Saturday, November 25, 2017
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jaago

नारी को सदा से शक्ति का प्रतीक माना गया है l विधाता की सृष्टि का सबसे सुन्दर उपहार कहा जाता रहा है l प्राचीन वेद-शास्त्रों में, ऋषि-मुनियों के प्रवचनों और व्याख्यानों में स्त्री की महानता की बढ़-चढ़ कर चर्चा होती आयी है l ग़लत भी नहीं है नारियों ने उन चर्चाओं की सत्यता को साबित भी किया है l  माँ दुर्गा ने अपनी शक्ति के द्वारा ही असुरों का संहार किया था और पृथ्वी-लोक को भय मुक्त करा कर जन-जन को निर्भय जीवन जीने का सुख प्रदान किया था l किन्तु अब तो यह सब हस्यास्पद सा लगने लगा है क्योंकि आज हर ओर भौतिकता और दिखावे का ही बोलबाला  है l

 यह दुःख का विषय है कि आज हमारे देश की नारी अपने वास्तविक स्वरूप और शक्ति को भूल कर ओछी मानसिकता की गिरफ्त  में फंस गई है,वह उन्मुक्तता व उपभोग को ही जीवन जीवन मान बैठी है l वह स्वछंदता की उन ऊंचाइयों को छू चुकी है जहाँ पहुँच कर नैतिक व सामाजिक मूल्यों की अर्थी उठ जाती है ; लेकिन बहुत हो चुका अब उसे जागना ही होगा, जिसके लिए उसे सबसे पहले तो अपने आप को पढ़ना होगा l  इतिहास गवाह है कि  हमारे देश की धरती पर जहाँ  रानी लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगनायें हुईं हैं वहीं देश को आज़ाद कराने के लिए प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों के साथ भी नारियों का योगदान सराहनीय रहा है l समाज-सेवा और नारी जागरण के पथ पर भी महिलायें कभी पीछे नहीं रहीं,  कस्तूरबा गांधी व मदर टेरेसा जैसी महिला शक्ति को क्या हमारा समाज और देश कभी भी भूल सकता है !  संगीत और साहित्य में भी महिलाओं ने शीर्ष स्थानों को सुशोभित करने में कोई कसर नहीं रखी,  ऍम.एस. शुभलक्ष्मी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, वाणी जैराम  जैसी सुरों की मलिकाओं और महादेवी वर्मा,सुभद्रा कुमारी चौहान,महाश्वेता देवी,शिवानी और अरुंधती रॉय  जैसी कवयित्रियों और लेखिकाओं के लेखन से हिन्दी जगत सदा ही महकता रहेगा l राजनीति के क्षेत्र मे भी महिलाओं ने अपने नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवाने में कोई कमी नहीं रखी --विजयलक्ष्मी पंडित,सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, वायलेट अल्वा, सुचेता कृपलानी, इंदिरा गांधी और आज़ादी के बाद इलाहाबाद की प्रथम महिला विधायक सुश्री कमल गोइंदी जैसे बहुत से नाम हैं जो युग-युग तक जन-मानस  के ह्रदय-पटल पर अपनी छाप बनाये  रहेंगे l                 

 

             स्त्री जाति का उपरोक्त इतिहास तो मात्र एक संक्षिप्त झांकी भर है l वर्ष २००१ को ' महिला सशक्तिकरण वर्ष ' का नाम दिया गया, महिलाएं सशक्त हुईं भी , वह सशक्तिकरण कितना, कैसा और किस दिशा में हुआ इसकी गहरायी में जा कर मैं विषयांतर करना नहीं चाहूँगी l मैं तो केवल महिलाओं से, उनके भीतर की छिपी हुई शक्ति को जाग्रत करने और पहचानने के लिए आह्वान करना चाहती हूँ l आज नारी अपने भीतर मौजूद ताकत को पहचान नहीं पा रही है या यों कहें कि उसके पास वक़्त ही नहीं है अपने आप