Friday, November 24, 2017
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accessory designing

एक्सैसरीज के बिना किसी भी तरह के फैशन की कल्पना भी संभव नहीं है। फैशन के अलावा अन्य कई क्षेत्रों में भी एक्सैसरीज का खूब इस्तेमाल होता है। ऐसे में कलात्मक एवं रचनात्मक अभिरुचि रखने वाले युवाओं के लिए एक्सैसरी डिजाइनर के क्षेत्र में करियर बनाना एक उम्दा विकल्प साबित हो सकता है।

क्या है एक्सैसरी डिजाइनिंग?

यह फैशन इंडस्ट्री की एक सहायक शाखा है। फैशन के तहत आमतौर पर परिधान तथा इनसे संबंधित चीजें ही आती हैं परन्तु एक्सैसरीज डिजाइनिंग भी फैशन का ही एक अंग है। इसके तहत ज्यूलरी, शूज, बैग जैसी अनगिनत चीजें शामिल की जा सकती हैं। इनमें से कोई भी चीज परिधान नहीं होती लेकिन फिर भी ये फैशन के तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं। सिर से लेकर पैरों तक पहनने के लिए विभिन्न प्रकार की एक्सैसरीज बाजार में उपलब्ध हैं। आज के युवा तो एक्सैसरीज का काफी अधिक इस्तेमाल करना पसंद करते हैं जिससे एक्सैसरी डिजाइनिंग की मांग पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है। इनके अलावा अब लाइफस्टाइल एक्सैसरीज के क्षेत्र में भी काफी विकास हो रहा है। लाइफस्टाइल एक्सैसरीज के तहत सैल फोन व कार से लेकर इंटीरियर डैकोरेशन तक को शामिल किया जा सकता है।

एक्सैसरीज डिजाइनर बाजार से 4 से 6 महीने आगे चलते हैं क्योंकि नए डिजाइनों पर सोच-विचार से लेकर उन्हें वास्तविक उत्पाद का रूप देने में कितना समय लग जाता है। उदाहरण के लिए इस वक्त वे उन उत्पादों पर काम कर रहे होंगे जो साल 2014 में बाजार में उतारे जाएंगे। एक्सैसरी डिजाइनिंग के तहत प्रोडक्ट डिजाइन, फैशन डिजाइन, ज्यूलरी डिजाइन आदि उप क्षेत्र शामिल हैं जबकि कोर्पोरेट स्पेस के लिए डिजाइनिंग, किचनवेयर एवं की डिजाइनिंग भी एक्सैसरी डिजाइनिंग का ही एक हिस्सा है।

कार्यक्षेत्र

डिजाइन से संबंधित हर क्षेत्र में रचनात्मकता अहम भूमिका निभाती है। किफायती दाम, निर्माण की सम्भावनाओं पर भी गौर करना पड़ता है। यदि आपका डिजाइन अनोखा नहीं है तो आपके उत्पाद को कोई देखेगा भी नहीं। एक्सैसरी डिजाइनर को अपनी कल्पना तथा रचनात्मकता के साथ-साथ व्यावहारिकता पर भी गौर करना पड़ता है। एक्सैसरी डिजाइनर अपने काम की शुरूआत किसी भी उत्पाद के लिए डिजाइनिंग की कल्पना से करते हैं। यदि उन्हें किसी कलाई घड़ी का डिजाइन तैयार करना है तो विचार करना होगा कि इसके लिए किस तरह का सामान इस्तेमाल किया जाए तथा घड़ी को कैसा रूप देना सही रहेगा। इसके बाद दूसरा चरण प्रेरणा का आता है। सरल शब्दों में कहें तो वे अपने उत्पादों के लिए किसी भी चीज से प्रेरणा लेने की कोशिश करते हैं। इस चरण के दौरान वे अपने डिजाइन की रूप-रेखा तय करते हैं जिसके बाद वे अपने उत्पाद को पुख्ता रूप देने की ओर कदम बढ़ाते हैं।

फिर वे डिजाइन की बारीकियों पर फैसला करते हैं कि उसका आकार, फिनिश, काम करने का ढंग, पैकेजिंग आदि कैसा होगा। इसके बाद बारी आती है उत्पाद की जांच की। शुरू में एक-दो पीस तैयार करके यह देखा जाता है कि तैयार होने के बाद वास्तव में वह उत्पाद कैसा लगेगा। हो सकता है कि स्कैचिंग के दौरान वह काफी आकर्षक दिखाई देता हो परन्तु कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले यह देखना पड़ता है कि वह वास्तव में कैसा लगता है। इस चरण को सफलतापूर्वक पार कर लेने वाले डिजाइनों पर उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया लेने की कोशिश भी की जाती है कि क्या उन्हें वह उत्पाद पसंद है, वे उसे आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं तथा वे उसके लिए कितनी कीमत अदा कर सकते हैं। आमतौर पर मार्कीट रिसर्च द्वारा चल रहे रुझानों को जानने की कोशिश की जाती है ताकि रुझानों के अनुरूप उत्पादों को डिजाइन करके पेश किया जा सकता है।

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