Tuesday, November 21, 2017
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टीम मजबूत है, तो मुश्किल से मुश्किल प्रोजेक्ट भी चुटकियों में और परफेक्शन के साथ पूरा हो जाता है, लेकिन ऐसी टीम कैसे बन सकती है, बता रहे हैं

  • मजबूत टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो ईगो को खुद से दूर ही रखें।
  • अपने टीम लीडर और टीम मेंबर्स से बिना किसी कॉम्प्लेक्स के हर बात शेयर करें। इससे आपके काम में पारदर्शिता बनी रहेगी।
  • अपने भीतर छिपी प्रतिभा को समङों और उसे लगातार निखारें।
  • मेहनत से बचने या किसी लालच में आकर अपनी काबिलियत से कतई समझौता न करें। इससे काम की गुणवत्ता प्रभावित होगी।

                महेंद्र बड़े से बड़े प्रोजेक्ट को लेकर रिलैक्स रहते हैं। ऐसा नहीं है कि उस प्रोजेक्ट को परफेक्शन के साथ समय पर पूरा करने की उन्हें चिंता नहीं होती। तमाम कर्मठ प्रोफेशनल्स की तरह उनके मन में भी अपने प्रोजेक्ट को लेकर मंथन चलता रहता है, लेकिन इसे लेकर वे अपने ऊपर टेंशन हावी नहीं होने देते। लेकिन पिछले कुछ महीनों से वे बहुत परेशान हैं। दरअसल, हाल में उन्हें एक नया और प्रेसटिजिएस प्रोजेक्ट मिला, लेकिन इसके साथ उन्हें ऐसी टीम मिली, जो पहले से उस पर कार्य कर रही थी। हालांकि पूर्व टीम को उसमें कोई उल्लेखनीय कामयाबी नहीं मिली थी, लेकिन वह इसी गुमान में थी कि उसने इतने लंबे समय तक इस प्रोजेक्ट के चलाया था। अब जब वह प्रोजेक्ट एक नई सोच के साथ महेंद्र को मिला, तो उनके लिए इसे सफलता से लांच करना और इसे बनाये रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। उन्होंने इसके लिए कई नायाब आइडियाज सोचे और उसके लिए प्लानिंग की। वह इस पर टीम के साथ मीटिंग में अच्छी तरह से डिस्कस भी करते। इसके बाद टीम मेंबर्स उस पर काम करते। लेकिन डेडलाइन पर पहुंचने के बाद जब महेंद्र की नजर उस पड़ती, तो वे पाते कि यह काम तो पूरी तरह से पटरी से उतरा हुआ है यानी डिअलाइंड है। उस समय वे अपने सिर के बाल नोचने लगते। पर इससे प्रोजेक्ट तो पूरा नहीं हो सकता था, जबकि समय नहीं होता था। वह अपने टीम मेंबर्स को बुलाकर जब उन्हें दिखाते-बताते कि आखिर मीटिंग में जो डिस्कशन हुआ था, क्या वह यही था, तो बदले में उन्हें यही सुनने को मिलता कि आप ठीक कर दीजिए। आपने तो जो कहा था, हमने कर दिया। आखिरकार थक-हार कर उन्हें उसी काम को नए सिरे से करना पड़ता।

                बार-बार टोकने और मोटिवेट करने के बाद टीम के कुछ मेंबर्स में तो थोड़ा सुधार आया, लेकिन कुछ बिल्कुल बदलने को तैयार नहीं थे। दरअसल, उन्हें यह गुमान था कि उन्हें तो सालों का एक्सपीरियंस है, देश के टॉप संस्थान से डिग्री ली है, हमने तो अब तक अपने हिसाब से काम किया है और उसे सराहा भी गया है, अब हमें नए सिरे से सिखाने-पढ़ाने वाले ये कौन होते हैं? इमीडिएट बॉस अगर ज्यादा ज्ञानी हैं, तो खुद सारी चीजें देख लें, हम तो ऐसे ही चलेंगे..।

एटीटय़ूड है बाधक

                यह मानी हुई बात है कि हाथ की पांचों अंगुलियां एक बराबर नहीं होतीं। इसका मतलब यह है कि हर इंसान एक जैसी सोच नहीं रख सकता और न ही एक जैसा काम कर सकता है, लेकिन जब हम एक टीम के रूम में काम करते हैं तो तमाम मतभेदों के बावजूद हमें एक-दूसरे के साथ सौहार्दपूर्ण संतुलन बनाना होता है। सौहार्द इसलिए, क्योंकि सिर्फ आदेश देने भर से अच्छा काम नहीं हो सकता। टीम लीडर द्वारा अपने साथियों को समय-समय पर मोटिवेट करने की भी जरूरत होती है। लीडर को इस बात की परख करनी होती है कि हमारी टीम का कौन सा मेंबर, किस काम को कितनी कुशलता के साथ कर सकता है। इस तरह का असेसमेंट उसे नियमित अंतराल पर करना होता है।

ईगो को कहें गो

                चाहे टीम लीडर हों या मेंबर, अगर किसी में भी रंचमात्र भी ईगो होगा, तो इससे मजबूत टीम बनने में बाधा आएगी। टीम या डिपार्टमेंट का नाम तभी होगा, जब वह चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट को भी आसानी से पूरा करके दिखा देगा। यह तभी होगा, जब हर मेंबर खुले मन और नीयत से अपनी बात एक-दूसरे से शेयर करेगा। कथित रूप से ज्यादा जानने या बड़े होने की गांठ रखकर कोई भी टीम का हिस्सा नहीं हो सकता। यह हमेशा याद रखें कि ताड़ का पेड़ बहुत ऊंचा होता है, लेकिन उससे न तो किसी को छाया मिलती है और न ही वह कोई फल देता है। इसके विपरीत एक घना और फलदार वृक्ष जितना बड़ा और फलदार होता जाता है, उतना ही झुकता जाता है, यानी बड़ा होने के बावजूद वह झुक-झुक कर अपनी छाया और फल देने के लिए सभी से आग्रह करता है। इसलिए अगर सक्सेस पानी है, तो अपने मन में छिपे ईगो को दूर भगाना होगा।

पाएं सुकून

                ईगो रख कर और एक-दूसरे से आगे निकलने या नीचा दिखाने की होड़ करने से इंसान दिन का चैन और रात की नींद खो सकता है। अगर ऑफिस में इत्मीनान चाहते हैं और रात में अच्छी नींद सोना चाहते हैं, तो आपको समस्याओं का हल निकालना होगा। अगर किसी वजह से तनाव में हैं, समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें, क्या नहीं, तो सबसे पहले ठंडे दिमाग से सोचें, अपने शुभचिंतकों से मशविरा करें, हो सके तो जिस बात से या जिस किसी की वजह से परेशानी हो रही है, उसके साथ बैठकर बात करें..। इस बात का भी ध्यान रखें कि प्रोफेशनल लाइफ में कोई किसी का दुश्मन नहीं होता। हर किसी को अपने काम से खुद को प्रूव करना होता है।

करें आत्मावलोकन

                आप काम, ऑफिस के माहौल या बॉस को लेकर परेशान हैं, नई चुनौतियों के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं, आपके भीतर हीनभावना बढ़ती जा रही है, तो यह स्थिति खतरे की घंटी है। इससे उबरने के लिए आपको आत्मावलोकन करने की जरूरत है। बैठें, सोचें और समाधान निकालने की सोचें।

साभार: दैनिक जागरण

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