Saturday, November 25, 2017
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हर साल दिपावली के दो दिन बाद भैया दूज का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बहन भाई को टीका लगाते हुए उसकी लंबी उम्र और खुशहाल जिंदगी की कामना करती है। भाई बहन को उपहार में कुछ देता है। यह प्रथा बहुत पुरानी है और कोई सवाल किए बिना ही लड़कियां बचपन से इसका पालन करती हैं। परंतु अब जमाना बदल गया है और दिमाग में सवाल आता है कि लंबी आयु और खुशहाल जिंदगी केवल भाईयों को ही चाहिए। लंबी आयु और खुशहाल जिंदगी की कामना सिंर्फ बहन ही भाई के लिए करेगी, भाई बहन के लिए नहीं कर सकता। तो फिर साल में एक दिन ऐसा क्यों नहीं तय किया गया जिस दिन भाई बहन को टीका लगाए और उसकी लंबी आयु और खुशहाल जिंदगी के लिए कामना करे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है क्योंकि हमारा समाज पुरूष प्रधान है। पुरूषों द्वारा बनाए गए इस समाज में लड़कियों से सिर्फ त्याग की अपेक्षा ही की जाती है। पहले जमाने में शायद भैया दूज पर भाई भी बहन के लिए कुछ दुआ करता होगा पर अब जब तक बहन की और भाई की शादी नहीं हो जाती तब तक दोनों के रिश्ते की मधुरता बनी रहती है। जब तक लड़की को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था तब तक तो बहन की शादी के बाद भी भाई उससे अपना रिश्ता बनाए रखता था, क्योंकि उसे पता था कि बहन अब अपने घर चली गई है। भैया दूज और राखी में बहन को कुछ उपहार दे देने से और प्यार का दिखावा करने से ही बहन खुश रहेगी।
अब जमाना बदल गया है । लड़की कुंवारी हो या शादी शुदा कानून ने उसे पिता की संपत्ति में भाई के बराबर का हिस्सेदार बनाया है। सरकार ने कानून बना दिया परंतु बेटी को हिस्सा देने में भाई , पिता , मां कोई भी खुश नहीं होते। हमेशा यह कोशिश रहती है कि किस तरह बेटी को हिस्सा न देना पड़े। बहुत बेटियां अड़ जाती हैं और कानून का सहारा लेकर पिता की संपत्ति में हिस्सा ले लेती हैं। इन लड़़कियों के साथ तो मायके वालों का संबंध खत्म ही हो जाता है पर कुछ बेवकूफ लड़कियां हैं जिनके ऊपर भावनात्मक दबाव बनाकर पिता बहन से उसका हिस्सा भाई के नाम लिखवा लेते हैं।
जब तक माता, पिता और जीजा का देहांत नहीं हो जाता है तब तक भाई बहन के साथ रिश्ता बनाए रखता है क्योंकि उसे डर रहता है कि कहीं माता पिता पलट न जाएं और जीजा अपनी पत्नी को पिता की संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए मजबूर न करे। जैसे ही माता, पिता और जीजा की मृत्यु हो जाती है भाई का चेहरा बदल जाता है। तब वह सोचने लगता है कि अब बहन उस पर बोझ न बन जाए और ज्यादातर मामलों में बहन से रिश्ता तोड़ लेता है। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। मैं एक लड़की को जानती हूं। वह पेशे से शिक्षिका है, उसने तय किया कि वह अपने पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा नहीं छोड़ेगी। उसके पिता की मृत्यु हो गई है और मां बेहद बीमार हैं। भाई उसे मां से मिलने नहीं देता। वह पहले मां से मिलने जाती थी लेकिन ऐसा करने पर भाई मां को पीटता था। मजबूर होकर बहन ने मां से मिलना छोड़ दिया और मां ने भी बेटी को वहां आने से मना कर दिया।
अगर किसी का दो या उससे ज्यादा बेटा होता है तो संपत्ति सब में बांटने में कोई परेशानी नहीं होती है परंतु बेटा बेटी में संपत्ति बांटने में जान निकलती है। जब बेटा बाहर नौकरी करता है या शादी के बाद एक ही शहर में रहते हुए भी मां बाप से अलग रहता है तो माता पिता जरूरत पड़ने पर बेटी को बुला लेते हैं। बेटी भी जितना बन पड़े करती है। माता, पिता सोचते हैं कि यह तो बेटी का फर्ज है। भाई सोचता है कि बहन क्यों नहीं करेगी ? क्या माता पिता मेरे अकेले के हैं। परंतु संपत्ति में हिस्सा देते वक्त बेटी पराई हो जाती है। संपत्ति तो बहुत बड़ी बात है। शादी के बाद लड़की का मायके की किसी भी वस्तु पर या मायके की किसी भी समस्या पर अपनी राय देने का कोई अधिकार नहीं रहता है।
अपवाद हर क्षेत्र में मिलते हैं। आजकल बेटा बेटी में फर्क करना कम हो गया है। जहां ऐसा होता है वहां रिश्तों में भी गहराई आती है।
परंतु आज भी भारत में ऐसी लड़कियों की कमी नहीं है जिन्हें बचपन से ही पराया समझा जाता है और बेटा बेटी में फर्क किया जाता है। कोई भी भाई अपने बहन के लिए व्रत नहीं रखता है तो कब तक उम्मीद की जाएगी की वह सब कुछ सहते हुए सच्चे मन से भाई की मंगल कामना करे।

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