Tuesday, November 21, 2017
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books

हिंदी प्रदेश के अच्छे कस्बों में भी एक ऐसी दुकान ढूंढ़नी मुश्किल होती है, जहां अच्छी  किताबें देखी-खरीदी जा सकें। आज हिंदी जगत की क्या स्थिति है? जो लिखता है उसके लिए छपना मुश्किल है। जो छापता है उसके लिए बेचना मुश्किल है। जो पढ़ना चाहता है, वह खरीद नहीं पाता।

शिक्षा हमारे जीवन में एक खिड़की खोलती है। इससे एक नई रोशनी हमारे अंदर आती है। हमारे अंदर संभावनाओं के बीज छुपे हैं, उनसे अंकुर फूटते हैं, वे पल्लवित हो उठते हैं। शिक्षा यहीं से शुरू होती है और आजीवन चलती है। संभावनाओं के बीज कभी खत्म नहीं होते। उन्हें जब-जब हवा-पानी मिलता है, वे पल्लवित होते रहते हैं। ये हवा-पानी कहां से मिलता है। एक अच्छा शिक्षक, एक सच्चा मित्र या जीवन का कोई सघन अनुभव उस बीज के लिए हवा-पानी का काम कर सकता है। लेकिन वह कौन मित्र है जो मेरे अंदर प्रगति को, जानने की, सीखने की हर कोशिश में हर पल मेरा साथ दे सकता है। वे किताबें हैं। किताबें सच्ची दोस्त हैं। सफदर की एक कविता याद दिलाती है कि - ‘‘किताबों में चिड़िया चहचहाती है / किताबों में खेतियां लहलहाती हैं / किताबों में कितना बड़ा संसार हैं / किताबों में ज्ञान की भरमार है / क्या तुम इस संसार में नहीं जाना चाहोगे? / किताबें कुछ कहना चाहती हैं। / तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।’’ यह कविता हमें बिछड़े हुए दोस्तों की याद दिलाती है। हम देखते हैं कि हमारे चारों ओर घर-बाजार में, स्कूल-कॉलेजों में अच्छी किताबों की मौजूदगी कितनी है। हिंदी प्रदेश के कस्बों में घूमते हुए लगता है कि हम एक मित्रहीन जीवन जी रहे हैं। हमने अपने चारों ओर एक ऐसा संसार रच डाला है जिसमें किताबों के लिए जगह और समय दोनों ही न के बराबर हैं। हम एक ऐसी पढ़ाई पढ़ रहे हैं, जिसमें किताबों का मतलब केवल स्कूली पाठ्यपुस्तकें हैं। ये पुस्तकें कुछ इस तरह से बनाई जाती हैं कि वे अक्सर अरुचि पैदा करने वाली होती हैं। जीवन में छुपी सतरंगी सच्चाई को जानने-समझने का सुख इन किताबों में कम ही होता है। ये किताबें भी थोड़ी-बहुत दोस्त हो पातीं, लेकिन स्कूली रंग-ढंग ने इन्हें पीछे कर कुंजी-गाइडों और गेस-पेपर जैसी चीजों की भीड़ लगा दी। किताबों की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा स्कूल-कॉलेज से बाहर भी होता है। पूरा हिंदी प्रदेश इस दुनिया के प्रति बेहिसाब लापरवाह है। अच्छी किताबों का लिखा जाना, छपना, छपने के बाद पाठकों तक पहुंचना सब कुछ सरकार की लापरवाही और समाज की पस्त-हिम्मती का शिकार है। अमीर खुसरो, कबीर से लेकर प्रेमचंद तक की परंपरा को जन्म देने वाला हिंदी प्रदेश आज आत्म-विस्मृति का शिकार है। हिंदी प्रदेश के अच्छे कस्बों में भी एक ऐसी दुकान ढूंढ़नी मुश्किल होती है जहां अच्छी किताबें देखी-खरीदी जा सकें। आज हिंदी जगत की क्या स्थिति है? जो अनुभवों की सघनता में जीता है उसके लिए पढ़ना-लिखना मुश्किल है। जो लिखता है उसके लिए छपना मुश्किल हो जाता है। जो छापता है उसके लिए बेचना मुश्किल है। जो पढ़ना चाहता है वह खरीद नहीं पाता। इस दुष्चक्र की हर कड़ी में बदलाव जरूरी है और यह समझना जरूरी है कि मैं इनमें से एक न एक कड़ी से जुड़ा हूं। यह यकीन जरूरी है कि एक छोटा सा बदलाव मुझे भी लाना है। पहला कदम इसी संकल्प से शुरू हो सकता है कि मुझे भी पढ़ना है, लिखना है, किताबों को खोजना और खरीदना है।

        आज का हिंदुस्तान युवा भारत है। हिंदी प्रदेश में पच्चीस करोड़ युवा हैं। वे असीम ऊर्जा से भरे हैं। हर युवा, आज जो है उससे सौ गुना अधिक कुछ हो सकता है। इस ऊर्जा का विकास और उन्मेष हो इसके लिए किताबें जरूरी दोस्त हैं। छोटी-छोटी कोशिशों से इस सुंदर संभावना को सच बनाया जा सकता है।

 

साभार: अमर उजाला

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