Thursday, November 23, 2017
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  • दुनिया में आबादी का स्वरूप इस तरह बदल गया है कि भारत की बढ़ी हुई आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है। भारत की जनसंख्या में करीब पचास प्रतिशत वे लोग हैं जिनकी उम्र पच्चीस साल से कम है। दुनिया भारत को प्रतिभाओं का गढ़ मान रही है। स्थिति यह है कि दुनिया के अधिकांश विकसित देश भारतीय प्रतिभाओं के वर्चस्व से डरने लगे हैं
  • फिलहाल कुछ ही प्रतिभाएं प्रोफेशनल्स बनकर धन और यश कमाकर देश का परचम लहरा रही हैं। यदि बड़ी संख्या में प्रतिभाएं प्रोफेशनल बन जाएं तो भारत बड़ी आर्थिक शक्ति की तरह दिखाई देगा

निश्चित रूप से इस समय पेशेवर नई पीढ़ी देश की प्रमुख आर्थिक जरूरत है। देश के रोजगार क्षेत्र में प्रतिभाओं की भारी कमी से संबंधित ख्याति प्राप्त स्टाफिंग फर्म मैनपॉवर ग्रुपकी मई 2013 में जारी स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि रोजगार बाजार की नई जरूरतों के अनुरूप सुसज्जित युवाओं की देश और दुनिया में भारी मांग है। कहा गया है कि इस समय भारतीय नियोक्ता खाली पदों को भरने में टैलेंटेड प्रोफेशनल्स की कमी का सामना कर रहे हैं। वस्तुत: इन दिनों भारतीय पेशेवरों की आवश्यकता बताने वाली जो महत्वपूर्ण रिपोर्टे दुनिया और देशभर में रेखांकित हो रही हैं वे बता रही हैं कि भारत के मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, अकाउंटिंग आदि पेशेवर पढ़ाई वाले शिक्षित-प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत बढ़ती जा रही है। निसंदेह वर्ष 2013 का कैम्पस प्लेसमेंट परिदृश्य बता रहा है कि अपने उद्योग- व्यवसाय को गति देने के लिए देश-विदेश की कंपनियां भारत की एमबीए, आईटी और अन्य प्रतिभाओं को लेने के लिए आईआईएम और मैनजमेंट बी स्कूल्स की तरफ दौड़ते हुए दिखाई दे रही हैं। वैश्विक आईटी, वित्तीय सेवा और कंसल्टिंग कंपनियों के साथ तेजी से बढ़ती भारतीय कंपनियां भी नई भारतीय प्रतिभाओं को पिछले वर्ष की तुलना में अधिक संख्या में नौकरियां तथा अधिक चमकीले वेतन देते हुए दिखाई दे रही हैं। स्थिति यह भी है कि देश और दुनिया की बड़ी कंपनियों को तो ऊंचे वेतन पर अच्छे शैक्षणिक संस्थाओं के प्रोफेशनल्स प्राप्त हो रहे हैं, लेकिन अधिकांश छोटी और मध्यम कंपनियां अच्छे प्रोफेशनल्स प्राप्त करने में कठिनाई अनुभव करती हैं।

यह सर्वविदित है कि भारत जनसांख्यिकीय बढ़त हासिल करने के साथ- साथ दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी रखने वाला देश है। यह माना जा रहा है कि दुनिया में आबादी का स्वरूप इस तरह बदल गया है कि भारत की बढ़ी हुई आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है। भारत की जनसंख्या में करीब पचास प्रतिशत वे लोग हैं जिनकी उम्र पच्चीस साल से कम है। दुनिया भारत को प्रतिभाओं का गढ़ मान रही है। स्थिति यह है कि दुनिया के अधिकांश विकसित देश भारतीय प्रतिभाओं के वर्चस्व से डरने लगे हैं। पिछले दिनों 20 मई, 2013 को अमेरिका के अटलांटा शहर में एक कॉलेज के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी युवाओं को आगाह किया कि वे अध्ययनशील, परिश्रमी और प्रतिस्पर्धी बनें, अन्यथा अमेरिकी रोजगार बाजार में भारत के प्रतिभावान युवा वर्चस्व बनाते हुए दिखाई देंगे। न केवल अमेरिका में वरन पूरी दुनिया में यह कहा जा रहा है कि भारत की पेशेवर प्रतिभाएं सस्ते एवं गुणवत्तापूर्ण काम से एक ओर भारत से आउटसोर्सिग को बढ़ाकर नई कमाई का ढेर लगा सकती हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशों में जाकर विदेशी अर्थव्यवस्थाओं का सहारा बनकर डॉलर, यूरो और येन की कमाई करके देश को भेज सकती हैं। ऐसे में हमें ध्यान देना होगा कि कुछ ही प्रतिभाएं प्रोफेशनल्स बनकर धन और यश कमाकर देश का परचम लहरा रही हैं। यदि बड़ी संख्या में प्रतिभाएं प्रोफेशनल बन जाएं तो भारत बड़ी आर्थिक शक्ति की तरह दिखाई देगा।

