Thursday, November 23, 2017
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studies

‘शिक्षा समाज का प्रमुख आधार है और यह व्यापक रूप से समाज के उत्थान की बुनियाद बनती है। मैं पारंपरिक शिक्षा का आलोचक हूं और मानता हूं कि शिक्षा के जरिये, बच्चे अपने भीतर मौजूद ऊर्जा का सर्वोत्तम इस्तेमाल करने योग्य बनते हैं जो बड़े होने पर उनके शरीर, मस्तिष्क और भावनाओं को उभारने में सहायक है। मेरी वर्धा योजना इसी दिशा की ओर रेखांकित करती है। इसमें नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा सबसे पहले पायदान पर है। सात से चौदह  साल के जो भी लड़के-लड़कियां हैं, उन्हें नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने पर मेरा हमेशा से जोर रहा है। हमें प्राथमिक स्तर पर बच्चों की उनकी मातृ भाषा में ही शिक्षा प्रदान करनी चाहिए।

नि:शुल्क प्राथमिक सार्वभौमिक शिक्षा गांव के सभी बच्चों को देने की जरूरत है। इससे देश का आधार मजबूत होगा। अब व्यावसायिक शिक्षा पर बात करते हैं। बच्चों के भीतर हमें शारीरिक श्रम से प्रेम करने की भावना को उभारना होगा। हालांकि यह अनिवार्य नहीं है लेकिन शारीरिक श्रम करके बच्चे सीखने का प्रयास करेंगे।

 

        बच्चों को सिर्फ किताबी जानकारी न देकर, उनका रुझान शारीरिक श्रम की ओर भी रखने की जरूरत है। इसलिए व्यावसायिक और कार्यपरक शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए। शिक्षा में हमें ‘पढ़ने हुए शिक्षित होने’ संबंधी फार्मूला अपनाने की आवश्यकता है । इससे छात्रों में सृजनात्मक प्रवृत्ति का उभार होगा। वैसे भी गांवों को आत्मनिर्भर इकाइयों के रूप में ग्रहण करने पर जोर देने की जरूरत है। इसके लिए व्यावसायिक शिक्षा को अपनाकर छात्रों में कौशल बढ़ेगा। साथ ही, गांव आत्मनिर्भर इकाइयों के रूप में उभरेंगे।

        शिक्षा के माध्यम से हमें छात्रों में नैतिक भावना भी डालनी है। किताबी जानकारी की नहीं, बल्कि छात्रों को सत्य, अहिंसा, दानशीलता जैसी नैतिक समझ को अंगीकार करना चाहिए। ये उनके चरित्र को रौशन करते हैं। शिक्षा के जरिये चरित्र निर्माण हमारी प्राथमिक चिंता होनी चाहिए। लेकिन, साथ ही मेरी यह भी दृढ़ मान्यता है कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। अगर वे राजनीति में हिस्सा लेंगे, तो वे उन राजनेताओं के हाथों के प्यादे बन जाएंगे जो अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उनका इस्तेमाल करेंगे। इससे छात्रों का विकास रुकेगा और वे शिक्षित भी नहीं हो पाएंगे। मैं महिलाओं को शिक्षित किये जाने की वकालत करता हूं। पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता को लेकर किसी तरह का भेद नहीं होना चाहिए। पर्दा प्रथा की बात हो या विधवा हो गयी हों तो भी इस भावना से कुंठित बने रहने की कतई जरूरत नहीं है। मैं महिलाओं को सामाजिक दासता से भी मुक्त रखे जाने का प्रबल पक्षधर हूं। देश के विभिन्न शिक्षा संस्थानों में छात्राओं की संख्या बढ़ी है। इसलिए समाज में व्यापक सुधार लाना है तो महिलाओं का शिक्षित होना जरूरी है।

        सर्वागिक वैयक्तिक विकास को ही मैं सर्वोदय कहता हूं। मुझे सर्वोदय का विचार जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अनटू द लास्ट’ के अनुवाद करने के दौरान आया। पुस्तक में रस्किन ने सभी के उत्थान पर जोर दिया है। समाज इसे पूरी तरह से अंगीकार कर ले तो सर्वोदय की आशंका ही खत्म हो जाएगी। यह समाजवाद का नया चेहरा है। यह समाज में बहुसंख्यक के विकास संबंधी सिद्धांत के विरुद्ध है क्योंकि समाजवाद समाज की दशा में सुधारने का प्रयास करता है। मेरा दृष्टिकोण है कि वैयक्तिक स्तर पर सभी लोग समान हैं और समाज के हर व्यक्ति का उत्थान काफी आवश्यक है।

(राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उपयरुक्त विचार पुस्तक ‘गांधी दर्शन’ से लिये गये हैं)

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