Friday, November 24, 2017
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इंटरनेट खोज भारत में जहां तेजी से ऑनलाइन विज्ञापनों को बढ़ावा दे रही है, वहीं सर्च तकनीक हर दिन के साथ कुछ नया जोड़कर लोगों को इंटरनेट का एकदम गुलाम बना दे रही है। यह कितना सही है या कितना गलत, इसका फैसला वक्त को करना है पर फिलहाल इंटरनेट भारतीय मध्यवर्ग की रीढ़ बन चुका है। लोग खरीददारी, बैंक और यात्रा जैसे फैसलों को लेने से पहले इंटरनेट की मदद ले रहे हैं, या यूं कहें कि भारतीय इंटरनेट प्रयोगकर्ता इंटरनेट खोज में परिपक्वता ग्रहण कर रहे हैं। इंटरनेट का इस्तेमाल कई नए तरह की संभावनाओं को जन्म दे रहा है जिससे परंपरागत उपभोक्ता और विज्ञापन दोनों के स्वरूपों में बदलाव आ रहा है।

                गूगल की खोज रिपोर्ट के अनुसार साल 2011 में जिन तीन चीजों में भारतीयों ने सबसे ज्यादा खोज रुचि दिखाई वह मनोरंजन न होकर बैंकिंग, शॉपिंग और यात्रा से संबंधित वेबसाइट्स रहीं। ये चलन बता रहा है कि किस तरह भारतीय मध्यवर्ग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इंटरनेट पर निर्भर हो रहा है। बढ़ते स्मार्ट फोन के प्रयोग ने सर्च को और ज्यादा स्थानीयकृत किया है। वास्तव में खोज ग्लोबल से लोकल हो रही है जिसका आधार भारत में तेजी से बढ़ते मोबाइल इंटरनेट प्रयोगकर्ता है। जो अपनी खोज में स्थानीय चीजों को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं। ये रुझान दर्शाते हैं कि भारत नेट युग की अगली पीढ़ी में प्रवेश करने वाला है जहां सर्च इंजन भारत की स्थानीयता को ध्यान में रखकर खोज प्रोग्राम विकसित करेंगे और गूगल ने स्पीच रेकग्नीशन टेक्नीक पर आधारित वायस सर्च की शुरुवात की है जो भारत में सर्च के पूरे परिदृश्य को बदल देगी। स्पीच रेकग्नीशन टेक्नीक लोगों को इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए किसी भाषा को जानने की अनिवार्यता खत्म कर देगी। बढ़ते स्मार्ट फोन हर हाथ में इंटरनेट पहले ही पहुंचा रहे हैं। आंकड़ों की दृष्टि में ये बातें बहुत जल्दी ही हकीकत बनने वाली हैं। वैश्विक परामर्श संस्था ‘मैकिन्सी’ का एक नया अध्ययन बताता है कि इंटरनेट साल 2015 तक भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में 100 बिलियन डॉलर का योगदान देगा, जो कि वर्ष 2011 के 30 बिलियन डॉलर के योगदान के तीन गुने से भी ज्यादा होगा। अध्ययन यह भी बताता है कि अगले तीन साल में भारत दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा इंटरनेट उपभोक्ताओं को जोड़ेगा और देश की कुल जनसंख्या का 28 प्रतिशत इंटरनेट से जुड़ा होगा जो चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा जनस्ंख्या समूह होगा। मैकिन्सी द्वारा किया गया अध्ययन बताता है कि 2015 तक भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद तिगुनी होकर 35 करोड़ से भी ज्यादा हो जाएगी। यानी अमेरिका की वर्तमान जनसंख्या से भी ज्यादा, जिसमें बड़ी भूमिका स्मार्टफोन निभाने वाले हैं।

