Saturday, November 25, 2017
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selfie

जब नासमझ बच्चे की नजर खेलते खेलते किसी नई वस्तु पर पड़ती है तो वह तुरंत उस पर झपट पड़ता है। वह यह नहीं समझ पाता है कि यह नई वस्तु उसके खेलने लायक है या नहीं। इससे उसे किसी प्रकार का खतरा है या नहीं। अक्सर बच्चे को उस नई वस्तु से हानि पहुंचती है लेकिन बड़े फिर उसे संभाल लेते हैं और बच्चा भी समझ जाता है कि वह उसके खेलने लायक वस्तु नहीं है।

यह तो समझ में आता है लेकिन जब समझदार युवा नासमझ की तरह सेल्फी के खेल में रम जाते हैं और अपनी तरफ आते हुए खतरे को नंजर अंदाज करते हुए सेल्फी लेने के लिए किसी भी खतरे का सामना करने को तैयार हो जाते हैं तो बात समझ में नहीं आती। आखिर सेल्फी बड़ी या जान, अवश्य ही जान।
प्रायः सुनने में आता है कि चलती ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर सेल्फी लेने के चक्कर में नीचे गिरकर जान गंवाई, समुद्र के लहर के साथ सेल्फी खींचते समय बह गए मिला तो उसका शव, समुद्र के पानी के साथ सेल्फी खींचते समय ख्याल नहीं रहा कि पांव फिसलन भरी पत्थर पर है और पैर थोड़ा फिसला तो सीधे समुद्र में। फिर भी युवा नहीं समझ रहे हैं। युवाओं को ऐसा करते समय यह भी याद नहीं रहता कि उन्हें तैरना आता है या नहीं। झरने के साथ सेल्फी खींचते समय पानी के स्रोत के साथ बह जाना जैसी कोई न कोई घटना तो टीवी न्यूज में रोज सुनती हूं।
आज का युवा वर्ग वैसे तो बहुत समझदार है पर सेल्फी की बात पर सारी समझ पता नहीं कहां चली जाती है। यह भी नहीं सोचते कि उनके साथ कोई दुर्घटना घटने पर उनके माता पिता के दिल पर क्या बीतती है। माना कि अपनी जान पर सबका अपना अधिकार है पर युवा वर्ग को सिर्फ फन के लिए जान से खेलने से पहले यह तो सोचना चाहिए कि माता पिता ने कितने प्यार से उनकी परवरिश की, उनकी सारी ख्वाहिशें पूरी कीं,कितना पैसा उनकी खुशी को पूरा करने के लिए लुटा दिया। युवा वर्ग का कहना है कि यह तो हर मां बाप का फर्ज है पर क्या सारे फर्ज मां बाप के ही हैं ? बच्चों के साथ माता पिता की उम्मीदें जुड़ी होती हैं और कुछ नही ंतो युवा अपनी जान पर खेलकर सेल्फी लेने से पहले इतना तो सोच सकते हैं कि जिस जान से वह खेलने जा रहे हैं वह जान मां बाप ने ही दी है। उसे तो महफूज रखें।
मैं प्रायः देखती हूं मेरे घर के सामने से बीस बाईस साल के लड़के बाइक पर स्टंट करते हुए सेल्फी खींचते हैं। मैं यही सोचती हूं कि थोड़ा भी संतुलन बिगड़ा तो चलती बाइक से गिरेंगे, इसके आगे सोचने में भी डर लगता है। कुछ दिन पहले सुना था कि रेल लाईन पर जब ट्रेन आ रही थी तो ट्रेन के सामने खड़े होकर एक युवा ने सेल्फी लेने की कोशिश की। परिणाम ट्रेन उसके ऊपर से गुजर गई और सब कुछ समाप्त हो गया।बाईक पर स्टंट करते हुए सेल्फी लेना या रेल लाईन पर चलती ट्रेन के साथ सेल्फी लेने की मानसिकता से लगता कि इन बच्चों का मानसिक संतुलन थोड़ा बिगड़ गया है। ऐसे बच्चों को मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए।
इन सब मामलों में माता पिता और घर के अन्य सदस्य भी कुछ हद तक जिम्मेदार होते हैं। युवाओं को घर के माहौल से कुछ खुशी नहीं मिलती। माता पिता के पास युवा होते पुत्र या पुत्री के लिए वक्त नहीं है। ऐसे में युवा होते पुत्र या पुत्री के मन में इच्छा जागृत होती है कि वह जीवन में कुछ ऐसा करे ताकि सबका ध्यान उनकी ओर जाए। ध्यान जाता भी है लेकिन तब तक सब कुछ समाप्त हो जाता है।माता पिता को चाहिए कि बच्चे को जब मोबाईल दे ंतो उसका सही इस्तेमाल सिखाएं, बताएं कि खतरनाक स्थानों पर सेल्फी ना लें और माता पिता स्वंय भी सेल्फी सही स्थान एवं समय पर लें।

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