Friday, November 24, 2017
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आंचलिक विज्ञान नगरी, लखनऊ जोकि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद की एक इकाई है, में दिनांक 8 जून, 2013 को सुबह 10:30 बजे ''द हिस्ट्री आफ स्पेस फोटोग्राफी नामक एक सचल प्रदर्शनी का उदघाटन प्रो0 एच0सी0वर्मा, भौतिक विज्ञान विभाग, भारतीय प्रौधोगिकी संस्थान. कानपुर एवं आंचलिक विज्ञान नगरी, लखनऊ के स्थानीय सलाहकार समिति के सदस्य द्वारा किया गया जबकि लखनऊ विश्वविधालय के भौतिक विज्ञान विभाग के डा. एम.एम. वर्मा ने उदघाटन समारोह की अध्यक्षता की।


अपने सम्बोधन में प्रो0 एच.सी. वर्मा ने बताया कि तारे हमारे जीवन के अभिन्न अंग है। उन्होंने यह बताया कि बहुत से मुहाबरे जो तारे से जुड़े होते हैं जैस- आँखों का तारा, दिन में तारे नजर आना, तारे तोड़ कर लाना, आदि। इसके साथ ही उन्होंने प्रदर्शनी से कुछ फोटोग्राफ जैसे गैलैक्सीज, सुपर नोवा आदि के विषय में व्याख्या की। उन्होंने यह भी बताया कि हमारे ब्रहमाण्ड में पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जहाँ पर जीवन है। इसलिए हम सभी को इसे बचाना ही है।

अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में डा0 एम0एम0 वर्मा ने कहा कि मनुष्य हमेशा ऊचे आकाश और तारों के विषय में जानने के लिए उत्सुक रहा है। उन्होंने कहा कि यह अच्छा प्रयास है कि ब्रहमाण्ड के विशालता के विषय में जाना और इसे विस्तार से समझा। यधपि हमारे पास बहुत से टेलिस्कोपस हैं जो हमारे ब्रहमाण्ड को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर पाते। जबकि स्पेस फोटोग्राफी हमारे ब्रहमाण्ड को और स्पष्ट रूप से देखने में मदद करती है। उन्होंने ने सभी से कहा कि इस आश्चर्यजनक ब्रहमाण्ड की प्रदर्शनी को देखें।

''द हिस्ट्री आफ स्पेस फोटोग्राफी नामक प्रदर्शनी विभिन्न असाधारण खगोलीय चित्रों का संकलन है जो 19वीं शताब्दी से आज तक लिये गये हैं। इसके अंतर्गत 19वीं, 20वी. व 21वीं शताब्दी के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खगोलीय छायाचित्र हैं जैसे अंतरिक्ष से हमारी पृथ्वी के छायाचित्र, हमारे सौरमण्डल और तारों के चित्र, हमारी आकाशगंगा एवं ब्रह्राण्ड के छायाचित्र। प्रदर्शनी में संकलित छायाचित्र इतने रूचिकर हैं जो साथ में दिये गये वैज्ञानिक जानकारियों से भरपूर विवरण को पढ़ने के लिए हमें बाध्य कर देगें। 

आरमिभत सभ्यताओं के लोगों ने खुली आँखों से रात्रि आकाश का अवलोकन किया जिससे प्राचीनतम प्राकृतिक विज्ञान अर्थात खगोलशास्त्र उत्पन्न हुआ। जैसे ही छायाचित्रण विधि का आविष्कार हुआ और प्रौधोगिकी विकसित हुई तो खगोलशास्त्री आकाशीय पिण्डों को सदृश्य प्रकाश में विस्तृत विवरण के साथ देख पाये तथा साथ ही आकाश की उन तरंगदैध्र्यों में भी देख पाये जो हमारी आँखें नहीं देख सकती। हमने भूमि आधारित खगोलीय छायाचित्रण से पृथ्वी से दूर जाकर अंतरिक्ष आधारित डिजिटल चित्रों तक प्रगति की। इससे हम भूतकाल में देख पाये तथा अपने सुन्दर छोटे नीले ग्रह को भी देख सके।

इसके परिणामस्वरूप हम सौरमण्डल तथा ब्रह्राण्ड में अपने स्थान के विषय में और अधिकाधिक सीख रहे हैं। यह प्रदर्शनी श्री जे. बेलोली, संग्रहालय अभिरक्षक कैलिफोर्नियाअंतर्राष्ट्रीय कला संस्थान के द्वारा तैयार की गई है जिसमें 59 पैनल हैं। 
उमेश कुमार, परियोजना समायोजक, आंचलिक विज्ञान नगरी ने बताया कि यह सचल प्रदर्शनी केन्द्र में दिनांक 15 जुलाई, 2013 तक प्रतिदिन सुबह 10:00 बजे से सायं 5:30 बजे तक दर्शकों हेतु खुली रहेगी।

 

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