Sunday, January 21, 2018
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Sri krishna1

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का मानना है कि

        अध्यात्म बल का संपादन कठिन नहीं वरन सरल है। उसके लिए आत्मशोधन एवं लोकमंगल के क्रियाकलापों को जीवनचर्या का अंग बना लेने भर से काम चलता है। व्यक्तित्व में पैनापन और प्रखरता का समावेश इन्हीं दो आधारों पर बन पड़ता है। यह बन पड़े तो दैवी अनुग्रह अनायास बरसता है और आत्मबल अपने भीतर से ही प्रचुर परिमाण में उभर पड़ता है।

केवट, शबरी, गिलहरी, रीछ-वानर, ग्वाल-बाल जैसों की भौतिक सामर्थ्य स्वल्प थी पर वे अपने में देवत्व की मात्रा बढ़ा लेने पर ही इतने मनस्वी बन सके, जिनकी र्चचा इतिहासकार आये दिन करते रहते हैं। सुग्रीव की विजय के पीछे उसकी निज की बलिष्ठता मात्र ही कारण नहीं थी। नरसी मेहता ने अभीष्ट धन अपने व्यवसाय से नहीं कमाया था। इनके पीछे देवत्व का अदृश्य सहयोग भी सम्मिलित रहा है। अगस्त्य का समुद्रपान और परशुराम द्वारा कुल्हाड़े के बल पर लाखों-करोड़ों की जो ‘ब्रेन वाशिंग’ हुई, उसे किन्हीं वक्ताओं के धर्मोपदेश से कम नहीं कहा जा सकता। सतयुग, ऋषियुग का ही प्रकट रूप है। असुरता की अभिवृद्धि होते ही कलहयुग यानी कलियुग आ धमकता है। उच्च स्तरीय प्रतिभाओं का पौरुष कार्यक्षेत्र में उतरता है तो न केवल कुछ व्यक्तियों व प्रतिभाओं को, वरन समूचे वातावरण को ही उलट-पुलट कर रख देता है। भट्ठी में तपने के बाद फौलाद बने लोहे द्वारा कुछ कर दिखाने वाले उपकरण बनते हैं। आत्मशक्ति की प्रखरता को इसी स्तर का बताया और पाया गया है।

        चंद्रगुप्त जब विश्वविजय की योजना सुनकर सकपकाने लगा तो चाणक्य ने कहा तुम्हारी दासी पुत्र वाली मनोदशा को मैं जानता हूं। उससे ऊपर उठो और चाणक्य के वरद पुत्र जैसी भूमिका निभाओ। विजय प्राप्त कराने की जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं, मेरी है। शिवाजी जब अपने सैन्य बल को देखते हुए असमंजस में थे कि इतनी बड़ी लड़ाई कैसे लड़ी जा सकेगी, तो समर्थ गुरु रामदास ने उन्हें भवानी के हाथों अक्षय तलवार दिलाई थी और कहा था-तुम छत्रपति हो गये, पराजय की बात ही मत सोचो। महाभारत लड़ने का निश्चय सुनकर अर्जुन सकपका गया था और कहने लगा कि ‘मैं अपने गुजारे के लिए तो कुछ भी कर लूंगा, फिर हे केशव! आप इस घोर युद्ध में मुझे नियोजित क्यों कर रहें है? इसके उत्तर में भगवान ने एक ही बात कही थी कि ‘इन कौरवों को तो मैंने पहले ही मारकर रख दिया है। तुझे यदि श्रेय लेना है तो आगे आ, अन्यथा तेरे सहयोग के बिना भी वह सब हो जाएगा, जो होने वाला है। घाटे में तू ही रहेगा-श्रेय गंवा बैठेगा और उस गौरव से भी वंचित रहेगा जो विजेता और राज्यसिंहासन के रूप में मिला करता है।‘ अर्जुन ने वस्तुस्थिति समझी और कहने लगा- ‘करिष्ये वचनं तव’ अर्थात आपका आदेश मानूंगा।

साभार: राष्ट्रीय सहारा

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