Friday, February 23, 2018
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lady teacher
भारतीय समाज में महिलाओं को बड़े ही सम्मान की दृषिट से देखा जाता है। भारत एवं विश्व के दूसरे देशों में भी यह धारणा प्रचलित है। प्राचीन काल में गार्गी , मैत्रेयी मध्य काल में झांसी की रानी ,तारा आधूनिक युग में इंदीरा ,अरूणधुती ,मीरा नायर जैसी अनेकों महिलाएं इस धारणा को और भी पुख्ता करती हैं।

ठीक इसके विपरीत महिलाओं का एक पक्ष यह भी है जो समाज के हर क्षेत्र में निरंतर अपेक्षित , प्रताडि़त और शोषित होती आ रही है। मैं शिक्षा जगत के ऐसे ही एक पक्ष पर प्रकाश डालना चाहती हूं।

उमड़ती जनसंख्या के कारण आज बेसरकारी विधालयों का बोल बाला है। गली ,मुहल्लों , चौराहों सभी जगह छोटे छोटे छत्रक;मशरूमद्ध जैसे स्कूल हर दूसरे दिन उगते रहते हैं। इन विधालयों में बुनियादी सुविधाएं नाम की होती हैं। सबसे बड़ी बात शिक्षिकाओं के शोषण का है।

इन विधालयों में ज्यादातर आस पास की स्नातक ,स्नातकोत्तर महिलाएं पढ़ाती हैं। कालेज की पढ़ाई खत्म कर प्रशिक्षित, अप्रशिक्षित छात्राएं शिक्षिका बनकर आती हैं। उनके लिए उपार्जन का यह एक आसान रास्ता है , पर शिक्षिका होने के नाते जिस सम्मान की वह हकदार हैं वो कहीं न कहीं खो जाती है। उन्हें अपना हक नहीं मिलता।
इन विधालयों में विधिवत वेतन नाम की कोई चीज विधमान नहीं होती। स्कूल प्रबन्धक मनमाने ढ़ंग से वेतन तय करती है। शिक्षिकाओं एवं अन्य विधालय कर्मचारियों को वेतन समय से नहीं मिलता।

विधालय का समय अगर दस से चार का है तो शिक्षिकाओं को नौ से पांच तक विधालय में उपसिथत रहने को बाध्य किया जाता है। कक्षाएं तंग और बच्चों की संख्या ज्यादा होने के कारण शिक्षिका को पढ़ाने में एवं कक्षा को संभालने में दिक्कत आती है।खेल-कूद के लिए खुला मैदान न होने के कारण खेल के पीरियड में भी शिक्षिका को बच्चों के साथ कक्षा के अंदर ही बैठना पड़ता है। इससे बच्चों को भी परेशानी होती है। इन विधालयों में शिक्षिकाओं के लिए खुला हवादार स्टाफ-रूम भी नदारद होता है। बच्चों के एक्सरसाइज बुक वगैरह रखने के लिए अलमारी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होती। एक ही अलमारी दो दो शिक्षिकाओं को दे दी जाती है जिससे उन्हें बहुत असुविधाएं झेलनी पड़ती हैं पर उन्हें एडजस्ट करना पड़ता है। कई विधालय तो ऐसे हैं जहां स्टाफ के लिए अच्छी टायलेट की व्यवस्था नहीं रहती है। अस्वास्थ्यकर परिवेष में एडजस्ट करना उनकी मजबूरी है। विधालय मान्यता प्राप्त न होने के कारण कोर्स प्रबंधक और प्रधान अध्यापिका तय करते हैं। कई बार कोर्स स्टैंडर्ड नहीं होता।इससे शिक्षिकाओं के पढ़ाने पर असर पड़ता है साथ ही बच्चों का भी नुकसान होता है।

इस लेख के पीछे मेरा मकसद यह है कि जब आप नौकरी का चुनाव करें तो इन बातों पर भी सोच विचार करें । यह तो कदापि अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि महिलाओं के लिए शिक्षिका बनना ही एकमात्र सम्मानजनक जीविका है। परंतु यह भी सच है कि विधालय प्रबंधक शिक्षिकाओं एवं छात्र छात्राओं के इन समस्याओं का ध्यान रखते हुए विधालय परिसर का चुनाव उचित जगह पर करें जहां हवादार , प्रकाशमय कक्षाएं हों , खुला मैदान , बच्चों के लिए खेल कूद का अच्छा साजो-सामान, पेय जल की सुविधा, साफ सुथरा टायलेट हो। शिक्षिकाओं का वेतन समय पर तथा विधिवत हो, बच्चों की संख्या का अनुपात कक्षा तथा शिक्षिकाओं की संख्या के अनुपात के अनुसार हो इत्यादि बातों पर ध्यान दें तो महिलाओं के लिए यह जीविका उपार्जन एक वरदान साबित होगा।

चूंकि हमारे समाज में यह धारणा सदैव से घर कर गई है कि महिलाओं के लिए शिक्षा जगत में काम करना सुरक्षित और सम्मानजनक है। इसलिए ज्यादातर महिलाओं के परिवार वाले उन्हें इस क्षेत्र में काम करने का प्रोत्साहन और इजाजत देते हैं। महिलाएं भी विकल्प जीविका के बारे में कम ध्यान देती हैं। आज के सामाजिक और आर्थिक बदलाव के परिप्रेक्ष्य में अपने सोच में भी बदलाव लाना पड़ेगा तभी यह समाज बदलेगा , महिलाएं जागिए और सोचिए अपने रूचि और योग्यता के अनुसार जीविकोपार्जन का प्रयास कीजिए।

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