को पहचानने का l अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान कर कुछ  गरिमामय उसूलों का निर्वाह करते हुए समाज में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाने के बजाय उसका ध्यान कुछ आसान तरीकों  को अपना कर सस्ती लोकप्रियता व भौतिक सुख-सुविधाओं को हासिल करने की ओर ही केन्द्रित हो गया है l ' कम करना ज्यादा पाना ' का सिद्धांत  आज समाज  के लोगों की पसंद बन गया है तो नारी ही भला कैसे उससे अछूती रहती ! आज महिलाओं में पहले जैसी कर्मशीलता, कर्मठता और दृढ़ता क्यों नहीं है? आज नारी अपनी शक्ति से अनजान क्यों है ? क्या उसे आज उस शक्ति  की आवश्यकता नहीं रही? माना कि हर तरह के ' नारी स्वातंत्र्य, महिला सशक्तिकरण, यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ' जैसे नारों के प्रचारों के बावजूद नारी कहीं-न-कहीं निरीह अवस्था में ही दिखलायी पड़ती है, पर यहाँ मुझे यह कहने में कतयी लज्जा या संकोच नहीं है कि अपनी उस अवस्था की बहुत हद तक वह स्वयं ही जिम्मेदार है---बड़ा पुराना और प्रचलित कथन है कि ' इंसान जितनी भी मुसीबतें झेलता है या जिन कठिनाईयों का सामना उसे जीवन में करना पड़ता है उनमें से अस्सी प्रतिशत का ज़िम्मेदार तो वह स्वयं ही होता है शेष बीस प्रतिशत बाहरी कारण होते हैं l  आज जितने भी कांड हो रहे हैं उनमें किसी भी तरह , घुमा-फिरा कर कोइ-न-कोई लड़की सामने आ खड़ी होती है l आये दिन बलात्कार की घटनायें,पति द्वारा पत्नी को मार डालना, ससुराल में बहुओं की हत्याएं, कार्य-स्थलों पर महिलाओं का यौन शोषण, यहाँ तक कि ट्रेनों में और सरे राह चलते-फिरते भी न जाने कितना कुछ अप्रिय घट जाता है l  उसके बाद तब शुरू होता है थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी, महिला आयोग, नेतागीरी और कहीं-कहीं तो गुंडागीरी  भी l न्याय का प्रतिशत फिर भी नगण्य-सा ही रहता   है l               
            समाज की ऎसी हालत देख कर मन बरबस सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ऐसा क्यों है ? एक वह भी ज़माना था कहीं जाओ, कहीं आओ, न घर में बंधन था न बाहर ख़तरा l ऐसा नहीं कि तब घर वालों की नज़रें बेटियों पर नहीं रहती थी पर तब एक ये भरोसा भी हुआ करता था कि एक घर की बेटी पूरे मोहल्ले की बेटी है l वह समय था जब लोग नैतिक मूल्यों का महत्व समझते थे, उनकी इज्ज़त करते थे, उस समय समाज के लोगों में, उनके क्रिया-कलापों में मानवता की महक आती थी l और बहन-बेटियाँ  भी भारतीयता की लाज रखते हुए, स्त्रियोचित आचरणों का पालन करते हुए सयंमित जीवन का महत्त्व समझती थीं, भले ही उसके लिए उन्हें अपनी इच्छाओं या शौकों को दबाना ही क्यों पड़े l आज जमाना बदल चुका है, नैतिक व सामाजिक मूल्य बदल चुके हैं l अपवादों को नज़रअंदाज़ कर दें तो एक घर की बेटी आज हर घर की बेटी नहीं होती है l एक लड़की मोहल्ले के हर लड़के की बहन नहीं होती है l आज जो सबसे बड़ी समस्या महिलाओं के लिए खड़ी हो गयी है वह है उनका पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होना और उसी प्रभाव ने उन्हें भारत की संस्कृति व लज्जाशीलता से दूर, बहुत