Saturday, November 25, 2017
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होली को रंगों का त्यौहार भी कहते हैं। परंपरा के अनुसार होली हिंदू पर्व है। परंतु आजकल यह केवल हिन्दूओं तक ही सीमित नहीं है। होली सभी खेलते हैं। आखिर रंग से दूसरे को सराबोर करना किसे पसंद नहीं होगा। भारत के विभिन्न प्रदेशों में होली की परंपरा में थोड़ा बहुत फेर बदल होता है और इसे अलग अलग नामों से जाना जाता है।


भारत में सबसे प्रसिद्ध होली है कान्हा की भूमि, ब्रज भूमि की। श्री कृष्ण के बचपन से जुड़े स्थान मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, बरसाना की होली देखते ही बनती है। बरसाना की होली लठ्ठमार होली कहलाती है। नंदगांव के पुरूष बरसाना जाते हैं वहां की औरतों के साथ होली खेलने। बरसाना की महिलाएं नंदगांव के पुरूषों पर भारी पड़ती हैं। जैसा कि नाम है लठ्ठमार होली महिलाएं पुरूषों को लाठी से पीटती हैं और पुरूष अपने आपको बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन सब कुछ होली की भावना से ही होता है।


हरयाणा में होली को धुलंडी होली कहते हैं। इसमें भाभी की अहम भूमिका होती है। इस दिन भाभी को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है अपने देवर को पीटने की। साल भर देवर भाभी को जितना परेशान करता है, इस दिन भाभी देवर से उसका बदला ले लेती है।


महाराष्ट्र और गुजरात में रंगों के अलावा एक और परंपरा है हांड़ी फोड़ने की। श्री कृष्ण गोपियों के घर जाकर मक्खन चुराकर खा जाते थे इसलिए गोपियां मक्खन की हांडी को ऊपर टांगकर रखती थीं ताकि कृष्ण मक्खन न चुरा सकें। हालंकि कृष्ण तो फिर भी मक्खन चट कर ही जाते थे। इसी को याद करते हुए यहां होली के दिन सड़क पर बहुत ऊंचाई पर हांडी बांधी जाती है जिसमें छाछ होती है। लड़कों की टोली  हांडी के नीचे मानव पिरामिड बनाते हैं। जो लड़का सबसे ऊपर होता है वह अपने सर से हांडी को फोड़ता है। इस दौरान महिलाएं होली के लोक गीत गाती हैं और बालटी भर कर पानी मानव पिरामिड पर फेंकती हैं।


होली पश्चिम बंगाल में बहुत ही खुबसुरत तरीके से मनाया जाता है। गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर विश्व भारती विश्वविद्यालय के संस्थापक थे। यह पश्चिम बंगाल के शान्ति निकेतन में स्थित है। गुरूदेव ने ही विश्व भारती में होली खेलने की प्रथा प्रारंभ की थी। वहां होली को बसंत उत्सव के नाम से जाना जाता है। छात्र छात्राएं विश्वविद्यालय प्रागंण को फूलों से सजाते हैं, रंगोली बनाते हैं और प्रभात फेरी निकालते हैं। पारम्परिक वेश भूषा पहनकर छात्र छात्राएं गुरूदेव द्वारा रचित गीत गाते हैं, नृत्य प्रस्तुत करते हैं और पीले फूलों से होली खेलते हैं। पश्चिम बंगाल के अन्य हिस्सों में होली को दोल जात्रा कहते हैं। इसमें राधा कृष्ण की मूर्तियों को सजे हुए पालकी पर रखकर उसका जुलूस निकाला जाता हैं।


सिख होली के एक दिन बाद होला मोहल्ला मनाते हैं। इसमें वे अपनी शारीरिक शक्ति और सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। होली के अगले दिन आनंदपुर साहिब में जमा होकर वे होला मोहल्ला मनाते हैं। इस परंपरा की शुरूआत सिख धर्म के अंतिम और दसवें गुरू, गुरू गोविन्द सिंह जी ने की थी ।


उत्तर पूर्व में मणीपुर में छः दिनों तक होली खेलते हैं। होली पर यहां सदियों पुरानी याओसांग फेस्टिवल मनाया जाता है। इस अवसर पर एक विशेष नृत्य होता है थाबाल चोंगबा।

विभिन्न तरीके से विभिन्न प्रदेशों में होली खेली जाती है। अलग अलग पकवान बनते हैं। सभी जगह पर एक दूसरे को रंग, गुलाल लगाते हैं पर हर जगह की अपनी कुछ परंपरा है जिसे वहां के लोगों ने आज भी जीवित रखा है, परंतु होली की जो भी परंपरा हो उसका उद्देश्य एक ही है दुशमनी को भुलाना और भाईचारा निभाना।

 

 

 

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