Thursday, November 23, 2017
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हमारी समस्याएं इतनी ज्यादा हैं कि हम हताश हैं। इसी वजह से हम ही संकीर्णवाद और व्यक्तिवाद को प्रोत्साहित करते हैं। साथ ही, शोषण और अक्षमता का पोषण करते हैं, हममें नैतिक गुणों का अभाव है और व्यक्ति के रूप में मानवता के कल्याण में उदासीन हैं

        यदि आप स्कूल के भीतर से जीवन जीने की कला सीखकर बाहर आ रहे हैं और आने वाली पीढ़ी वहां से यह कला लेकर समाज में आती है तब मानना होगा कि शिक्षा हमें नागरिक के रूप में बेहतर इंसान बनाने में बुनियादी तौर पर सफल हो गयी है और उसका प्राथमिक लक्ष्य पूरा हो गया है। सचमुच, यह दौर विज्ञान का है और सुघड़ वैज्ञानिकों की खोज जारी रहनी चाहिए, यही लोग राष्ट्र की सुरक्षा और जन कल्याण की अहम कुंजी हैं लेकिन विज्ञान की प्रगति पर समूचे रूप से निर्भर नहीं रहना चाहिए। हमारे समाज में लोग सशंकित और निराशाजनक भाव से सोचने लगते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति हो जाने से अनिवार्य रूप से नैतिक उत्थान नहीं हो जाता। हमारे दिमाग के प्रगति कर जाने से समान रूप से दिल और इच्छाएं विकास नहीं करतीं। अब तक प्रकृति पर हमारा दबदबा बस थोड़ा ही हो पाया है। प्रकृति की शक्तियों में गतिशीलता और त्वरणशीलता कई गुना ज्यादा होती है, इस रहस्य को विज्ञान ने ही हमें समझाया है। मानवता को थोड़ा ज्यादा खुशहाली उपलब्ध कराने के लिए विज्ञान से जुड़ी प्रगति भी एक है। लेकिन इस क्षेत्र में हुई प्रगति ही सबकुछ नहीं है।

        समाज की एक इकाई और निजी तौर पर व्यक्ति की बुनियादी समस्याएं सोशल इंजीनियरिंग के प्रभाव में बढ़ती जा रही हैं। हम जिस दुनिया में रहते हैं वह बीमार है। हमारी समस्याएं इतनी ज्यादा हैं कि हम हताश हैं। साथ ही, शोषण और अक्षमता का पोषण करते हैं, हममें नैतिक गुणों का अभाव है और व्यक्ति के रूप में मानवता के कल्याण में उदासीन हैं। विश्व स्तर पर भी कुछ अच्छा नहीं हो रहा है, कई जगहों पर तनाव की चादर फैली चुकी है, परमाणु ऊर्जा के नाम पर रह-रहकर विनाश को न्यौता देने वाली धमकियां मिल रही हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यावहारिकता का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन बहुत सामान्य बात हो गयी है। यह पर्याप्त रूप से तथ्यपूर्ण है कि आज की शिक्षा में कुछ न कुछ ‘गायब’ भी है जिसके चलते दुनिया बीमार है। अगर हम अच्छे नागरिक बन सके तो बीमार होने से भी बचे रहेंगे।

        सामान्य रूप से आज पूछेंगे कि ‘अच्छा नागरिक’ कहते किसे हैं? प्राचीन यूनान या पुरातन एथेंसवासी इस प्रश्न का उत्तर देने से सकारात्मक और दृढ़वान थे। यूनान के दर्शन में अच्छे नागरिक होने की शर्तें शपथ के रूप में होती थीं। वे प्रौढ़ हो जाने के बाद नागरिकता हासिल करती थीं, इस मौके पर औपचारिक समारोह होते थे और वे वहीं शपथ ग्रहण करते थे। वे शपथ समारोह में ऊंची आवाज में कहते थे- ‘हम ऐसा कोई कृत्य, चाहे वह बेईमानी या कायरता या अपनी संगी साथियों को दुखी या उन्हें तिरस्कृत करने वाला होगा, नहीं करेंगे और अपने शहर को स्वच्छ रखने के उपायों का पालन करेंगे, यह काम चाहे अकेले करना पड़े या समूह के रूप में। शहर के नियमों का सम्मानपूर्वक पालन करेंगे और हमारे बीच जो भी लोग नियमों का उल्लंघन करेंगे, उन्हें पालन करने के तरीके सलीके से सिखाएंगे। तभी भी नहीं सुधरते, तो उन्हें सजा दिलाने की पहल करेंगे।‘ बताने का भाव यह है कि सकारात्मक, दृढ़वान और सच्चे अर्थो में प्रौढ़ नागरिक ही अपनी और समाज, दोनों की सेवा करते हैं। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें स्थायित्व की जगह बदलाव आ सके।

(उपयरुक्त विचार शिक्षाविद् प्रो. वी आर तनेजा की पुस्तक ‘एजुकेशनल थॉट एंड प्रैक्टिस’ से लिये गये हैं।

प्रो. तनेजा पंजाव यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के शिक्षा विभाग के अध्यक्ष और डीन रहे हैं)

साभार: राष्ट्रीय सहारा

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