Friday, November 24, 2017
User Rating: / 0
PoorBest 

success bulb

हमारा समाज और सिस्टम दोनों मिलकर एक अच्छे खासे छात्र को कालेज की जगह प्रेशर कुकर में रहने का अहसास करा देते हैं। आखिर ऐसा क्या हो जाता है कि एक प्रतिभावान छात्र अपना आपा खो बैठता है और आत्महत्या जैसा कदम उठाने से पहले एक बार भी नहीं सोचता?

 

चलो भार्इ बात करते हैं छुटकू की। छुटकू गांव से इंटरमीडिएट करने के बाद शहर के एक प्रतिष्ठित कालेज में एडमिशन लेने पहुंचा। अब छुटकू बचपन से प्रतिभा का धनी तो था ही। तो भैया हुआ यह कि लड़के को मेरिट के आधार पर एडमिशन भी मिल गया और वजीफा मिला वो अलग। धीरे-धीरे उसकी जिंदगी में बडे़ परिवर्तन आने लग गए। छोटे से गांव का छुटकू इस मोह-माया से कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गया। अपने आस-पास के मार्डन परिवेश में घुलने-मिलने के चक्कर में वह अपना मुख्य लक्ष्य पढ़ार्इ तो भूल ही गया और फिर एक दिन वही हुआ, जो हर कहानी में होता है। परीक्षा हुर्इ और छुटकू स्टैंडर्ड पर खरा नहीं उतर पाया, नतीजतन वह फेल हो गया।

          अब डिप्रेशन में पड़कर उसने नशे की लत भी लगा ली। एक दिन हास्टल में कालेज मैनेजमेंट ने छापा मारा और छुटकू को रंगे हाथ पकड़ा। जब छुटकू को अपने सिर पर कालेज से बाहर किए जाने की तलवार लटकती दिखार्इ दी तो उसने हास्टल की छत से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस तरह एक प्रतिभावान छात्र ने इस दुनिया से विदा ले ली।

          साथियों, बात यहां छुटकू की ही नहीं बल्कि रामू, पिंकी, सोनू इत्यादि उन सभी लोगों की हो रही है जो आज की स्टूडेंट लाइफ के प्रेशर को हैंडल नही कर पाते। आमिर खान की फिल्म थ्री इडियट’ में बखूबी दिखाया गया है कि कैसे हमारा समाज और सिस्टम दोनों मिलकर एक अच्छे-खासे छात्र को कालेज की जगह प्रेशर कुकर में रहने का अहसास करा देते हैं। आखिर ऐसा क्या हो जाता है कि एक प्रतिभावान छात्र अपना आपा खो बैठता है और आत्महत्या जैसा कदम उठाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा? आखिर वह कौन सा मेंटल प्रेशर है जिसकी वजह से ‘आर्इ क्विट’ वाली आवस्था आती है? वैसे अगर आरोप मढ़ने की कवायद छोड़ दें तो दोष किसी एक का नहीं है।

          ध्यान देने वाली बात यह है इन सब चीजों के पीछे बहुत से कारण जिम्मेदार हैं। अब चाहे हमारा सामाजिक दृष्टिकोण इसकी जिम्मेदारी ले या हमारे आस-पास का वो परिवेश जिसमें हम पले-बढ़े हैं। हमें सब चलता है वाला एटीट्यूड बदलने के साथ ही अपने आस-पास के माहौल को फ्रैंडली बनाना होगा। ग्रेड रैंक से थोड़ा उपर उठना पड़ेगा। फिल्म थ्री इडियट के डायलाग चाबुक की मार से तो शेर भी आग में कूदना सीख लेता है और ऐसे शेर को हम वेल ट्रेन्ड शेर कह सकते हैं, वेल एजूकेटेड नहीं में इस बात को काफी बारीकी से समझाया गया है। दरअसल, फिल्म का मूलमंत्र ही यही था कि आज के दौर में हम काबिलियत से ज्यादा कामयाबी के पीछे भागने लगे हैं।

          पहले गुरूकुल हुआ करते थे और हमारे पुराणों में गुरू को भगवान का दर्जा दिया जाता था। मुझे लगता है कि आज के युवा को दिशा देने में मार्डन जमाने के गुरू भी एक महत्वपूर्ण किरदार अदा कर सकते हैं। अगर गुरू अपने छात्रों को कामयाबी की जगह काबिलियत का पाठ पढ़ाना शुरू करेंगे तो मुझे पूरा यकीन है कि यह छात्रों का मनोबल बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाएगा। आज ऐसे गुरू की आवश्कता है जो क्लासरूम को अलजेबरा से लेकर लैन गेमिंग में काउंटर स्ट्राइक की भी टिप्स दे सके। जरूरत है इन छात्रों को मोटिवेट करने की। अब भारत एक सुपर पावर बनने की ओर अग्रसर हो रहा है और मुझे पूरा भरोसा है कि इसमें मुख्य भूमिका हमारे युवा ही निभाएंगे।

          इस लेख को लिखते-लिखते आनायास ही मुझे देश के युवा को समर्पित कुछ पंक्तियां याद आ गर्इ, जो इस प्रकार हैं -

पहरेदार हिमालय के हम झोंके हैं तूफान के,

सुनकर गरज हमारी सीने फट जाते चटटान के।

साभार: आर्इ नेक्स्ट

 

 

 

 

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

youth corner

Who's Online

We have 2736 guests online
 

Visits Counter

750775 since 1st march 2012