हमें देश की नई आबादी को मानव संसाधन और पेशेवर बनाने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे। हमें इस सचाई पर भी ध्यान देना होगा कि अधिकांश युवाओं की मुट्ठियां रोजगार रहित हैं। अधिकांश युवा इसलिए पेशेवर के रूप में अपनी पहचान नहीं बना पा रहे हैं क्योंकि शिक्षा का स्तर बहुत ही खराब है। यह कटु सत्य है कि सरकार की छतरी के नीचे उद्यमपरक मानव संसाधन तैयार करने वाले गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या बहुत कम है। दुनिया के 200 प्रमुख विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है। इसके बावजूद सरकार के लिए बढ़ती हुई छात्र संख्या के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण के स्तर पर ठोस पहल संभव नहीं है। इतना ही नहीं, निजी क्षेत्र में प्रोफेशनल शिक्षा के जो गिने-चुने संस्थान हैं, वहां प्रवेश और ऊंची फीस की व्यवस्था दुष्कर कार्य है। ऐसे में पर्याप्त संख्या में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संस्थाओं की स्थापना एवं आर्थिक दृष्टि से कमजोर किंतु प्रतिभाशाली प्रतिभाओं को प्रोफेशनल बनने और अच्छा रोजगार पाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में सरकार, कॉरपोरेट सेक्टर एवं उच्च वर्ग के द्वारा देश की नई पीढ़ी को पेशेवर बनाने के समन्वित प्रयास करने होंगे। इसके साथ ही नई पीढ़ी को भी प्रोफेशनल्स बनने का संकल्प लेना होगा। कॉरपोरेट सेक्टर एवं उच्च वर्ग नई पीढ़ी को मानव संसाधन (ह्यूमन रिसोर्स) बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि विकसित देशों में भी आर्थिक विकास के साथ आर्थिक असमानता बढ़ी है। इससे गरीब छात्रों की शिक्षा मुश्किल हुई है। लेकिन अधिकांश विकसित देशों में शिक्षा संबंधी कार्य के लिए सरकार एवं कॉरपोरेट कंपनियां तेजी से आगे आ रही हैं। बिल गेट्स और वारेन बफेट तो पूरी दुनिया में शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा दान और परोपकार के लिए ख्यात हो रहे हैं। कुछ लोग तो गिविंग प्लेज अभियान का हिस्सा हैं, जिन्होंने अपनी आधी संपत्ति दान करने का वादा किया है और जिसका एक बड़ा भाग शिक्षा पर खर्च किया जाएगा। यद्यपि हमारे देश में अमीरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अमीरों के कदम परोपकार की डगर पर धीमे हैं। क्रेडिट सुइस रिसर्च इंस्टीट्यूट की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक 2012 में भारत में करोड़पतियों की संख्या 1.58 लाख है, जो अगले पांच साल में 53 फीसद बढ़ोतरी के साथ 2.42 लाख तक पहुंच सकती है। लेकिन दान और परमार्थ के लिए किए जाने वाले खर्च की प्राचीन परंपरा वाले भारत में कॉरपोरेट सेक्टर एवं अमीर वर्ग गरीब प्रतिभाशाली छात्रों की शिक्षा पर खर्च करने में काफी पीछे हैं।

दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में सरकार के द्वारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 8 से 10 फीसद हिस्सा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर खर्च हो रहा है। जबकि हमारे देश में शिक्षा पर बहुत कम खर्च हो रहा है। इतना ही नहीं, शिक्षा क्षेत्र में परोपकार पर खर्च तो सबसे कम है। हमारे देश में परोपकार में लगाई जाने वाली कुल धनराशि में से जहां सबसे अधिक कोई एक चौथाई धार्मिक कार्यों के लिए व्यय होती है, वहीं परोपकार की कुल धनराशि का कोई दसवां भाग ही शिक्षा के लिए दान में व्यय होता है। ऐसे हालात में सरकार के साथ-साथ कॉरपोरेट सेक्टर के द्वारा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए अधिक से अधिक शैक्षणिक संस्थाएं खोलने की जरूरत है। भारत का प्रत्येक अमीर परिवार एक गरीब जरूरतमंद प्रतिभाशाली विद्यार्थी को रोजगारपरक शिक्षा दिलाने का दायित्व ले तो समाज और देश की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि दिसम्बर 2012 में कंपनी बिल-2011 को लोकसभा में स्वीकृति मिलने के बाद अब पांच करोड़ से अधिक लाभ कमाने वाली किसी भी कंपनी को कॉरपोरेट सोशल रिस्पान्सेबिलिटी (सीएसआर) पर अपने लाभांश का दो प्रतिशत खर्च करना अनिवार्य हो गया है। लेकिन इस कानून की सार्थकता तब अधिक होगी, जब कंपनियां परोपकार पर खर्च करते समय शैक्षणिक परोपकार को पहली प्राथमिकता दें। निश्चित रूप से सरकार और कॉरपोरेट सेक्टर के साथ-साथ अमीरों की ओर से प्रतिभाओं को रोजगार की जरूरत के अनुरूप शिक्षित-प्रशिक्षित करने में जितना अधिक सहारा मिलेगा, उतनी ही तेजी से देश आर्थिक-सामाजिक समृद्धि की डगर पर आगे बढ़ेगा। देश की नई पीढ़ी को भी ध्यान देना होगा कि वह मानव संसाधन बनने के लिए हरसंभव प्रयास करे। निश्चित रूप से ऐसा होने पर ही पेशेवर और कुशल प्रशिक्षण से सुसज्जित भारत की नई पीढ़ी देश और दुनिया के आर्थिक विकास की सहभागी होगी।

साभार : रास्ट्रीय सहारा

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