Thursday, November 23, 2017
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maha kali puja

पशिचम बंगाल में दिपावली के दिन मां काली की पूजा होती है। केवल पशिचम बंगाल ही नहीं कुछ पूर्वी प्रांतों जैसे असम और ओडिशा के कुछ हिस्सों , मेघालय इत्यादि में भी दिपावली के दिन मां काली की पूजा होती है।

जहां जहां बंगाली समुदाय के लोग रहते हैं वहां वहां दिपावली के दिन काली पूजा होती है। इस तरह इस दिन पूरे देश में लक्ष्मी गणेश की पूजा के साथ साथ मंदिर या बारवारी में काली पूजा भी होती है।

पशिचम बंगाल में काली पूजा की धूम कुछ ज्यादा ही रहती है। यह पूजा कार्तिक अमावस्या पर होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार देवी दुर्गा के दस रूप हैं। इसमें से मां काली प्रथम हैं। मां काली का नाम संस्कृत के काल शब्द से लिया गया है। काल का अर्थ है समय। मां काली मां दुर्गा का भयभीत करने वाला रूप हंै परंतु यह बुरार्इ का नाश करने वाली देवी हैं। उनके कर्इ नाम हैं - श्यामा , आदया मां , दक्षिणा कालिका , तारा मां , चामुंडी , भद्रकाली एवं श्यामाकाली।

मां दुर्गा ने कब और कैसे मां काली का रूप धरा इसका जवाब प्राचीन कथा में मिलता है। बहुत समय पहले की बात है , दो राक्षसों शुम्भ और निशुम्भ ने स्वर्ग में सारे देवताओं पर आक्रमण कर दिया था। यहां तक कि राक्षसों ने देवराज इंद्र पर भी हमला बोल दिया। अनेक युद्धों के पश्चात राक्षस जीत गए। वह इतने शकितशाली हो गए थे कि  देवों को स्वर्ग छोड़कर शिव पार्वती के निवास स्थान हिमालय में आश्रय लेना पड़ा। वहां पर देवों ने मां दुर्गा से मदद की गुहार लगार्इ। उनकी प्रार्थना सुनकर मां दुर्गा के कपाल से एक नर्इ देवी प्रकट हुर्इं। यह मां काली या काल भोर्इ नाशिनी थीं। उनके दो सहायक थे डाकिनी और जोगिनी। इन दोनों के साथ मां स्वर्ग एवं पृथ्वी को राक्षसों के चंगुल से छुड़ाने के लिए चल पड़ीं।

भयानक युद्ध हुआ, लंबे युद्ध के बाद देवी सभी राक्षसों को मारने में सफल हुर्इं। उन्होने मरे हुए राक्षसों के सर की माला पहनीं जिसे मुंड माला कहते हैं। परंतु मां काली के रक्त की प्यास नहीं बुझी। उनके रास्ते में जो भी आया उसे मारते हुए वह आगे  बढ़ती  गर्इं। सभी देव घबरा गए। वह स्वर्ग भी नहीं लौट पा रहे थे क्योकि उन्हें ड़र था कि कहीं देवी उन्हीं पर न हमला कर दें। हमेशा की तरह जब सभी देव हथियार डाल देते हैं तब बचते हैं देवों के देव महादेव।

भगवान शिव मां काली के रास्ते में लेट गए। इस बात से अंजान मां काली हाथ में खांड़ा यानि घुमावदार तलवार लेकर आगे बढ़ती रहीं। अचानक ही उनका पैर भगवान शिव के उपर पड़ा और उसी क्षण उनकी रक्त की प्यास बुझ गर्इ तथा तुरंत ही वह सामान्य हो गर्इं। लेकिन पति के सीने पर पांव रखकर वह बेहद लजिजत हुर्इं और उनकी जीभ बाहर निकल आर्इ। उनके इसी रूप की पूजा बंगाली समुदाय करता है।

पशिचम बंगाल में काली पूजा एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। उनसे सभी बुरार्इयों का नाश करने की प्रार्थना की जाती है , यहां तक कि मनुष्यों के अंदर के बुरार्इयों का भी। युद्ध , बाढ़ एवं सूखे से बचाव के लिए भी उनसे प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि उनके भक्तों को अच्छा स्वास्थ्य , समृद्धि , शांति और खुशियां मिलती हैं।

काली पूजा शकित का प्रतीक है। यह पूजा हमेशा ही सांझ ढ़लने के बाद ही होता है। तांति्रक मत से पूजा रात को होती है। पशिचम बंगाल के हर शहर के हर मुहल्ले में काली पूजा होती है।स्त्री , पुरूष इस दिन सुबह से व्रत रखते हैं। कोर्इ कोर्इ तो निर्जला व्रत रखते हैं। पूजा के बाद मां का प्रसाद खाकर व्रत तोड़ते हैं। कहीं कहीं बकरे की बली भी चढ़ती है। परंतु आजकल घरों में काली पूजा कम हो गर्इ है और बारवारियों में बढ़ गर्इ है। बारवारियों में बली नहीं होती। किसी किसी काली मंदिर में बली होती है। मां काली शकित का प्रतीक हैं परंतु वह एक स्त्री भी हैं। किसी भी सुहागिन की तरह जब उनका पैर पति के सीने पर पड़ता है तो उनकी जीभ अपने आप ही बाहर आ जाती है। मां दुर्गा के इस भयावह रूप को शकित और नारी का मिश्रण सहनीय बना देती है।

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