दूर कर दिया है l आज की पीढ़ी निर्लज्जता, खुलेपन, देह की मांसलता का प्रदर्शन और हर प्रकार की विलासिता को आधुनिकता का नाम दे कर उसे जायज़ ठहराने में लगी हुई है l मज़े की बात तो यह कि फैशन के नाम पर अपनी उम्र को भी नज़रअंदाज़ कर डालती हैं कुछ महिलाएं l वे यह भूल जाती हैं  नारी की शोभा सर्वप्रथम परिधान से ,फिर आभूषण से और फिर भाषा तथा आचरण से मानी जाती है l लेकिन जो देखने में आ रहा है उस आधार पर परिधान के विषय में तो कहा ही क्या जाए ! अब तो कुछ विद्यालय ही लड़कियों को लड़कों के कपड़े पहनने पर विवश कर रहे हैं, आखिर क्यों ? क्या स्कूल यूनिफ़ॉर्म के लिए महिला वस्त्रों का अकाल पड़ गया है ? कभी वस्त्रों का काम होता था अंगों को ढंकना-छुपाना, वह  काम तो उनका ख़त्म ही हो गया है l अब तो जो वस्त्र शारीरिक संरचना को जितना अधिक उभार कर परोसे उतना ही अच्छा और फिट माना जाता है l दरअसल संस्कार न तो कहीं से आयात होते हैं न किसी खेत या पेड़ पर पैदा होते हैं उनका  पहला  उद्गम  तो हमारा घर ही होता  है l माना कि आधुनिक समय फैशन की दुनियाँ में जीने वालों के लिए तड़क-भड़क और दिखावे का है l  बच्चियाँ तो क्या ज्यादातर घरों की मातायें तक जमाने की हवा के संग बदल चुकी हैं l आज  किसी बड़ी बूढ़ी ने किसी लड़की की माँ को अगर टोक दिया कि ' अरे ! कैसे कपड़े पहनाती हो ' तो वह कहेगी कि ' मानती ही नहीं, कहती है यही पहनूंगी ' l हाँ, ठीक कहती है वह, उसे कहना भी चाहिये l आज तो वह इतना कहने लायक हो गई है लेकिन जिस दिन वह नासमझ थी तब आप स्वयं उसे वह सब पहनाती थीं जो आगे चलकर उसे नहीं पहनना चाहिए था ,  तो क्या  कुसूर उस बच्ची का ! जिस रंग में रंगोगे वही तो आगे चल कर सामने आएगा l इसी प्रसंग  में एक आँखों के सामने की घटना बताना चाहूंगी ---लगभग ढाई साल की एक गोरी-चिट्टी बच्ची, एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपनी माँ के साथ आयी l बच्ची थी, यों तो उसकी पोशाक  का कोई महत्त्व नहीं था, पर आगे उगने वाले वृक्ष का अंकुर तो था ही l लगभग हर महिला ने उसे पास बुलाया, प्यार किया और कहा ' ये ड्रेस इसके ऊपर कितनी सुन्दर लग रही है '  माँ भी सुन कर गर्व से फूली नहीं समा रही थी l ड्रेस थी --- एकदम काले कपड़े की, उसमें महीन-महीन चमकी लगी हुई थी, कमर से नीचे बमुश्किल एक बालिश्त, सामने बिब के आकर में कपड़े को गले से बांधा गया था, शेष बाजू और पीठ पूरे खुले हुए थे l आज तो यह तय ही है कि बच्ची ने उस ड्रेस को लेने की जिद नहीं की होगी पर कल ज़रूर करेगी l 
             इसी तरह की एक और घटना आँखों के सामने से गुजरी ---- किसी कॉन्वेंट स्कूल की छात्राएं कहीं से टूर करके वापस लौट रही थीं, पहनावा सभी कानये जमाने का अनुसरण करता हुआ भड़काऊ ही था l कम्पार्टमेंट में कुछ युवा लड़के भी सफ़र कर रहे थे l उनमें  चार-पाँच लड़के कुछ लड़कियों से खूब घुल-मिल कर वार्तालाप करने लगे l किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया, लगा सब साथ के ही हैं लेकिन कुछ ही पलों में उनमें तू-तू-मैं-मैं शुरू हो गई तब आस-पास के लोगों का ध्यान बरबस ही उधर खिंच गया और पता चला कि उन लड़कों ने किसी लड़की को बगल बैठा कर फोटो खींच ली थी और जब लड़की ने उसे फोटो मिटाने को कहा तो वे सब अश्लीलता पर भी उतारू हो गए थे l जब बात बढ़ी तो उन छात्राओं की गुरूजी (अध्यापिका) को बुलाया गया जो कि दुसरे डिब्बे  में, शायद ए.