Friday, November 24, 2017
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ecofriendly diwali

दीवाली घर में खुशियों की सौगात लेकर आती है। इस दिन घर में पूजा होती है , घर की सजावट होती है और दीयों की रोशनी से घर के अंधकार को नष्ट करके उजाला किया जाता है।पर युवाओं की खुशी तो मुख्यत: पटाखे फोड़ने में ही है। जब घर के बड़े बुजुर्ग दीवाली पुजन , दीयों की सजावट इत्यादि में व्यस्त होते हैं तब युवा पटाखे छुड़ाने में लग जातेे हैं और बच्चे उनका अनुसरण करते हैं। 


दीवाली पर जहां दीये जलाने की परंपरा है वहीं पटाखे छोड़ने की भी। पटाखे छोड़ने में युवक युवतियां सबसे आगे होते हैं। जोश में आकर वह यह नहीं सोचते कि खुशी का इजहार करते करते अपने और दूसरों का कुछ बुरा भी कर रहे हैं।
पटाखे जलाने से सबसे बड़ा नुकसान प्रकृति का हो रहा है।पर्यावरण पहले ही बहुत प्रदूषित हो चुकी है। हर दीवाली में प्रदूषण स्तर बहुत बढ़ जाता है।इस पर रोक लगाना अति आवश्यक है जो युवा ही कर सकते हैं। यदि इस दीवाली युवा पटाखे न जलाएं तो बच्चे भी उनको देखकर ऐसा ही करेंगे।
पटाखे जलाने से मिटटी में रहने वाले कीड़े मकौड़े मर जाते हैं जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाता है। पटाखे जलाने से खतरनाक रसायन गैस के रूप में निकलते हैं जैसे पोटाशियम ,मैंग्नीस , सलफर , सोडियम , कापर , कैडमियम। प्रकृति को तो इससे नुकसान पहुंचता ही है इंसान भी नहीं बचता। सांस की तकलीफ के मरीज , छोटे छोटे बच्चों को विशेष नुकसान पहुंचता है। इनमें आपके घर के सदस्य भी हो सकते हैं।
तेज आवाज वाले पटाखों से ध्वनि प्रदूषण होता है। तेज आवाज से इंसान और जानवर दोनो को कष्ट होता है। कानों को क्षति पहुंचती है। कभी कभी स्थाई या अस्थाई रूप से श्रवण शकित नष्ट हो सकती है। आपके आस पास भी छोटे बच्चे , बुजुर्ग , बीमार व्यकित तो होंगे ही । ध्वनि प्रदूषण से न चाहते हुए भी उनके मुंह से आपके लिए बद दुआ ही निकलेगी।
रात दस बजे के बाद पटाखे न जलाने का नियम है। परंतु शायद ही कोई इसे मानता है। इसे लागू करने की जिम्मेदारी भी युवाओं की ही है लेकिन वह ऐसा तभी कर सकते हैं जब वह स्वयं इसे मानें।
यदि युवा अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहते हैं तो उन्हें कुछ कदम उठाने होंगे-
इस बार युवा घर में बिजली के झालर लगाने से इंकार करें। घर को मिटटी के दीयों से सजाएं यह ईको फ्रेंडली भी है और इससे कुम्हारों को रोजगार भी मिलेगा।घर में मिटटी का लक्ष्मी गणेश लाएं। प्लासिटक के फूलों की माला के स्थान पर घर को ताजे फूलों की माला से सजाएं। यदि आप इस तरह से दीवाली मनाते हैं तो पूरी तरह ईको फ्रेंडली दीवाली होगी।प्रकृति की मांग तो यही है परंतु एक ही बार में इतनी उम्मीद करना ज्यादती होगी।रोशनी करने वाले पटाखे जलाएं परंतु सीमित मात्रा में। तेज आवाज वाले पटाखों को नो कहें। रात दस बजे के बाद पटाखे कभी न जलाएं। जहां तक हो सके मिटटी के दीये जलाएं। बहुत मन हो तो घर के बाहर एक कोने में छोटा सा बिजली का झालर लगाएं। इस बार युवाओं को ऐसी दीवाली मनाते देखकर आने वाले सालों में आज के बच्चे पूरी तरह ईको फ्रेंडली दीवाली मनाने के लिए तैयार हो जाएंगे। ईको फ्रेंडली दीवाली से प्रदूषण नहीं फैलेगा और यही समय की मांग है। युवा सोच रहे हैं कि सारी जिम्मेदारी उनकी ही क्यों ? युवा इस देश का भविष्य हैं। देश को सही राह पर उन्हें ही आगे ले जाना है। अगर हमारे बुजुर्गों ने प्रकृति के बारे में नहीं सोचा तो क्या आज युवा भी वही गलती करेंगे।
इस लेख का मुख्य मुददा तो ईको फ्रेंडली दीवाली ही है परंतु कुछ और भी बातें हैं जिसका ध्यान रखने से आपकी दीपावली शुभ और आनंदमय होगी । इसकी जिम्मेदारी भी युवाओं को ही उठानी पड़ेगी।
घर के बच्चे जब पटाखे जलाएं , दीया जलाएं या घर के बाहर खड़े होकर दूसरे घर की दीवाली देखें तो उन्हे अकेला न छोड़ें । अगर घर के अन्य सदस्य व्यस्त हों तो युवा उनके साथ रहें एवं अपने आचरण पर अंकुश रखें। जब आग के पास हों तो पानी से भरी बाल्टी अवश्य पास में रखें। पटाखे को कभी भी हाथ में लेकर न जलाएं। पटाखों से शरीर की दूरी बनाए रखें । यदि कोई पटाखा जलने में समय ले रहा है ता उसे न छेड़े और उस पर तुरंत पानी डाल दें। पटाखे हमेशा लाइसेंस वाले दुकानों से ही लें। सूती के टाइट कपड़े खुद भी पहनें और घर के बच्चों को भी पहनाएं।
जहां तक हो सके घर के बने पकवान ही खाएं। आवश्यकता हो तो युवतियां मां के साथ हाथ बटाएं। पकवान बनाने की जानकारी न हो तो मैगजीन , पेपर , किताब ,टेलीविजन , इंटरनेट का सहारा लें। खोया ,दही , पनीर ,घी इत्यादि जाने पहचाने दुकान से लें। दीवाली में जूआ कभी न खेलें इससे लक्ष्मी कम आती हैं आप कंगाल हो जाते हैं। आशा है आप उसी दीवाली को अपनाएंगे जिससे आपकी जिंदगी और भविष्य आनंदमय हो।

 

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