Saturday, November 25, 2017
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drunk

हाल ही में एक पंचायत ने शराबी पति द्वारा शराब के नशे में बीवी को दिये गये तलाक को जायज ठहराया है। इस फैसले को लेकर यह कहा जाने लगा कि जब शराब हराम है तो शराब के नशे में बीवी को दिये गये तलाक को हराम माना जाए। यहां पर फैसला एक है और नजरिया दो है। अब जरूरत इस बात की आन पड़ी है कि शराब के नशे में शौहर द्वारा दिया गया तलाक को माना जाए या न माना जाए। वैसे तो यह मामला धर्म विशेष से जुड़ा है। लेहाजा इस मुद्दे पर एक सकारात्मक बहस कर लेने में कोर्इ बुरार्इ भी नहीं है। परन्तु कौन सा फैसला महिलाओं के अधिकारों के हनन के साथ-साथ व्यवहारिक तौर पर मानवता विरोधी हो सकता है। इस पर एक बार चर्चा कर लेना चाहिए। सबसे पहले जहन में सवाल यह पैदा है कि महिलाओं के हितों और अधिकारों की रक्षा और भलार्इ के लिए इस तलाक को तलाक मान लेने में है। या ऐसे तलाक का विरोध करने या फिर तलाक न मानकर उस शौहर को दोबारा मौका देने में है ताकि ऐसे पुरुष अपनी पत्नी को नशे की हालत में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त करने के साथ-साथ महिलाओं के स्वाभमिन को ठेस पहुंचाने का काम जारी रखें। इस पर एक राय कायम करने से पहले हमें शराब और शराबियों पर भी गौर-ओ-फिक्र कर लेना जरूरी है।
1. शराब हमेशा से मानव समाज केलिए अभशिप रही है। यही वह चीज है जो दुनिया भर में लाखों-करोड़ों लोगों के लिए परेशानी और दुश्वारियों का सबब बनी हुर्इ है। शराब पारिवारिक जीवन में कड़वाहट ही नहीं लाती बलिक रिश्तों का खून भी करती है और मामला लड़ार्इ-झगड़े तथा तलाक तक पहुंचाने की वजह भी बनती है।
2. ड. जाकिर नार्इक ने अपनी एक किताब में National crime victimization survey of bureau of justic (U.S. Dept. of Justic) की रिपोर्ट के आधार पर शराबियों के आंकड़े दर्शाते हुए बताया है कि 1996 में हर दिन लगभग 2713 की संख्या में बलात्कार की घटनाएं हुर्इ हैं। इन घटनाओं में अधिकांशत: शराब पिये हुए लोग शामिल थे।
इन सब बातों को समझने के बाद मैं नहीं समझता कि ऐसी बातों को बढ़ावा देने चाहिए जिससे समाज में खराबी पैदा हो और जनविरोधी कार्य को बढ़ावा मिले। आर्इये जाने इस तरह के तलाक के बारे में उलमा की क्या राय है। काजी-ए-शहर इलाहाबाद मुफ्ती शफीक अहमद शरीफी तथा मुफ्ती सैफुर्रहमान से जब मैंने अलग-अलग जानना चाहा तो दोनों उलमा इस मामले पर एक राय कायम करते नजर आये। दोनों उलमा ने शौहर द्वारा बीवी को शराब के नशे में दिये गये तलाक को तलाक हो जाने की बात कही है और इस बात के पीछे वजह बताते हुए कहा कि एक तो शौहर ने हराम चीज का सेवन कर गुनाह किया और उस पर भी तलाक देकर और खराब काम को अंजाम दिया। लिहाजा तलाक न मानने से शौहर द्वारा निंदनीय काम की पैरवी करना होगा। साथ ही ऐसे बुरे काम को बार-बार करने के लिए उस शौहर को बल भी मिलेगा। इसी तरह इस्लाम के जानकार रजाए मुस्तमा के प्रबंधक अब्दुल हकीम कहते हैं कि तलाक देना जायज है मगर बगैर शरअर्इ वजह के तलाक देना मना है क्योंकि तलाक अल्लाह तआला को हलाल चीजों में सबसे ज्यादा नापंसदीदा हैं। उन्होंने यह भी कहा ऐसे शौहर जो जरा-जरा सी बात पर तलाक दे देते हैं यह उनके लिए भी सबक है कि वह यह गलीज हरकत दोबारा न करें और महिलाओं के स्वाभमिन को बरकरार रखें।
मैं यहां पर अपना व्यवहारिक और व्यकितगत पक्ष रखते हुए इतना ही कहना चाहूंगा कि शराब के नशे में बीवी को शौहर द्वारा दिये गये तलाक को न मानने का मतलब यह होगा कि इसे पुरुष की एक आदत माना जायेगा और ऐसी आदत स्वीकार करने का मतलब समाज में महिलाओं के साथ अन्याय करना होगा। लेहाजा महिलाओं के स्वाभमिन की रक्षा के लिए शराब के नशे में दिये गये तलाक को तलाक मान लेने में ही भलार्इ है क्योंकि महिला होने का मतलब यह नहीं है कि आए दिन उसे शराब के नशे में यातनाएं दी जाए, जब चाहा उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाए या फिर तलाक देने की बात कहकर उसके स्वाभमिन को ठेस पहुंचाया जाए। अगर इस तरह पुरुष द्वारा दी जा रही यातना को आदत समझ महिलाएं स्वीकार करती रहेगी तो उसके अधिकारों का क्या होगा? इससे समाज में पुन: एक नर्इ बहस छिड़ जायेगी। लेहाजा मैं समझता हूं इस तरह दिये गये तलाक को यदि नहीं माना जायेगा तो समाज में बुरार्इ और महिलाओं के अधिकारों के हनन को बल मिलेगा। आए दिन महिलाएं पुरुषों की प्रताड़ना को सहने के लिए मजबूर हो जायेंगी। साथ ही समाज में शराबखोरी को बढ़ावा मिलेगा और पहली के बाद दूसरी, तीसरी... महिलाओं के साथ यह समस्या मुंह बाए खड़ी रहेगी।

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