सी. में थीं l गुरू जी आयीं l उन्हें देखते ही किसी लड़के ने पहले तो एक जोरदार सीटी मारी फिर सब-के-सब मुँह दाब-दाब कर अपनी हँसी रोकने का या यों कहें कि उन्हें हूट करने का प्रयास करने लगे l दरअसल छात्राएं तो जो थीं सो थीं हीं, गुरूजी की डील-डौल और पोशाक ऎसी थी की बड़े -बड़े उनके पद के अनुरूप उन्हें उस ड्रेस में देखकर दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाएँ --- कम-से-कम एक सौ दस किलो तो उनका वज़न रहा होगा, उसपर स्किन टाईट जींस के साथ एक नन्हां-सा मात्र ज़रुरत भर का टॉप पहन रखा था गुरूजी ने l खैर, गुरूजी कुछ बोलीं, कुछ भड़कीं-बिगड़ीं, लड़के भी बोले-बके, कुछ झिक-झिक, कुछ चिक-चिक के बाद खींची गई फोटो उड़ाई गई l बात बच्चियों की थी अतः  अन्य मुसाफिरों ने भी बीच-बचाव करने में सहयोग किया l 
            ये कुछ ऐसे नमूने हैं जो मॉर्डन बनने और दुनियाँ की नज़रों में ख़ास दिखने की ललक में आज की नारी को कहीं-न-कहीं कमज़ोर बना डालते हैं l यह थोथी आधुनिकता उन्हें उनके लक्ष्य से कोसों दूर खींच ले जाती है l          
            ऐसे  ही एक जमाना था जब दुपट्टे लज्जा का एक  प्रतीक माने जाते थे l आपस में होड़ लगा करती थी कि किसका दुपट्टा कितना सुन्दर है, किसका नए स्टाइल का है, किसका मैचिंग है और किसका बेमेल और फूहड़ लग रहा है वगैरह-वगैरह l लेकिन अब या तो उनकी ज़रुरत ही नहीं रही या ज़रुरत है भी तो धूप के डर से मुँह सिर लपेटने के लिए या फिर अपनी पहचान छुपा कर टहलने के लिए l  टी.वी. भी काफी सहयोग कर रहा है इस क्षेत्र में l सीरियलों ने दर्जियों की आमदनी खूब बढ़ा दी है युवतियाँ जा कर दर्जी से कहती हैं  कि ' अमुक सीरियल में जो ब्लाउज दिखाया है वैसा ही बनाना ' उनका इशारा ऐसे नमूनों की तरफ होता है जिनमे पीठ व बाजू के लिए  कम-से-कम कपड़ा "बर्बाद" किया गया हो l  ऐसे ही बहुत से समारोहों व सार्वजानिक स्थानों पर जनता की नज़रों को बरबस अपनी ओर खींचती हुई पोशाकें कहीं-न-कहीं लड़कियों के लिए संकट का कारण बन जाती हैं l समाज के भीतर फैली बहुत सी समस्याओं के लिए आज की वैज्ञानिक प्रगति का योगदान भी कम नहीं है क्योंकि विज्ञानं की प्रगति के साथ जो लाभ मिले हैं उनके साथ-साथ चुपचाप जो हानियाँ समाज को डंस रही हैं वह कहीं अधिक प्रभावी हो गई  हैं l मोबाईल, टी.वी. व कम्पुटर से मिलने वाले लाभों से लाभान्वित होना कम, बुराइयों को ग्रहण करना ही ज्यादा बढ़ गया है l अच्छे भले घरों के बच्चे भी एस.एम.एस.और चैटिंग के चक्कर में फंस कर जाने कहाँ-से-कहाँ पहुँच जाते हैं l             
