Friday, November 24, 2017
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Empowerment-For-Women

बीसवीं शताब्दी से ही नारी उत्थान का बिगुल बजता चला आ रहा है । वैसे नारी ने तो समाजोत्थान में अपनी अहम् भूमिका निभाना बहुत पहले से प्रारंभ कर दिया था । उसे तो जन्म से ही घर और बाहर दोनों को संवारने की क्षमता प्रकृति से ही मिली थी,कमी रही तो सदा ही अवसर की । उसने जब भी अपनी क्षमताओं को समाज के लिए उपयोग करना चाहा, ये समाज ही दीवार बन कर उसके सम्मुख खड़ा हो गया । जिस कारण महिलाओं को बड़ी-बड़ी विरोधी ताकतों से टकराना पड़ा । महिला सशक्तिकरण के नाम पर संविधान व मानवाधिकार के अंतर्गत महिलाओं को संरक्षण देने हेतु बहुत से क़ानून व आदेश भी पारित किये गए किन्तु उनका लाभ कितने प्रतिशत प्राप्त हुआ पीड़ित महिलाओं को ! अधिक विस्तार में न जा कर मैं
कहना चाहूँगी कि इस दिशा में इतना अधिक कार्य होने के बावजूद हमारे देश की नारी आज भी उत्पीड़न की शिकार है । घर हो बाहर उस पर ज़ुल्म और अत्याचार होते ही चले आ रहे हैं । उत्पीड़न का दानव विभिन्न प्रकार के रूप धर कर प्रतिपल उसे दबोचने की घात लगाए बैठा रहता है । फिर बड़ी-बड़ी, लम्बी-लम्बी बातें करने वाले हमारे समाज के मठाधीश और अनेकों महिला संगठनों व संस्थाओं के मालिक पीड़िता को न्याय दिलाना तो दूर की बात, उल्टा उस सारी स्थिति-परिस्थिति का दायित्व पीड़ित नारी के सिर मढ़ कर खुद को बरी कर लेते हैं । विभिन्न राजनीतिक संगठन भी इस मामले में पीछे नहीं रहते, बस उन्हें मुद्दा चाहिए । मुद्दा मिल गया । धरना प्रदर्शन, आन्दोलन, सब कुछ हुआ, खूब शोर मचा, कुछ नेतागण ' हाई लाइट ' भी हो गए, फोटो खिंच गए, अख़बार में छा गए । फिर आगे क्या हुआ --दूसरी तरफ पैसा चल गया या किसी बड़े नेता, डॉन या फिर कोई सरकारी अफसर का फोन आ गया । बस कहानी ख़त्म । कहाँ पीड़ा तो कहाँ पीड़िता ।
अनेक छोटी-बड़ी घटनाएं हर दिन घटित होती रहती हैं । आदि काल से ही समाज ने नारी को दोयम दर्जे पर रखा है । यह अंतर घरों से ही शुरू हो जाता है, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो प्रायः यही देखने में आता रहा है कि यदि घर में बेटा-बेटी दोनों हैं तो हर सम्मान, हर सुविधा पहले पुत्र को ही मिलेगी बाद में यदि संभव हुआ तो पुत्री को मिलेगी या फिर उसे कुछ कह-सुन कर समझा दिया जाएगा, वह समझती भी चली आयी है क्योंकि यह समझ उसके स्वभाव में जन्म से ही रची-बसी है । उदाहरण के तौर पर----' यदि घर में दूध सीमित मात्रा में है तो पहले बेटे को दिया जाएगा, बचने पर बेटी पा सकती है या चाय-वाय दे कर काम चला लिया जाता है । ' ठीक यही स्थिति शिक्षा के बारे में भी देखी जाती रही है पर आज अधिकांशतः परिवारों में स्थितियाँ बदल गई हैं । बहुत से गरीब परिवार भी शिक्षा का महत्व समझने लगे हैं और वे बेटियों को भी पढ़ाना आवश्यक समझने लगे हैं । शिक्षा का ही परिणाम है कि आज महिलायें हर क्षेत्र में सफलता की सीढियाँ चढ़ती जा रही हैं । लेकिन इन सभी फलताओं के बावजूद जो सबसे दुःखद पहलू है वह यह कि नारी के किसी भी रूप को लें, देखने में यही आता है उसके जीवन-चक्र में पारिवारिक व सामाजिक किसी भी क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं आया है जो थोड़े बहुत बदलाव अपवाद स्वरूप दिखलाई देते भी हैं वे नहीं के बराबर । एक ओर तो आधुनिक परिवार व समाज महिला से अपेक्षा रखता हैं कि वह पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चले, पर दूसरी ओर स्त्रियोचित कर्तव्यों का पालन भी उसे पूरी तरह करना ही है, उस क्षेत्र में न तो उसका कोई सहभागी बनता है न ही उसके द्वारा अनजाने में हो गई छोटी सी चूक की ही अनदेखी की जाती है । हर दुःख, कष्ट सह कर भी आज की जागरूक नारी अपने परिवार व समाज की उन्नति के लिए पुरुष की पूर्णरूपेण सहभागिनी बन चुकी है । फलस्वरूप उसके कार्यक्षेत्र व कर्तव्य क्षेत्र दोनों का ही बड़ी तीव्र गति से विस्तार हुआ है । हमें यह स्वीकार करने में रंचमात्र भी संकोच नहीं करना चाहिए कि नारी के बढ़ते हुए कार्य क्षेत्र व दायित्वों की तुलना में परिवारों व समाज का दृष्टिकोण आज भी उदार नहीं बन पाया है । यही कारण है कि उसके भीतर का हुनर, उसकी प्रकृति-प्रदत्त योग्यतायें पूरी तरह प्रस्फुटित नहीं हो पाती हैं । नारी अपनी जिन शक्तियों, योग्यताओं और भावनाओं से समाज को लाभान्वित कर सकने में सक्षम हो सकती है वह सब व्यर्थ चला जाता है । परिवार और समाज उस हर लाभ से वंचित रह जाता है जो एक नारी दे सकती है । दूसरी ओर प्रस्फुटन के आभाव में नारी के भीतर की वह ऊर्जा, वह योग्यता ठीक उसी प्रकार कुंठित हो जाती है जैसे बिना उपयोग किए, पड़े हुए औजार अथवा प्रयोग न किये जाने पर भी नष्ट हो जाने वाली उत्पादित बिजली ।
परिवार समाज का ही अंग होते हैं सुबह से शाम तक विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं के प्रति लोगों के संकुचित रवैये की कुछ झलकियाँ दिखाना मैं आवश्यक समझती हूँ ---एक पढ़ी-लिखी, नौकरी करती महिला से, हर काम सूझ-बूझ व ठीक ढंग से करते हुए कहीं किसी काम में तनिक सी भी चूक हो गई या ख़ामी रह गई तो उसे सह्रदयता से नज़रअंदाज़ करना तो दूर उल्टा किस तरह उभारते हुए उजागर किया जाता है यह मैंने देखा एक मध्यमवर्गीय परिवार में --- श्री एवं श्रीमती " क " एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते थे । श्रीमती " क " स्टेनो थीं, आफिस की ड्युटी के बाद भी बहुत सारा काम घर पर ला कर करना पड़ता था उन्हें । घर गृहस्ती के सभी काम तो उन्हें स्वयं करने ही थे । नौकर का खर्च वहन कर पाने की उनकी सामर्थ्य थी नहीं । श्रीमती " क " देर-सबेर सभी काम निपटा ही लेतीं थी । सभी कामों के साथ ही श्री " क " की एक विशेष आदत को बर्दाश्त करना भी श्रीमती " क " की दिनचर्या में शामिल था, वह यह कि जब उनके घर कोई मेहमान बैठा हुआ होता, उस समय उन्हें घर के रख-रखाव में, व्यवस्था में या साफ़-सफाई में मौजूद कमियों का कुछ ज्यादा ही ध्यान आ जाता था; जैसे आलमारी पर जमी हुई गर्द की हल्की सी पर्त पर उंगली का निशान बनाते और पत्नी को सुनाते हुए मेहमान से कहते --' देखिये भाई साहब ! झाड़-पोंछ करने से सामान घिस जाते हैं,जरा आप भी ध्यान रखियेगा और भाभी जी को भी बता जियेगा । ' फिर तुरंत ही पत्नी से बड़े प्यार भरे अंदाज़ में--- ' अरे सुनो जी ! न हो तो तुम्हीं जा कर जरा अपनी बहन जी को भी अपने कुछ गुण सिखा आओ न । '
इसी तरह अगर छोटी बच्ची के फ्रॉक का बटन टूट गया है और उसकी जगह सेफ्टी- पिन लगी है तो वे किसी त्र के सामने उस सेफ्टीपिन को दिखाते हुए बोलने में नहीं चूकते थे---' अरे वाह! मान गए भई, मान गए ! तुम भी कमाल की गृहस्थिन हो । ऎसी ही हर गृहणी हो जाए तो पैसा तो अपने आप ही बच जाएगा । ' फिर मित्र से -- ' देखिये साहब, एक दर्ज़न बटन की जगह हर फ्रॉक में एक ही सेफ्टीपिन से काम चला लेती हैं हमारी मैडम । देखी है कहीं इतनी किफायतशार औरत
