो उन्हें मिलना चाहिए तो वह बड़े होकर कभी अच्छे माता.पिता नहीं बन सकते। बचपन हमेशा खुशहाल होना चाहिए क्योंकि इंसान की जिंदगी में बचपन के अनुभव हमेशा अहम भूमिका निभाते हैं। प्रकृति के नियम से माता-पिता बच्चे को दुनिया में लाते हैं। मां बच्चे को जन्म देती है और पिता के सहयोग से उसका लालन पालन करती है। माता-पिता बच्चे को दुनिया में लाते हैं अपनी खुशी के लिए क्योंकि कहते हैं जिसे माता पिता बनने का सुख प्राप्त नहीं होता उसकी जिंदगी अधूरी है। बच्चे जब बिल्कुल छोटे होते हैं तब मां ही तय करती है कि वह क्या खाएगा, क्या पहनेगा, किस तरह रहेगा। यह सिलसिला पांच साल तक चलता है। आजकल बच्चे स्कूल जल्दी जाते हैं। काफी कम उम्र में ही माता पिता के अलावा भी बाहरी दुनिया से परिचित हो जाते हैं। उनकी अपनी पसंद नापसंद और स्वाभिमान का विकास भी जल्दी हो जाता है।
अधिकतर परिवारों में बच्चे को माता पिता अपनी प्राॅपर्टी मानते हैं। उन्हें अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं। उनके अनुसार न चलने पर बच्चे को मारा, पीटा, डांटा जाता है। यह सब कुछ मेहमानों के सामने भी चलता है।मा बाप यह नहीं सोचते कि इससे बच्चे स्वयं को अपमानित महसूस करते हैं। कुछ दिन बाद बच्चे इसके आदि हो जाते हैं और मां बाप के मार पीट का बच्चे पर कोई असर नहीं होता है। तब यह समझ लेना चाहिए कि उनका स्वाभिमान कम होता जा रहा है जो बच्चों के विकास में बहुत बड़ा बाघक बन जाता है।
बच्चे के लालन पालन का अर्थ केवल उन्हें टाईम से खाना खिलाना, कपड़़े पहनाना और स्कूल भेजना नहीं होता है। बच्चे का लालन पालन ऐसे होना चाहिए जिससे कि उसकी मानसिक शक्ति और बुद्धि का विकास हो। अधिकांश माता पिता बच्चे को अपनी प्राॅपर्टी मानकर चलाना चाहते हैं।वह जो चाहेंगे बच्चा वही खाएगा, उनकी पसंद के कपड़े पहनेगा,जिसके साथ दोस्ती के लिए मम्मी पापा कहेंगे उसे ही दोस्त बनाएगा इत्यादि। यह पहले के जमाने में होता था परंतु आज संभव नहीं है। जब मैं छोटी थी तब मुझे मेरे माता पिता अपनी मर्जी के अनुसार चलाते थे। हर काम उनसे पूछकर उनके इच्छानुसार करती थी। ऐसे ही बड़ी हुई, शादी हुई और ससुराल आई। वहां भी हर काम सास ससुर की मर्जी के अनुसार ही करती थी। सास ससुर के बाद पति से पूछती थी। अब पति नहीं हैं तो बेटी से पूछती हूं। बेटी कहती है कि आप सही निर्णय ले सकती हैं तो लेती क्यों नहीं। मेरे बचपन में प्यार की कमी तो नहीं थी लेकिन परवरिश में कहीं कोई चूक अवश्य रह गई है क्योंकि मैं सही निर्णय ले सकती हूं परंतु आदत ऐसी हो गई है कि कहने से पहले किसी से पूछती जरूर हूं।
हमारे समय के बच्चे इसी तरह बड़े होते थे। मेरी इस कमी का अहसास मुझे और मेरे पति को था। जब मैं मां बनी तो हम दोनों ने सोच लिया कि अपनी इच्छा अपनी बेटी पर नहीं थोपेंगे। उसे अपनी इच्छानुसार बड़ा होने दिया। अपनी मर्जी से वह पत्रकार बनी।
