Saturday, November 25, 2017
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हिंदू त्यौहार बसंत पंचमी पूरे भारत में मनार्इ जाती है। कहते हैं इस दिन मां सरस्वती का जन्म हुआ था। मनुष्य में सत्य,ज्ञान, बुद्धि, कला का संचार  किया था मां सरस्वती ने इसीलिए उन्हें विधा की देवी कहा जाता है। बसंत पंचमी का त्यौहार बसंत ऋतु में मनाया जाता है।

प्रत्येक वर्ष माघ माह में शुक्ल पक्ष के दौरान पंचमी के दिन को बसंत पंचमी कहते हैं।


देवी सरस्वती से ही वाणी का उदभव हुआ है। जब ब्रहमा ने सृषिट का सृजन किया था, तब सृषिट नि:शब्द थी। ब्रहमा ने महसूस किया कि उनकी सृषिट में कुछ कमी है। बहुत सोचने पर भी वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके। वह स्वयं भी सृषिट के नि:शब्द, वाणीहीन होने से परेशान थे। अंतत: वह भगवान विष्णु के पास गए। सृषिट के इस समस्या का समाधान भगवान विष्णु ने कर दिया। उनके कहने पर ब्रहमा जी ने अपनी सृषिट को बचाने के लिए सरस्वती की रचना की। एक हाथ में वीणा और  दूसरा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में वाहन हंस के उपर बैठी हुर्इ वीणावादिनी विधा रूपी देवी सरस्वती का आविर्भाव हुआ।


अपने वीणा  के तारों को झंकृत कर सृषिट में ध्वनि का संचार किया। इसके बाद से मनुष्यों के मूक भावनाओं को आवाज मिली। पंछी चहचहाने लगे, भंवरे गुंजन करने लगे, तितलियां फूलों का रस पान करने लगीं, वायु के बहने का शोर सुनार्इ देने लगा, रंग बिरंगे पुष्पों में जान आ गर्इ। एक शब्द में निर्जीव प्रकृति ध्वनि से जीवंत हो उठी। प्रकृति का यह रूप बसंत ऋतु को दर्शाती है और बड़े बुजुर्ग कहते हैं देवी सरस्वती बसंत ऋतु का प्रतिनिधितत्व करती हैं। पूरे भारत में इस समय सरसों के फूल खिलते हैं। बसंत ऋतु में रंग बिरंगे फूलों से पृथ्वी सज जाती है।

मां सरस्वती ने सृषिट को ध्वनि बसंत ऋतु में प्रदान की थी। इसीलिए कहा जाता है कि इसी दिन मां सरस्वती का जन्म हुआ। बसंत पंचमी के दिन  अर्थात मां सरस्वती के जन्म दिवस पर उनकी पूजा होती है। बसंत पंचमी को सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है खासकर भारत के पूर्वी राज्यों में जैसे पशिचम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और असम में। यहां के लोगों में इस दिन गजब का जोश देखा जाता है जिसकी तुलना केवल दुर्गा पूजा से ही किया जा सकता है। मंदिरों के अलावा सभी स्कूल, कालेज, संगीत विधालय, यहां तक कि अनेक घरों में भी मिटटी की सरस्वती प्रतिमा स्थापित करके पूजा की जाती है। विधार्थी अपने पुस्तक,कापी,कलम की पूजा करते है, संगीतज्ञ अपने वाध यंत्रों की और चित्रकार रंग व तूलिका की पूजा करते हैं। इन राज्यों में रहने वाले हिंदू अपने छोटे बच्चों से बसंत पंचमी के दिन शुभ मुहुर्त में देवी सरस्वती के सामने शिक्षा का प्रारंभ करवाते हैं। बच्चे पुजारी का हाथ पकड़कर जिंदगी का पहला अक्षर लिखते हैं जिसे विधारंभ कहते हैं। पीला रंग सरस्वती पूजा का प्रतीक माना जाता है। पूजा के समय स्त्री,पुरूष,बच्चे सभी पीले वस्त्र पहनते हैं, पीले रंग के मिठार्इ व खाध पदार्थ खाते हैं, स्नान से पहले कपाल पर पिसी हल्दी छुआते हैं। देवी की पूजा जहां तक हो सके पीले रंग के वस्तुओं से की जाती है। कहीं कहीं घर पर केसर डालकर पीले रंग की खीर बनार्इ जाती है। पारंपरिक सरस्वती पूजा इसी तरह की जाती  थी। समय के साथ साथ सरस्वती पूजा का चलन भारत के पूर्वी राज्यों से निकलकर सम्पूर्ण भारत में छा गया। बारवारियों में  भी सार्वजनिन सरस्वती पूजा होने लगी लेकिन परंपराओं में कमी भी आने लगी है।

मां सरस्वती का कितना बड़ा वरदान है हम पर। आज सृषिट नि:शब्द नहीं है। हम अपने भावनाओं को शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं। परंतु देवी सरस्वती के इस वरदान का कहीं हम दुरूपयोग तो नहीं कर रहे हैं।

 

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