? भई वाह खूब रही । '
अब आप ही सोचिये बेचारगी के कगार पर खड़ी उस महिला की स्थिति । इन प्यारी व मीठी चुभोक्तियों पर क्या वह नाराज़ हो कर झगड़ा करेगी ! अरे, उतना भी तो वक़्त उसके पास नहीं है । अगर वक़्त ही होता तो यह सब छोटे-मोटे काम भला उपेक्षित ही क्यों रह जाते ।
प्रगतिशीलता व सशक्तिकरण के नाम पर महिलायें जिम्मेदारियों से तो बुरी तरह लद गई हैं पर क्या उनके प्रति सहयोग व सह्रदयता की भावना में भी कहीं कोई बदलाव आया है ? जो कुछ थोड़ा बहुत बदलाव कहीं दिखलायी पड़ता भी है वह कितने प्रतिशत ! क्षेत्र कोई भी, कैसा भी हो महिलायें जब घर से बाहर निकलती हैं तो उन पर अतिरिक्त भार तो पड़ता ही है साथ-ही-साथ कार्य स्थल पर भी विभिन्न प्रकार की समस्याओं से भी उन्हें जूझना पड़ता है, परिणाम स्वरूप आफिस की ड्यूटी के बाद एक मानसिक तनाव ले कर वे घर वापस लौटती हैं । ऐसे में अगर परिवार से सहयोग न मिले तो कितनी ही सशक्त महिला हो एक समय ऐसा आता है कि वह भीतर-बाहर हर तरफ से पूरी तरह टूट सी जाती है । उसे जीवन भार सरीखा लगने लगता है । सारा वातावरण,घर का हो या समाज का उसके लिए नीरस और अर्थहीन हो उठता है । यही नीरसता और टूटन आगे चल कर विरक्ति व खीझ का रूप ले लेती है जो कि फिर उसकी हर गतिविधि में झलकने लगती है।
लड़की, युवती, महिला, नारी के किसी भी रूप को लें और विकसित समाज में उसके योगदानों को देखें तो हम देखेंगे कि समस्याएँ तो हर महिला के लिए पैदा होती हैं अगर वह् भीतर-बाहर दोनों क्षेत्रों को संभालती है बस अंतर थोड़ा सा होता है विवाहित और अविवाहित में । एक अविवाहित युवती की समस्यायें विवाहिता की तुलना में कुछ कम हो जाती हैं क्योंकि उसके पास प्रायः परिवार का कोई-न-कोई सदस्य सहायक के रूप में मिल ही जाता है या फिर एकदम अकेली हुई तो उस पर सिर्फ अपनी ही ज़िम्मेदारी होती है । किसी अन्य के लिए कुछ करने की चिंता नहीं होती । ऐसे में अपने निजी जीवन के रोजमर्रा के कार्यों के अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण होता है वह है अपनी सुरक्षा जिसके लिए सबसे बड़ी चीज़ है नारी की अपनी दृढ़ता । किन्तु ठीक इसके विपरीत जब कोई युवती ससुराल में कदम रखती है तो समस्याओं का स्वरूप कुछ अलग सा ही हो जाता है । उस पर भी जब उसे घर और बाहर दोनों क्षेत्रों का दायित्व उठाना पड़े तब तो स्थिति बद-से-बदतर होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है । सर्वप्रथम तो नव-विवाहिता को "गृहलक्ष्मी" , "घर की मालकिन" ," तेरा ही घर है " या फिर " ये सब कुछ तेरा ही तो है "आदि मीठे-मीठे विशेषणों के आभूषणों से लाद दिया जाता है । आगे चल कर यदि महिला भी हर पहलू को समझदारी से अनुभव करने वाली हुई और घर को सुचारू रूप से चलाने के लिए अर्थोपार्जन हेतु घर से क़दम निकाल लेती है तो धनार्जन तो अवश्य होने लगता है पर उसके अपने सुख चैन का विसर्जन किसी-न-किसी रूप में प्रारम्भ हो जाता है । उस गृहलक्ष्मी की दशा दिन-ब-दिन शोचनीय होती चली जाती है । संयुक्त परिवारों में यों ऊपरी दृष्टि से देखने पर तो कुछ सहयोग अवश्य मिल जाता है पर उस मिले हुए सहयोग के बदले जो कीमत चुकानी पड़ती है उसे स्वयं वह महिला ही समझ सकती है । यदि पति-पत्नी का अपना ही एकल परिवार है और दोनों की आमदनी भी इतनी नहीं है कि नौकर रखा जा सके तो पति से बढ़ कर सहायक भला कौन हो सकता है । पति सहयोग देता है तो सहयोग भले ही छोटा हो पर उसके पीछे छिपी एक मधुर, सुखद भावना बहुत बड़ा संबल होती है; एक ऐसा संबल जो अपने पीछे "किसी के होने" का अहसास दिलाता हुआ उस महिला में दुगनी शक्ति भर देता है, जैसे कि यदि नल किचेन से दूर है और आवश्यकता का अनुभव करके एक बाल्टी पानी पति महोदय