                स्मार्टफोन वे मोबाइल फोन हैं जिन पर इंटरनेट भी चल सकता है। गूगल के एक सर्वे के मुताबिक, भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद फिलहाल अमेरिका के 24.5 करोड़ स्मार्टफोन धारकों से आधी से भी कम है।अभी सिर्फ आठ प्रतिशत भारतीय घरों में कंप्यूटर है, पर उम्मीद है कि 2015 तक मोबाइल फोन इंटरनेट तक पहुंचने का बड़ा जरिया बनेंगे और 350 करोड़ संभावित इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में से आधे से ज्यादा मोबाइल के जरिये ही इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे। मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मार्च 2014 तक ऑनलाइन विज्ञापन का बाजार 2,938 करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। इन ऑनलाइन विज्ञापनों में सर्च, डिस्प्ले, मोबाइल, सोशल मीडिया, ईमेल और वीडियो विज्ञापनों को शामिल किया गया है। साल 2012 में ऑनलाइन विज्ञापनों से कुल 1,750 करोड़ रुपए की कमाई हुई थी, पर मार्च 2013 तक इसी अवधि में 2,260 करोड़ रुपए की आमदनी हुई जो 29 प्रतिशत ज्यादा रही। इसी के साथ वेब मीडिया पर होने वाला खर्च भी धीरे धीरे बढ़ रहा है। साल 2005 में जहां इसे विज्ञापनों के कुल खर्च का एक प्रतिशत हिस्सा मिला, वहीं 2012 में यह आंकड़ा सात प्रतिशत हो गया।

                इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की दुनिया में भारत का बढ़ता वर्चस्व इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को मजबूर कर रहा है कि वे ऐसे सॉफ्टवेयर विकसित करें जिससे भारत जैसे बड़े बहुभाषाई देश के लोगों की आवश्यकताएं पूरी हो सकें और ऐसा हो भी रहा है। इसलिए इंटरनेट सिर्फ अंग्रेजी भाषा जानने वालों का माध्यम नहीं रह गया है। हिंदी को शामिल करते हुए इस समय इंटरनेट की दुनिया बंगाली, तमिल, कन्नड़, मराठी, उड़िया, गुजराती, मलयालम, पंजाबी, संस्कृत, उर्दू और तेलुगु जैसी भारतीय भाषाओं में काम करने की सुविधा देती है। आज से दस वर्ष पूर्व ऐसा सोचना भी गलत माना जा सकता था, पर इस अन्वेषण के पीछे भारतीय इंटरनेट उपभोक्ताओं के बड़े आकार का दबाव काम कर रहा था। स्पीच रीकग्नीशन तकनीक की खोज भारत के ऐसे लोगों के लिए वरदान साबित होगी जो अभी तक निरक्षर हैं। अब निरक्षरता उनके आगे बढ़ने में रोड़ा नहीं बन पाएगी और वे देश-दुनिया के बारे में जानकारी सुनकर ले और दे सकेंगे। अभी तक हमारे सारे अधिकारों का संघर्ष ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ तक ही सीमित रहा है, पर अब इसमें एक नया परिवर्तन लाया है इंटरनेट।

        संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेट सेवा से लोगों को वंचित करना और ऑनलाइन सूचनाओं के मुक्त प्रसार में बाधा पहुंचाना मानवाधिकारों के उल्लघंन की श्रेणी में माना जाएगा। मानव सभ्यता के इतिहास में इतना तेज और चमत्कारिक परिवर्तन इससे पहले और कोई चीज नहीं लाई। हम मान सकते हैं कि इंटरनेट आने वाले समय में संविधान सम्मत और मानवीय अधिकारों का एक प्रतिनिधि बन कर उभर रहा है। भारत में इस बदलाव की वाहक कामकाजी युवा पीढ़ी है, जो तकनीक पर ज्यादा निर्भर है। इसमें कोई संशय नहीं कि ये आंकड़े उम्मीद जताते हैं, पर कुछ ऐसे सवाल अब भी हैं, जिनके जवाब मिलने बाकी हैं। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, भारत की कुल ग्रामीण जनसंख्या का दो प्रतिशत ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है। यह आंकड़ा इस हिसाब से बहुत कम है, क्योंकि हमारी करीब साठ प्रतिशत आबादी अब भी गांवों में ही रहती है। इस वक्त ग्रामीण इलाकों के कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से अठारह प्रतिशत को इसके प्रयोग के लिए दस किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय करनी पड़ती है। इस दूरी को खत्म करने के लिए गंभीरता से प्रयास करने होंगे। इसमें मोबाइल फोन एक अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं।

        देश में सूचना-तकनीक का विस्तार हो रहा है, पर इसका लाभ बहुसंख्यक वर्ग तक कब पहुंचेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इंटरनेट का इस्तेमाल कौन और कैसे कर रहा है? आने वाला समय देश में सामाजिक-आर्थिक स्तर पर एक बड़े परिवर्तन का गवाह बनेगा। इंटरनेट का इस्तेमाल जहां पारदर्शिता और जवाबदेही लाएगा, वहीं लोग मुखर तरीके से अपनी बात सोशल नेटवर्किंग साइटों के माध्यम से रख पाएंगे।

साभार: रास्ट्रीय सहारा

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