Saturday, November 25, 2017
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 international women's day

आज 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। इस अवसर पर एक दिन के लिए मंच पर महिलाओं को सम्मानित किया जाता है। कुछ महिलाओं को सम्मान तो मिलता है परंतु क्या महिलाएं सच्चे अर्थ में सम्मानित होती हैं। यह विवाद का विषय है।
आज लड़के और लड़की में समानता की बातें होती हैं। माता पिता भी कहते हैं कि बेटा हो या बेटी क्या फर्क पड़ता है। बेटी पैदा होने पर माता पिता गर्व से कहते हैं यही हमारा बेटा है। बेटी को बेटा मानकर गर्व करना तो बेटी को छोटा करना है। जिंदगी भर नारी को वह नहीं मिलता जो पुरूष को आसानी से मिलता है। यह अंतर क्यों और कब तक ?

बेटे के जन्म पर शंख बजाया जाता है ,खुशियां मनाई जाती हैं ,मिठाई बांटी जाती है। बेटी के जन्म पर ऐसा नहीं होता। बेटा पैदा हुआ तो उसके मंगल कामना में कई रस्में निभाई जाती हैं।बेटे के जन्म के बाद उसकी लंबी उम्र के लिए मां कई तरह के व्रत रखना प्रारंभ करती है। बेटे को जन्म तो नारी ही देगी फिर बेटी के लिए मंगल और लंबी उम्र की कामना क्यो नहीं की जाती ? रंगों के आधार पर भी बांटा जाता है नीला बेटे के लिए तो गुलाबी बेटी के लिए। खिलौनों से खेलने की उम्र में खिलौने के आधार पर बांटा जाता है। गुडि़या बेटी के लिए तो हवाई जहाज बेटे के लिए जबकि हवाई जहाज महिलाएं भी चलाती हैं। कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स ने यह साबित कर दिया है कि बेटियां क्या क्या कर सकती हैं। हमारे देश में अनेक कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स बन सकती हैं बेटियों को मौका तो दीजिए।

बहनें भाई को राखी बांधती है। भैया दूज पर भाई को टीका लगाती है। भाई की मंगल कामना और लंबी उम्र के लिए । भाई बहन के लिए यह सब क्यों नहीं करता। भाई विवाह के बाद घर से बहन को विदा करता है लेकिन बहन सारी उम्र भाई के लिए यह सब करती रहती है;राखी , भैया दूजद्ध।
यह तो रही बचपन की बात। बड़े होने के बाद यदि पिता की आय कम हुई तो पढ़ाई बेटी को ही छोड़नी पड़ती है। खाने पीने में भी प्रधानता बेटे को ही दी जाती है। मां यह भूल जाती है कि वह बेटी भी मां बनेगी। इसकी तैयारी तो बचपन से ही करनी पड़ेगी। पुरूष और नारी दोनो एक साथ माता पिता बनते हैं लेकिन सारा कष्ट नारी को ही उठाना पड़ता है परंतु बच्चे को पिता का ही नाम दिया जाता है।
अब शादी के बाद की बात करते हैं। शादी पुरूष और नारी दोनो की होती है। परंतु शादी के चिन्ह केवल नारी को मिलते हैं। नारी की मांग भरी जाती है , उसे मंगलसूत्र पहनाया जाता है ,विशेष प्रकार की चूडि़यां पहननी पड़ती हैं। नारी खुशी खुशी यह सब पहनती है। मैं यह नहीं कह रही हूं कि नारी यह सब क्यों पहनेगी। मेरा सवाल यह है कि पुरूष को शादी के बाद विशेष कुछ क्यों नहीं पहनना पड़ता है जिसे पत्नी की मौत के बाद उतारना पड़े। पुरूष शादी के पहले भी मिस्टर होता है बाद में भी। नारी शादी के पहले मिस होती है और शादी के बाद मिसेज। शादी के बाद लड़की को देखकर ही समझ में आ जाता है कि वह शादी शुदा है लेकिन पुरूष जब तक स्वयं न बोले तब तक समझना नामुमकिन है कि वह शादी शुदा है या नहीं। सरनेम भी लड़की का ही बदलता है।