इसका मतलब यह नहीं कि बच्चे पर आपका नियंत्रण रहेगा ही नहीं।बच्चे पर पूर्ण नियंत्रण रखें परंतु बच्चे यह न समझें कि हमें हर बात पर मम्मी पापा के कहे अनुसार चलना पड़ता है। अपने घर का माहौल ऐसा बनाइए कि बच्चे का संपूर्ण विकास हो और वह गलत रास्ते पर न जाए। बच्चे को अच्छी परवरिश देने के लिए माता पिता दोनों को अपनी खुशी का बलिदान देना पड़ता है। एक बार बच्चा यह समझ ले कि उसके माता पिता उसके लिए त्याग कर रहे हैं तो वह कभी भी गलत रास्ते पर नहीं जाएगा।माता पिता को त्याग इसलिए करना पड़ेगा क्योंकि बच्चे तो पृथ्वी पर आते हैं प्रकृति के नियम से पर बच्चा पति पत्नी को एक नया जन्म देता है माता पिता के रूप में।
माता पिता को यह नहीं समझना चाहिए कि बच्चे को दुनिया में लाकर उन्होने बच्चे पर कोई अहसान किया है। यह तो माता पिता का फर्ज है कि बच्चों का लालन पालन करना पड़ेगा। मैं जिस घर में रहती हूं उसमें मेरे नीचे वाले फ्लोर पर एक परिवार रहता है । पति, पत्नी, बेटा, बेटी। पति की टूरिंग जाॅब है। बेटा आठ साल का है और बेटी बारह की। परवरिश के नाम उनकी मां बच्चों पर इतना अत्याचार करती है कि मेरे लिए सहन करना मुश्किल हो जाता है। उस घर की प्रत्येक बात मेरे घर में सुनाई देती है। एक साल पहले से ही वह हर छुट्टी के दिन घर का झाड़ू पोंछा बेटी से करवाती है और थोड़ी सी गलती होने पर बच्ची को ऐसे पीटती है जैसे चोरों को पीटा जाता है। बेटे को भी छोटी सी गलती होने पर पीटती है। बच्चों को गंदी.गंदी गाली देना, खाना न देना, कमरे में बंद कर देना यह तो रोज की बात है। आए दिन लड़की को घर से निकाल देने की धमकी देना तो उसके लिए छोटी सी बात है। करीब एक साल से इनको देख रही हूं , कभी बच्चों को प्यार करना या दो मीठी बातें करते नहीं सुना। इसका नतीजा यह हुआ कि पहले तो बच्चे मारने पीटने से खूब रोते थे। आजकल रोते कम हैं लेकिन समहे समहे से रहते हैं। बच्चों के व्यवहार से प्रतीत होता है कि उनका स्वाभिमान धीरे धीरे खत्म हो रहा है। हम लोगों को अक्सर समाचार पत्र या टीवी के माध्यम से मालूम होता है कि तेरह चैदह साल की लड़की ने आत्महत्या कर ली या किसी के साथ भाग गई। हम लोग सोचते हैं कि इतनी छोटी लड़की ने इतना बड़ा कदम कैसे उठा लिया ? शायद इस तरह के माता पिता की लड़की ही ऐसा कर सकती है।
हर माता पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे आदर्श बच्चे बनें। यह चाहत स्वाभाविक है। परंतु आदर्श बच्चा पाने के लिए आपको आदर्श माता पिता बनना होगा। बच्चों को जो देंगे वही लौटकर आएगा। मतलब बच्चे को आप नफरत देंगे तो आपको भी बच्चे से नफरत ही मिलेगा। बच्चे को भरपूर प्यार दें,उसका सम्मान करें, उसे अपनी प्राॅपर्टी न समझें आपको भी बच्चे से प्यार और सम्मान मिलेगा तथा आपका बच्चा आदर्श बनेगा।

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