Friday, November 24, 2017
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happy friendship day

एक आम जिंदगी को सच्चा और प्यारा दोस्त खास बना देता है। दोस्तों की खासियत ही ये होती है कि वे खामियों और खूबियों के साथ हमें स्वीकार कर लेते हैं। दोस्तों से हम हंसी-ठिठोली भी कर लेते हैं, तो कभी किसी गंभीर मुद्दे पर मशविरा भी कर लेते हैं। लेकिन क्या आज ऐसी दोस्ती है हमारे बीच...

                सपने बदलते हैं, ट्रेंड्स आते-जाते रहते हैं, लेकिन जिंदगी में दोस्तों की भूमिका, कभी नहीं बदलती। एक नहीं, कई दोस्त आते हैं हमारी जिंदगी में। बचपन से लेकर अब तक आपने कितने दोस्त बनाए होंगे। लेकिन क्या वे सब अभी भी साथ हैं! स्कूल के संगी-साथियों से तो न जाने कब का संपर्क टूट चुका होगा। फिर पढ़ाई और घर गृहस्थी। इन सबके बीच दोस्ती निभाने का वक्त ही किसके पास है! आमने-सामने की दोस्ती निभाना अब कठिन होता जा रहा है, ऐसे में दोस्तों की संख्या कम होती जाती है।

                हां, व्यस्तता के बीच सोशल साइट्स का सहारा लेकर अगर दोस्ती निभाने की कोशिश होती भी है, तो कुछ पुरानी सहेलियां मिल भी सकती हैं। पर उनसे भी रोज चैटिंग या मैसेजिंग होना संभव कहां रह जाता है!

                अगर पर्सनल नंबर ले लिया, तो कभी-कभार बातचीत हो जाती होगी। लेकिन महिलाओं के जीवन की व्यस्तता उन्हें दोस्ती निभाने का यह छोटा मौका भी कम ही देती है। अब तो दोस्ती के रिश्ते का स्वरूप हर पल बदलता दिखता है। जगह और रुचि बदलते ही, जो दोस्ती कभी अटूट दिखती थी, वो औपचारिकता में बदल जाती है। ऐसा नहीं है कि इस बीच हम पुराने दोस्तों को भूल जाते हैं, पर हां समय के साथ समान रुचि वाले लोगों से ही हमारी बातचीत हो पाती है। आमतौर पर तो कॉलेज और कार्यस्‍थल के दोस्त ही आसपास होते हैं, जिनसे चलते-चलते बातचीत हो पाती है। पर उसे दोस्ती कहेंगे क्या? क्योंकि उनके साथ तो मन में कहीं न कहीं स्पर्धा की भावना भी होती ही है। जो लोग इंटरनेट सेवी है, उनका प्रोफाइल ऑर्कुट, फेसबुक जैसी सोशल साइट्स पर होगा। इसके माध्यम से दोस्त मिलते तो हैं, लेकिन बस टाइमपास के लिए। कुछ काम की बातें भी होती हैं यहां, पर जब बात सच में मदद की आती है, तो वे दोस्त मुश्किल से ही काम आते हैं। सोशल साइट्स पर दोस्तों की संख्या भले ही बड़ी होती है, पर व्यक्तिगत तौर पर ऐसी दोस्ती वक्त पड़ने पर मददगार साबित नहीं होती।

दोस्त बढ़े, भरोसा घटा

                समय के साथ्‍ दोस्ती का मतलब, दोस्तों की जरूरत और दोस्ती के पैमाने, सब बदल चुके हैं। अब इंटरनेट की दुनिया में बिना मुलाकात किए भी दोस्त बन जाते हैं। सोशल वेबसाइट्स पर दोस्त बड़ी तेजी से बनते हैं। ऐसा लगता है कि साइट पर मौजूद दोस्त बेहद मिलनसार हैं। पर वास्तव में ऐसा नहीं है। ये दोस्ती महज टाइमपास होती है और इंटरनेट की दोस्ती पर आप ज्यादा भरोसा भी नहीं कर सकतीं। इंटरनेट पर हुई दोस्ती में हमेशा डर तो लगा ही रहता है कि कोई आपकी फोटो का गलत इस्तेमाल न करे, कोई आपको बेहूदे और अश्लील मैसेज न भेजे।