माता पिता के अंतिम संस्कार करने का अधिकार बेटे का है।बेटा न हुआ तो भतीजा लेकिन बेटी नहीं। आजकल कुवांरी लड़कियां भाई न होने की सिथति में यह हक लड़कर हासिल कर रही हैं। परंतु सभी लड़कियां तो लड़ नहीं सकती। हालात के आगे विवश हो जाती हैं। यदि बेटा न हो और बेटी की शादी हो गई हो तो लड़की को अन्य गोत्र का कहकर इससे वंचित किया जाता है। लेकिन अन्य गोत्र का पुरूष कर सकता है जैसे कि भांजा पर बेटी नहीं।

पति की मृत्यु के बाद पत्नी की मांग सूनी हो जाती है ,मंगलसूत्र और चूडि़यां उतारनी पड़ती है , रंग से उसका कोई नाता नहीं रहता है ,उसे सफेद साड़ी पहननी पड़ती है ,बिंदी नहीं लगा सकती, किसी धर्म में मासांहार निषिद्ध होता है। कुल मिलाकर एक नजर में पता चल जाता है कि वह स्त्री विधवा हो गई है। पत्नी की मृत्यु के बाद पुरूष विधुर कहलाते हैं। लेकिन उनमें कोई बदलाव नहीं होता न पहनावे में न खान पान में । शादी के बाद उसे ऐसा कुछ चिन्ह दिया ही नहीं जाता जिसे विधुर होने पर उतारना पड़े। आजकल समाज के एक छोटे से हिस्से में विधवा को कुछ छूट मिलती है। सिंदूर और मंगलसूत्र तो हर हाल में त्यागना पड़ता है।विधवा होने के बाद डाक्टर खान पान में बदलाव के सख्त खिलाफ हैं और मां का बदला हुआ पहनावा उसके बच्चों को मंजूर नहीं होता। इसलिए कुछ विधवाओं को यह सब मानना नहीं पड़ता। लेकिन समाज उन्हें यह अधिकार देकर उन पर अहसान करता है और समय समय पर यह जताता भी रहता है। विधुर और विधवा में यह अंतर क्यों ? क्या धर्म यह कहता है या धर्म के ठेकेदार।

बालावुड अभिनेत्री को विवाह के बाद मुख्य भुमिका नहीं मिलती । लेकिन बालीवुड अभिनेता चाहे शादी शुदा हो , पिता ,दादा ,नाना बन जाए फिर भी उसे मुख्य भूमिका मिल जाती है।

कानून बना है कि पिता की संपतित पर बेटा और बेटी का समान अधिकार होगा लेकिन हकीकत कुछ और है। आज भी बहुत कम महिलाओं को पिता की संपतित आसानी से मिलती है। ज्यादातर महिलाओं को लड़ने के बाद भी यह हक नहीं मिल पाता। कारण माता पिता अपना सब कुछ बेटे को दे देते हैं और लड़की को जीवन भर सुनना पड़ता है कि उसकी शादी में कितना खर्च हुआ। जब वृद्ध माता पिता के देख भाल की बारी आती है तो ज्यादातर मामलों में बेटी शादी शुदा हाने के बावजूद माता पिता का आजीवन ध्यान रखती है । 

यह तो चंद अंतर हैं । ऐसे अनगिनत अंतर हैं जो बेटे और बेटी में किया जाता है। यह भेद भाव जन्म के बाद मां ,दादी करती है। इस भेद भाव के लिए पुरूषों के साथ महिलाएं भी जिम्मेदार हैं। भारतीय समाज का एक छोटा सा हिस्सा इस भेद भाव से बाहर आ चुका है जिसे अपर सोसायटी कहते हैं। बड़ा हिस्सा तो आज भी इस भेद भाव के साथ ही जी रहा है। जिस दिन सम्पूर्ण भारतीय समाज में बेटी के जन्म पर खुशी मनाई जाएगी , बेटा बेटी में कोई अंतर नहीं किया जाएगा , बेटी के जन्म पर माता पिता गर्व से कहेंगे कि यह हमारी बेटी है उस दिन सही मायने में भारत अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का हिस्सेदार बनेगा।

 

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