किचेन में ला कर रख देते हैं तो पत्नी को एक सुविधा मिल जाती है या फिर पत्नी ने बर्तन मांज कर रखे हैं और दुसरे कामों में फंसी हुई उठा नहीं पाई है तो उन्हें उठा कर सही जगह पर रख देने से पत्नी का एक काम कम हो जायेगा । काम कोई भी बड़ा नहीं होता पर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई छोटी-मोटी समस्यायें और बहुत से मामूली दिखने वाले काम होते हैं जो यों तो लगता है कुछ भी नहीं हैं पर यदि वे सभी इकठ्ठा हो जायें और एक ही व्यक्ति (चाहे महिला हो या पुरुष ) के ऊपर उनका दायित्व लद जाये तो वे अवश्य एक समस्या बन जाते हैं ।
श्रीमती " ख " से मुलाकात की तो पता चला कि वे दोनों पति-पत्नी भी नौकरी करते हैं । पहले श्रीमती " ख " घर से निकलती हैं बाद में श्री " ख " । सुबह से घर के सारे काम निपटाते-निपटाते अपनी तैयारी के लिए भी श्रीमती " ख " को वक़्त नहीं मिल पाता था । किसी तरह मांग में सिन्दूर डाला, जो सामने मिला पहना, नाश्ता तो कभी नसीब हो ही नहीं सकता था । बस, किसी तरह ऑफिस पहुँचने की जल्दी रहती थी । ऑफिस में भी काम इतना कि सिर उठाने तक का होश नहीं। किसी तरह लंच का समय हो गया, दूसरों के टिफिन खुलते देखे तो जा कर याद आया कि ' अरे ! आज टिफिन तो रखा ही नहीं । ' चा --' चलो चाय ही मंगा लूं ' और पैसों के लिए पर्स खोला तो टिफिन बॉक्स पर्स में रखा हुआ था । श्रीमती " ख " के ही शब्दों में --- श्री " ख " के सहयोग पर गर्व हुए बिना न रहा । "
सच है ! अक्षरशः सच है कि ये नितांत छोटे-छोटे सहयोग नारी के जीवन में कठिन-से- कठिन रास्तों पर भी बड़े ही सशक्त संबल साबित होते हैं, बशर्ते कि पति अपने अहम् के खोल से बाहर आयें, पत्नी को एक मित्र, एक सहयोगी समझें । स्वयं सहयोग दें व उससे दस गुना पायें । नारी का ह्रदय तो इतना विशाल, सहनशील एवं समझौतावादी होता है कि यदि वह अपने साथ दस प्रतिशत के सहयोग का भी अहसास करती है तो उसे अपने पीछे ' किसी के होने ' का अहसास सौ
प्रतिशत का होता है जो कि शरीर से कहीं अधिक उसके मन को शक्ति देता है ।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगी कि आदि काल से ही नारी ने हमारे समाज को जितना दिया है उसकी तुलना में समाज का नजरिया नारी के प्रति आज भी उतना विस्तृत नहीं हो पाया है, जितनी आवश्यकता है । आज भी बाहरी समाज में
उठने-बैठने वाली या नौकरी-पेशा महिलाओं को समाज का एक विशेष वर्ग हेय दृष्टि से देखता है,उस पर तरह-तरह के आरोप- प्रत्यारोप लगाने से भी लोग चूकते नहीं हैं । भले ही आज की नारी पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सशक्त,आत्मनिष्ठ व
स्वावलंबी हो गई है तथापि उसके भीतर ह्रदय की गहराइयों में कहीं-न-कहीं वही कोमलता, विशालता, सहन- शीलता और सहिष्णुता का स्त्रोत आज भी विद्यमान है । तभी तो कवियों और धर्माचार्यों ने नारी की उपमा धरती से दी है जिसके कारण नारी को माँ, बहन,पत्नी आदि के विभिन्न उतरदायित्वों को निभाने की शक्ति मिलती है । बस, आवश्यकता है घरेलू और सामाजिक सुरक्षा एवं सहयोग की ।

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