वक्त नहीं दोस्ती के लिए

                आज दोस्ती की दुनिया मोबाइल फोन का रूप धर कर या तो मुठ्टी में रहती है या तकिए के नीचे। पहले लोगों के पास बातचीत के साधन बहुत कम थे। चिट्ठी या तार जैसे साधन ही थे, एक-दूसरे से कनेक्ट होने के लिए। इसके बावजूद उनकी दोस्ती चलती रहती थी। पर आज तो एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए बहुत सारे साधन हो गए हैं। ऑनलाइन माध्यम से लेकर फोन तक। आप हमेशा नहीं तो किसी मौके पर अपने दोस्तों के बारे में जान ही सकती हैं। इसके बावजूद दोस्ती लंबे समय तक नहीं चल पा रही है, क्योंकि दोस्ती के इन इंस्टैंट तरीकों में आपसी जुड़ाव की गर्माहट बेहद कम है। हम आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। लोगों में दूसरों के प्रति संवेदनशीलता कम हुई है। इसीलिए इंटरनेट और मोबाइल पर निभाई जाने वाली दोस्ती आरामतलबी की दोस्ती बन जाती है। ऐसी दोस्ती, जिसमें दोस्ती की रस्में तो अदा ही नहीं होतीं। वे रस्में जिसमें बारिश, गर्मी या जाड़े की परवाह किए बिना सहेली के घर जाया जाता है, साथ बैठकर कुछ बनाया जाता है, उसकी मम्मी की डांट उसके साथ खुद भी खानी पड़ती है और साथ-साथ शॉपिंग की जाती है, सलाहें ली जाती हैं वगैरह। आज संबंध तात्कालिक फन और फायदे वाले बनते जा रहे हैं। इससे दोस्ती भी अछूती नहीं हैं।

हर फ्रेंड जरूरी होता है

                यह सच है कि दोस्ती संसार के हर रिश्ते से अलग होती है। दोस्ती की कशिश ही है कि एक छोटा बच्चा अपनी मां का मोह छोड़कर फटाफट स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाता है। फिर बड़े होते-होते दोस्तों की हमजोली की आदत भी पड़ जाती है। उनसे अपनी सारी बातें शेयर करते हैं। वहीं बुढ़ापे में दोस्तों के बिना टाइम बिताना नामुमकिन लगने लगता है। कोई तो चाहिए जिससे अपने दिल की कह सकें। कई ऐसे लोग हैं, जो घंटों अपनी मनपसंद किताब पढ़ते या अपना कोई दूसरा मनपसंद काम करते बिता देते हैं। ऐसे लोगों के लिए इनका शगल ही इनका दोस्त होता है।

अब 40 साल बाद पीछे लौट जाओ

                अब आप कुछ साल पीछे लौट पर देखिए। जी हां, मैं आपकी मां की दोस्ती की बात कर रही हूं। जरा उनसे पूछिए या जानने की कोशिश कीजिए कि उनकी सहेलियां कैसी थी। तभी शायद आप जान पाएंगी कि उस दौर की जो दोस्ती होती थी, वो आज से बिल्कुल भी अलग। पारिवारिक समारोह हो या कोई और अवसर, हर मौके पर सखी सहेलियां मौजूद रहती थीं। कोई भी काम हो, हाथों-हाथ निपटा दिया जाता था। सुख-दुख में ये एक-दूसरे की मदद करने के लिए तैयार। पर आज की दोस्ती सिर्फ टाइमपास है। दो यार मिलते हैं, तो बतकही होती है। कुछ इधर-उधर की बात होती है, पर जब बात मदद करने की हो, इनमें से कुछ दोस्त ही शायद आपकी मदद करें। कारण चाहे जो भी हो, पर आज रिश्तों में आत्मीयता नहीं है। कुछ दोस्त ही ऐसे होंगे, जो आपकी मदद के लिए आगे आएं।