            इसी प्रकार भाषा भी प्रभावित हुई है जहाँ भारत की नारी के लिए पति परमेश्वर हुआ करता था वहीं आज पति को नाम ले कर बुलाना ही फैशन बन गया है l सिर का आँचल बुजुर्गों के सामने तो दूर की बात, मंदिरों में प्रवेश करने पर भी गायब हो गया है l इतना ही नहीं जो महिलायें ऐसा नहीं करती हैं वे उस स्मार्ट समाज में पिछड़ी हुई कही जाती हैं l आप सोच ही नहीं कह भी सकते कि ' इस सबका नारी की शक्ति या ताकत से क्या सम्बंध ? '  सम्बंध है, ----- हर तरह  के विकास, तरक्की और सशक्तिकरण के बावजूद अगर नारी आदि काल से चली आ रही अपनी म़ान-मर्यादा का स्मरण करते हुए स्त्रियोचित आचरणों और नियमों को साथ ले कर चलेगी तो उसके भीतर एक अप्रत्यक्ष  शक्ति  का संचार होगा और उससे उत्पन्न ओज तथा ऊर्जा  उसके चेहरे पर एक तेज के रूप में दिखलाई पड़ेगी जिससे टकराने की हिम्मत किसी बड़ी-से-बड़ी ताकत में भी नहीं हो सकती l    
            इतना ही नहीं आज लड़कियाँ अपने परिवार की हैसियत से ज्यादा शौक पाल लेती हैं और जब उसे पूरा नहीं कर पाती हैं तो या तो परिवार में कलह मचाती हैं या फिर कहीं-न-कहीं बाहरी प्रलोभनों के झांसे में फंस जाती हैं l भौतिकता की दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने की ख्वाहिश आज किस-किस गर्त में नारी जाति को धकेल रही है इसके प्रमाण पग-पग पर मिल रहे हैं l उसकी शक्ति,उसकी ऊर्जा  जिसका प्रयोग  किसी निर्माण के कार्य में होना चाहिए वह बर्बाद हो रही है l ऎसी हालत में एक महिला जो समाज की धुरी होती है भला समाज को क्या देगी जबकि वह स्वयं अपनी सुरक्षा के लिए  मोहताज हैं क्योंकि उसने अपने को जिस घेरे में कैद कर रखा है उससे बाहर उसे और कुछ दिखता ही नहीं है l माना कि आज महिलाएं चाँद पर जा रही हैं , मंगल पर जा रही हैं पर वे कुछ गिने-चुने नाम ही हैं जिन्होंने अपनी शक्ति को पहचाना है वर्ना ज्यादातर तो फैशन परस्ती, होटल-बाजी जिसमें तरह-तरह के डांस और शराब के दौर चलते हैं l ऐसे ही बहुत तरह के दिखावों  की ललक में फंस कर अपने असली दायित्व ही भूल बैठती हैं l वे यह भूल गयी हैं कि इस संसार में जन्म लेने के बाद उनका समाज के प्रति भी कुछ कर्तव्य बनता है l    
            अन्त में , मैं इतना ही कहना चाहूंगी कि जमाने के साथ बदलना या आधुनिकता का वरण  करना बुरा नहीं है लेकिन एक सीमा तक ही l अपने सिद्धांतों से समझौता करके, अपने स्वाभिमान को गिरवीं रख कर अगर कोई बहुत बड़ा लाभ भी हो रहा हो तो उसे ठोकर मार देने में ही गर्व महसूस करना होगा  l  किन्तु दुःखद तो यही है कि आज ऐसा नहीं हो पा रहा है आज तो  ' कुछ पाने के लिए कुछ खोने '  वाली बात पुरानी पड़ गई है अब तो ' कुछ पाने के लिए कुछ भी खोने '  का ज़माना ही दिखलाई पड़ रहा है l अभी बहुत देर नहीं हुई है, ' जब ही जागो तभी सवेरा '  बाह्य शक्तियों से टकराने के लिए नारी को अपने भीतर के तेज को बढ़ाना पड़ेगा जिसके लिए पहले अपना विश्लेषण करना आवश्यक होगा l

Comments 

 
#1 kaverii 2012-11-08 21:39
ap ka lekh mujhe achcha laga parantu ghunghat shakti deti hai yesa mera manna nahi hai .ghunghat nabhi de to bhi app shakti arjan kar sakte hai.baro ka aadar keval ghunghat se nahi hota.na hi ghunghat se koi pichri manasikta jalakti hai.
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