Saturday, November 25, 2017
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राखी का जिक्र पौराणिक कथाओं और भारतीय इतिहास में मिलता है। पुरातन काल से ही राखी का धागा भार्इ की कलार्इ पर बहन बांधती है और भार्इ  बहन को रक्षा का वचन देता है। यही राखी की परंपरा है। सगे भार्इ बहन न हो  तो भी अगर कोर्इ लड़की किसी लड़के को राखी बांधती है तो उनमें भार्इ बहन का रिश्ता कायम हो जाता है। पौराणिक कथाओं और भारतीय इतिहास में ऐसे कर्इ उदाहरण मिलते हैं।


पहली बार किस बहन ने भार्इ की कलार्इ पर राखी बांधी थी इसका कोर्इ ठोस प्रमाण नहीं है। परंतु पौराणिक कथाओं में इसका उत्तर है।कहा जाता है यमुना ने यमराज को पहली बार राखी बांधी थी।
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यम और यमुना

मृत्यु के देवता यम की कलार्इ पर उनकी बहन यमुना ने राखी बांधी थी और यम को  अमरत्व का वरदान मिला। तब से आज तक बहनें भार्इ की कलार्इ पर राखी बांधकर उनकी लंबी आयु के लिए प्रार्थना करती हंै।
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राजा बाली को राखी बांधती देवी लक्ष्मी
 राजा बाली भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। एक कथा के अनुसार एक दिन राजा बाली भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे  अपने राज्य को दुश्मनों से सुरक्षित करने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने अपने भक्त की मदद की  ठानी और विष्णु लोक से निकलने के लिए प्रस्तुत हो गए। भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी नहीं चाहती थीं कि उनके पति विष्णु लोक छोड़कर जाएं। अत: वह एक ब्राहमण महिला का वेष धरकर बाली के महल पहुंच गर्इं। श्रावणी पूर्णिमा के पावन दिन पर उन्होने बाली की कलार्इ पर पवित्र धागा बांधा  और महल में अपने आने का प्रयोजन भी बताया। बाली ने देवी लक्ष्मी की भावनाओं का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को विष्णु लोक न छोड़ने की विनती की। राखी के त्यौहार को बलेवा भी कहते हैं जिसका अर्थ है राजा बाली की भगवान विष्णु के प्रति समर्पण।
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श्री कृष्ण की उंगली पर साड़ी का टुकड़ा बांधती द्रौपदी

शिशुपाल के मृत्यु के बाद श्री कृष्ण के एक उंगली से रक्त स्राव हो रहा था। रक्त को रोकने के लिए पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांधा। कृष्ण ने द्रौपदी को रक्षा का वचन दिया और इस ऋण को लौटाने का भी। श्री कृष्ण ने अपने वचन को निभाया।  महाभारत में ऐसे कर्इ उदाहरण मिलते हैं। जिनमें सबसे बड़ा है चीरहरण के दौरान श्री कृष्ण के उंगली से अंतहीन साड़ी का निकलना और द्रौपदी की लाज बचाना। कृष्ण की उंगली पर द्रौपदी के साड़ी का एक टुकड़ा वक्त आने पर अंतहीन साड़ी बन गया।

भारतीय इतिहास में भी ऐसे वृतांत मिलते हैं जब रानियों ने किसी राजा को राखी भेजी हो और राजायों ने भी राखी का मान रखा। यूं  तो राखी को हिंदू त्यौहार कहा जाता है लेकिन हम देखते हैं कि इतिहास में धर्म राखी के आड़े कभी नहीे आया।
भारतीय इतिहास में भी राखी के इतिहास का जिक्र है। युद्ध पर जाने से पहले आर्य यज्ञ किया करते थे। पुरूषों को युद्ध क्षेत्र में जाने से पहले महिलाएं  पवित्र धागा बांधती थीं जिससे उनकी रक्षा हो और वह अपने कबीले के गौरव को बनाए रख सकें। धीरे  धीरे यही रस्म रक्षा बंधन में परिवर्तित होकर फैल गया।
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    पवित्र  धागा  हाथ  में लिए राजा  पोरस

कहा जाता कि 326 र्इसा पूर्व में जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था , तब सिकंदर की पत्नी ने हिंदू राजा पोरस को पवित्र धागा भेजा था। उसने पोरस से आग्रह किया था कि युद्ध क्षेत्र में वह सिकंदर को क्षति न पहुंचाएं। पोरस ने राखी का मान रखा। युद्ध क्षेत्र में पोरस जब सिकंदर पर अंतिम  वार करने वाले थे तो उनकी नजर हाथ पर बंधी राखी पर पड़ी और उन्होने स्वयं को सिकंदर पर वार करने से रोक लिया।

राजपुताने में ऐसे कर्इ उदाहरण मिलते हैं जिसमें सबसे लोकप्रिय है रानी कर्नावती और हुमांयु की घटना। 1527 र्इ में खनुआ के युद्ध में राजपूत राजा बाबर के विरूद्ध हार चुके थे। इसके कुछ दिन बाद मेवाड़ के राणा सांगा का निधन हो गया।इसके बाद राणा सांगा की पत्नी रानी कर्नावती ने अपने बड़े पुत्र विक्रमजीत  के नाम पर शासन कार्य संभाला। इसी बीच गुजरात के बहादुर शाह ने मेवाड़ पर दूसरी बार हमला किया। विक्रमजीत बहादुर शाह के हाथों पहले ही शिकस्त खा चुके थे।

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हुमांयु को राखी भेजती रानी कर्नावती
चिंतित रानी कर्नावती ने मुगल सम्राट हुमांयु को राखी भेजी, उन्हें भार्इ कहा और मदद मांगी।हुमांयु उस समय बंगाल में सैनिक अभियान में व्यस्त थे। हुमांयु की सहायता मिलने में रानी कर्नावती को देर हो गर्इ। जब तक हुमांयु वहां पहुंचते युद्ध खत्म हो चुका था और मेवाड़ की हार हो चुकी थी। 8 मार्च 1535 को रानी कर्नावती ने जौहर कर लिया था।हुमांयु रानी कर्नावती को नहीं बचा पाए लेकिन मुगल सैनिकों के मेवाड़ पहुंचने पर बहादुर शाह को भागना पड़ा।
परवर्ती काल में 1905 र्इ में बंगाल विभाजन के दौरान कविगुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर ने रक्षा बंधन को सामुदायिक त्यौहार के रूप में मनाने का आवहान किया। उन्होने हिंदुओं और मुसलमानों को परस्पर को राखी बांधने के लिए कहा ताकि उनमें शांती, सदभाव और भार्इचारा बना रहे।कविगुरू का विचार था कि इससे विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों  में राष्ट्रीय जागरूकता फैलेगी।
 
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसी घटनाएं हैं जिनमें रानियों ने राजाओं को राखी भेजकर मदद मांगी। राजा का धर्म कभी भी राखी के वचन के आगे बड़ा नहीं हुआ। राखी का धर्म निभाने के लिए राजा अपने जान की भी परवाह नहीं करते थे। आजकल राखी केवल सगे और रिश्ते के भार्इ बहन का त्यौहार बनकर रह गया है। व्यापक अर्थ में देखा जाए तो राखी सदभाव और भार्इचारे का त्यौहार भी है।

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