Friday, November 24, 2017
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जब हिन्दी की अन्य अनुशासनों से तुलना की जाती है तो पठन-पाठन से जुड़ी उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए जो हिन्दी और अन्य अनुशासनों की अकादमिक दुनिया में एक जैसी नहीं हैं। हिन्दी के विपरीत अन्य अनुशासनों में शोध को प्रोत्साहन देने के लिए अलग से संस्थान बने हैं

        हिन्दी के अकादमिक जगत में पुरस्कारों की घोषणा होते ही प्राय: विवाद शुरू हो जाता है कि संबधित कृति या व्यक्ति उस पुरस्कार के लायक है या नहीं। दूसरी ओर हिन्दी के बुद्धिजीवी, जिनमें इन विवादों के भागीदार भी शामिल हैं, अक्सर हिन्दी में हो रहे पठन-पाठन और शोधकार्यों से नाखुश रहते हुए चिंता जाहिर करते हैं कि हिंदी में शोध की स्थिति अच्छी नहीं है। या तो छात्र अच्छा शोध नहीं करते हैं या अध्यापक करवाते नहीं हैं। परंपरागत विषयों में ही नवीन प्रसंग फिट हो रहे हैं।

        स्वाभाविक है कि ऐसा करते समय जब अन्य अनुशासनों (और कुछ भाषाओं) के साथ हिन्दी की तुलना की जाती है, तो ऐसा लगता है जैसे सिर्फ हिन्दी के छात्र- अध्यापक ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। हालांकि हिन्दी की अकादमिक गतिविधियों के बारे में उक्त बात कुछ हद तक सही भी है, खासकर शोध के मामलों में। जेएनयू, डीयू, हैदराबाद जैसे कुछेक विश्वविद्यालयों को छोड़ दें तो शेष जगह निराशाजनक स्थितियां हैं। हिन्दी में शोध प्रविधि का पालन न किया जाना एक कारण है, साथ ही रिसर्च मैन्युअल का अभाव है। कई विवि में तो आज भी पुराने फाम्रेट में ही काम करवाया जाता है। हालांकि हाल में एक सकारात्मक पहल सामने आई कि कुछ अकादमिकों ने मिलकर हिन्दी में एक समान शोध पद्धति लागू करने की कोशिशें प्रारंभ की हैं। यह निश्चित ही होना चाहिए। शोध पद्धति के साथ-साथ शोध की प्रवृत्तियों को देखें तो उनमें भी आजकल पुरालेखिक स्रेतों पर बहुत कम काम हो रहा है। बावजूद इसके गौरतलब है कि वक्त के साथ हिन्दी के शोध कार्यों में सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों का स्थान बढ़ता गया है। आज कम ही शोध होते हैं जो सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से न जुड़े हों। यानी हिन्दी में शोध को लेकर जागरूकता तो है, लेकिन वह गुणात्मक परिणाम में नहीं बदल पा रही है।

        जब हिन्दी की अन्य अनुशासनों से तुलना की जाती है तो पठन-पाठन से जुड़ी उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए जो हिन्दी और अन्य अनुशासनों की अकादमिक दुनिया में एक जैसी नहीं हैं। हिन्दी के विपरीत अन्य अनुशासनों में शोध को प्रोत्साहन देने के लिए अलग से संस्थान बने हैं। सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च अकादमिक शोध को बढ़ावा देती है। इसके अलावा सामाजिक विज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी कई संस्थान हैं। इतिहास के क्षेत्र में ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद और दर्शनशास्त्र के लिए इंडियन काउंसिल फर फिलोसोफिकल रिसर्च जैसी परिषदें हैं। इसी तरह नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर शोध को बढ़ावा देता है। ये परिषदें और संस्थाएं न केवल शोध के लिए विभिन्न शोधवृत्तियां देती हैं, बल्कि फील्ड वर्क को भी प्रोत्साहित करती है। यहीं नहीं आईसीएसएसआर सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से देश के अलग-अलग हिस्सों में शोध पद्धति की कार्यशालाएं आयोजित करता है, जिसमें युवा संकाय सदस्य और शोधार्थी भाग लेते हैं। इसी तरह वैज्ञानिक शोध के लिए भी काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एन्ड इन्ड्रस्टियल रिसर्च, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एन्ड रिसर्च (पुणो), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (बंगलुरू) इत्यादि के अलावा विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के लिये भी कई संस्थान और परिषदें हैं। उक्त सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कई गैर सरकारी संस्थाएं भी सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के क्षेत्रों में कार्यरत हैं जो शोध को बढ़ावा देती हैं।

        हिन्दी ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं के साहित्य की भी शोध के मामले में यही स्थिति है। सेन्ट्रल इंस्टीट्य़ूट ऑन क्लासिकल तमिल जैसी कुछेक संस्थाएं भाषा और साहित्य के क्षेत्र में शोध को प्रोत्साहित करती हैं। विश्वविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के बाहर भाषा और साहित्य पर शोध के लिए उल्लेखनीय सहायता कहीं से नहीं मिलती है। साहित्य के विद्यार्थियों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अलावा पोस्ट डॉक्टरल फैलोशिप के लिए कोई और स्रेत नहीं है। हालांकि आजकल अंतनरुशासनात्मक शोध की वजह से सामाजिक विज्ञान आदि के क्षेत्र में काम रही परिषदें और संस्थाएं भाषा और साहित्य के शोधकार्यों को कुछ सहायता दे देती हैं। इसलिए हिन्दी ही नहीं, भाषा और साहित्य के क्षेत्र में शोध के प्रोत्साहन के लिए जरूरी है कि सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर शोधवृत्तियां प्रारंभ की जाएं। जिस स्तर पर हिन्दी में पुरस्कार दिये जाते हैं, उसी तरह से शोधवृत्तियां स्थापित होनी चाहिए।

साभार: राष्ट्रीय सहारा

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