Friday, November 24, 2017
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womens power

देश हो या विदेश आज भारतीय लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। परंतु भारत के ही कुछ हिस्सों में कन्या भ्रूण हत्या नियमित रूप से हो रहा है। आनर किलिंग के नाम पर लड़कियों की जान ली जाती है,कुछ मामलों में लड़कों की भी बलि चढ़ जाती है। बेटे की चाह में बेटियों को कुर्बान किया जाता है। संपूर्ण भारत में महिलाओं से संबंधित अपराध दिनो दिन बढ़ते जा रहे हैं। इन सब परिसिथतियों से जूझते हुए आज की लड़कियां पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। कुछ क्षेत्रो मे तो पुरूषों से भी आगे निकल गई हैं।

 

अब हम मुददे की बात करते हैं अर्थात स्त्री शिक्षा की। वेद पुराण के जमाने में उच्च शिक्षित महिलाओं का जिक्र मिलता है। उन पर किसी तरह की पाबंदी नहीं थी ,पुरूषों के साथ समारोहों में वे भाग लेती थीं,विवाह भी उनकी सहमति से ही तय किया जाता था। उस जमाने में महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाता था। उन्हे शिक्षा का अधिकार भी प्राप्त था।

परवर्ती काल में भी शिक्षित महिलाओं का जिक्र मिलता है। बीतते समय के साथ हमारे पुरूष प्रधान समाज में बचपन से ही लड़कियों को दबाया जाने लगा और स्त्री शिक्षा पर रोक लगा दी गई। उनके मन में यह बात घर कर गई कि शिक्षा लड़कों के लिए है।स्त्री शिक्षा से संबंधित कई तरह के कुसंस्कार समाज में फैल गये थे।

जैसे शिक्षा प्राप्त करने से लड़कियां जल्दी विधवा हो जाती हैं,स्त्री शिक्षा से केवल परिवार ही नहीं समाज से भी भगवान रूठ जाते हैं, बाढ एवं सूखा जैसी प्राकृतिक विपदाएं होती हैं इत्यादि।

बि्टिश शासन के प्रारम्भ में भी यही अवस्था थी। अंग्रजों ने भारतीयों पर बहुत जुल्म ढ़ाए परंतु कुछ अंग्रेजों ने भारतीयों को अंधेरे से उजाले की ओर लाने का प्रयत्न किया जैसे -स्त्री शिक्षा का प्रसार, सती प्रथा का उन्मूलन , बाल विवाह पर रोक ,विधवा विवाह का प्रचलन इत्यादि। इसके लिए भारतीय समाज सुधारकों ने अंग्रजों की मदद से कानून बनवाया।कुछ भारतीय समाज सुधारक जिनकी भूमिका स्त्री शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण थी-माताजी महारानी तपसिवनी, राजा राम मोहन राय,दुर्गाबार्इ देशमुख,ईश्वर चन्द्र विधासागर, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले,सावित्री बाई फुले इत्यादि है।

कानून तो बन गया लेकिन आम भारतीय के मन में सदियों से बसी धारणा को बदलना इतना आसान नहीं था। इन समाज सुधारकों के अथक प्रयासों के फलस्वरूप धीरे- धीरे भारतीय समाज की बेडि़यां खुलने लगी।धीमी गति से ही सही स्त्री शिक्षा का प्रसार होने लगा।

 

1947 में स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय सरकार ने स्त्री शिक्षा पर बहुत जोर दिया ,जैसे-जैसे लोगों की मानसिकता बदली लड़कियों को शिक्षा का अधिकार मिलने लगा परंतु आजादी के बाद भी अनेक वर्षों तक लड़कों को लडकियों से अधिक शिक्षा का अवसर मिलता था पर अब ऐसा नहीं है। उदाहरण स्वरूप वह उत्तर प्रदेश जिसकी तुलना पिछड़े राज्यों और जंगल राज से की जाती है वहां के सरकारी स्कूलों में दाखिल लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है। मौजूदा सत्र में 1895458 लड़कें और 2317891 लड़कियों का दाखिला हुआ है ,यानि कि 422433 लड़कियां अधिक हैं। यह एक सुखद समाचार है। अगर एक पिछड़े राज्य में यह संभव हो सकता है तो संपूर्ण भारत में क्यों नहीं ?

हम भारतवासी भारत के सुपरपावर बनने का सपना देखते हैं परंतु शत प्रतिशत साक्षरता के बिना क्या यह संभव है?साक्षरता का अर्थ सिर्फ नाम लिखना नहीं पूर्ण रूप से साक्षर होना है। यह तभी संभव है जब लड़कों और लड़कियों को समान रूप से स्कूली शिक्षा मिले ।

उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों के आंकड़ों से अभिभावकों के बदलते रवैये का अहसास होता है। जिस दिन इसी तरह संपूर्ण भारतीय समाज स्त्री शिक्षा की उपयोगिता को पहचान जाएंगा उस दिन हमारा सुपर पावर बनने का सपना साकार हो सकता है।

 

 --जयती भटटाचार्या

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