दोस्ती मगर संभलकर

                माना सोशल साइट्स दोस्तों की संख्या और नेटवर्किंग बढ़ाने का अच्छा जरिया हैं, पर इनके नुकसान को भी हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। हाल के सालों में सोशल साइट्स के कई नकारात्मक पहलू भी उजागर हुए हैं।

                इसकी लत में आए लोग मानसिक तौर पर बीमार हो रहे हैं। शोध बताते हैं कि इन साइट्स से जरूरत से ज्यादा चिपके रहने वाले लोगों की याददाश्त कम हो जाती है।

                यह एक मायाजाल की तरह है, जो लोगों का कीमती समय बर्बाद करता है। लोग अक्सर खुद को परफेक्ट और बेस्ट दिखाने के चक्कर में झूठी जानकारी प्रोफाइल में देते हैं।

                सोशल साइट्स पर अपलोड की गई निजी तसवीरों का दुरुपयोग भी हो जाता है, जिसे रोकना आसान नहीं होता है।

इससे कैसे बचें: स्कूल या घर में बच्चों को फेसबुक व अन्य सोशल साइट्स में अकाउंट प्रोटेक्शन की जानकारी दें। साथ ही उन्हें सोशल साइट्स पर एकाउंट बनाते समय विशेष सावधानी बरतने के टिप्स भी दें। उनको बताएं कि सोशल साइट्स पर हमेशा अपनी पूरी जानकारी न दें। अपनी पर्सनल फोटो आदि को अपलोड न करें। सोशल नेटवर्किंग के जरिए बने दोस्तों को अपने निजी जीवन की जानकारी न दें। सोशल साइट्स का प्रयोग केवल आप नए लोगों से जुड़ने या अपनी नेटवर्किंग के दायरे को बढ़ाने के लिए करें। अपनी निजी जिंदगी को दूसरों पर जाहिर न होने दें।

 

दोस्त तो चाहिए!

                बचपन की दोस्त, स्कूल - कॉलेज की दोस्त, गली-मोहल्ले की दोस्त! बरसों बाद जब वे जिंदगी के किसी मोड़ पर फिर से मिलते हैं, तो हमारी पुरानी यादें मन को गुदगुदाने लगती हैं। याद आता है गुजरा जमाना। क्या दिन थे वे? थोड़ी मस्ती, थोड़ी शरारतें और कुछ काम की बातें, यही तो है दोस्ती। लेकिन आज दोस्ती कहां है? किसी के हाथ में फ्रेंडशिप बैंड बांध देने से मित्रता गहरी नहीं हो जाती। दोस्ती तो आपसी समझ है, जो जीवन में आगे बढ़ने के लिए आपको प्रेरित करती है। हर बात में हां में हां मिलाने वाला आपका दोस्त हो ही नहीं सकता। मां-बाप, भाई-बहन के रिश्ते बंधे होते हैं, मर्यादाओं, परंपराओं और परिस्थितियों की जंजीरों से। लेकिन जब घर से आप बाहर होते हैं, तो दोस्त ही घरवालों की जगह ले लेते हैं। यहां दोस्त ही एक-दूसरे के काम आते हैं। कुछ मामलों को छोड़ दें, तो जिंदगी में कई ऐसे हालात आते हैं, जब एक सच्चे दोस्त की जरूरत महसूस होती है, जो आपके दुख को धैर्य से सुन सके, बिना आलोचना किए आपको सांत्वना दे सके, समझा सके, बिना झिझके जरूरी सवाल उठा सके। क्या आपकी दोस्ती भी कुछ इस तरह की है! अगर हां, तो आप खुशनसीब हैं। आपको हक है दिल खोलकर अपनी दोस्ती को सेलिब्रेट करने का।

साभार: अमर उजाला

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